टीम जोहार लाइव
झारखंड में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) की जमीनी स्थिति जानने के लिए जोहार लाइव की टीम ने पिछले दिनों में सात जनजातीय समुदायों की बस्तियों तक पहुंचकर उनकी समस्याओं को समझा. लातेहार जिले के महुआडांड़ प्रखंड के ग्वालाखाड़ और ढोढ़ी कोना गांव, मनिका प्रखंड के तेहराई गांव, बालूमाथ प्रखंड की झाबर बिरहोर बस्ती और दाउना गांव में बिरजिया समुदाय की समस्याएं सामने आईं. वहीं, संताल परगना के पहाड़िया बहुल इलाकों में भी लोगों की स्थिति को समझने की कोशिश की गई.
ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान पहचान, पेयजल, बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, राशन, आवास और रोजगार की कमी जैसे मुद्दे सामने आए. कहीं लोग स्वच्छ पेयजल के अभाव में चुआं का पानी पीने को मजबूर हैं, तो कहीं बरसात में गांवों का संपर्क कट जाता है. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, वनाधिकार पट्टा नहीं मिलने, रोजगार के लिए पलायन और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने की शिकायतें भी सामने आईं. पहाड़िया समुदाय के कुछ लाभार्थियों ने सरकारी योजनाओं की राशि के भुगतान में कथित गड़बड़ी की शिकायत की. एक और समस्या सामने आई जिसमें आदिम जनजातियों ने बताया कि उनके नाम से उनके मूल पहचान यानी टाइटल को हटाया जा रहा है और वो बेबस होकर बस देख रहे हैं.
इन जमीनी समस्याओं को सामने लाने के बाद जोहार लाइव ने राज्य के मंत्रियों, विधायकों, पूर्व विधायकों सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि से बात की. ताकि आदिम जनजातियों, जिनकी राजनैतिक पहुंच लगभग ना के बराबर है, उनकी आवाज को कोई अपना ले. उनकी समस्याओं पर ये समाज गंभीरता से विचार करे. हमने राज्य की कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा विधायक हेमलाल मुर्मू, पूर्व विधायक शिवशंकर उरांव, सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग, गुमला से इन मुद्दों पर उनका नजरिया जाना.
हमने उनसे सवाल किया कि आखिर कैसे सुधरेगी ये स्थिति, इन सब के जिम्मेदार कौन हैं, क्या सुझाव देना चाहेंगे आप?
कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा, आप मुझे अपनी स्टोरी भेजिए. मैं इसे खुद धरातल पर चेक करूंगी, उसके बाद ही इसका जवाब दूंगी.”
पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा विधायक हेमलाल मुर्मू ने कहा कि समस्याओं के समाधान के लिए पहले उनकी वास्तविक स्थिति को समझना और फिर प्राथमिकता तय करना जरूरी है. उन्होंने कहा कि खबर रिपोर्टिंग करने से पहले संबंधित जनप्रतिनिधियों को भी समस्याओं की जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि समाधान की दिशा में पहल की जा सके.
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पहाड़िया समुदाय के लाभार्थियों की सरकारी योजनाओं की राशि में कथित गड़बड़ी के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने अनभिज्ञता जताई. वहीं, लातेहार में आदिम जनजातियों से जुड़ी समस्याओं और कथित सामाजिक भेदभाव के सवाल पर उन्होंने कहा कि संताल परगना क्षेत्र में छुआछूत या नाम बदलने जैसी समस्याएं नहीं हैं.
पूर्व विधायक शिवशंकर उरांव ने जिला प्रशासन की जवाबदेही पर उठाए सवाल
गुमला के पूर्व विधायक शिवशंकर उरांव ने कहा कि आदिम जनजातियों की बस्तियों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार और जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि जहां सड़क नहीं है, वहां सड़क बननी चाहिए. खेती करने वाले परिवारों को सोलर पंप के माध्यम से सिंचाई की सुविधा दी जानी चाहिए और जहां चापाकल नहीं है, वहां पेयजल की व्यवस्था की जानी चाहिए.
उन्होंने कहा कि आदिम जनजातियों के हित में काम करने के लिए नियम-कानून की प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबा नहीं किया जाना चाहिए. उनके मुताबिक, जिला स्तर पर एकीकृत जनजातीय विकास अभिकरण (ITDA) के माध्यम से उपलब्ध राशि का इस्तेमाल इन समुदायों का जीवन स्तर सुधारने के लिए किया जाना चाहिए.
जब उनसे पूछा गया कि यदि आदिम जनजातियों के लोग अब भी चुआं का पानी पीने को मजबूर हैं, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है, उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में जिला उपायुक्त और ITDA की भूमिका पर सवाल उठता है. यदि जिला प्रशासन समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रहा है, तो राज्य सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए.
रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन और आवास की कमी पर भी पूर्व विधायक ने चिंता जताई. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना और अबुआ आवास योजना जैसी योजनाओं के बावजूद यदि जरूरतमंद परिवारों को घर नहीं मिल रहा है, तो राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को इसकी समीक्षा करनी चाहिए.
राशन वितरण के संबंध में उन्होंने आदिम जनजातियों के लिए डाकिया योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि पात्र परिवारों तक राशन नहीं पहुंच रहा है, तो यह गंभीर समस्या है. उन्होंने सरकार के विभिन्न विभागों से सवाल पूछने के लिए मुद्दों की सूची भी मांगी, ताकि संबंधित विभागों से जवाब मांगा जा सके.
ग्लैडसन डुंगडुंग बोले- जन आंदोलन से ही बदलेगी स्थिति
सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने आदिवासी समुदायों की समस्याओं के समाधान के लिए जन आंदोलन की जरूरत बताई. उन्होंने कहा कि झारखंड में अफसरशाही का दबदबा है और सरकारी तंत्र योजनाओं के क्रियान्वयन के बजाय लूट की व्यवस्था बन गया है. उनके अनुसार, योजनाएं बनती हैं, लेकिन उनका लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचता.
डुंगडुंग ने खूंटी के एक पुराने अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि जब उन्होंने तत्कालीन उपायुक्त से क्षेत्र में सामुदायिक भवनों की कमी के बारे में पूछा, तो पहले उन्हें बताया गया कि सामुदायिक भवन उपलब्ध हैं. लेकिन जब उन्होंने एक-एक कर उनकी वास्तविक स्थिति बताई, तब अधिकारी ने काम कराने की बात कही.
उन्होंने झारखंड सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाए. डुंगडुंग के मुताबिक, सरकार मंईयां सम्मान योजना पर केंद्रित है, जबकि वनाधिकार पट्टा, पलायन, स्वास्थ्य और स्वच्छ पेयजल जैसी समस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है. उनका मानना है कि इन समस्याओं का समाधान केवल सरकारी योजनाएं बनाने से नहीं, बल्कि लोगों को संगठित कर उनके अधिकारों के लिए सामूहिक आवाज उठाने से होगा.
जोहार लाइव समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा. उनकी समस्याओं, मुद्दों की तह तक जाएगा. कोशिश इतनी भर है कि सूरत बदलनी चाहिए.

