रिपोर्ट – कनिका राणा/वसीम अख्तर
सभी फोटो – रुस्तम खलखो
अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 झारखंड सहित पूरे देश में आधिकारिक रूप से 31 दिसंबर 2007 से लागू हुआ था, जबकि इसके नियम 1 जनवरी 2008 को अधिसूचित किए गए थे. इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदायों और पारंपरिक वनवासियों को उनकी पुश्तैनी वन भूमि और संसाधनों पर कानूनी अधिकार देना तथा उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को सुधारना था.
हालात सुधर तो रहे हैं, लेकिन इसकी रफ्तार केंकड़े की चाल सी ही है.
वनाधिकार कानून के तहत झारखंड में अब तक कुल 1,07,000 से अधिक (व्यक्तिगत) और 3,700+ सामुदायिक दावे प्राप्त किए गए हैं. जिसमें अब तक लगभग 59,800 – 60,030 व्यक्तिगत और 2,100 सामुदायिक वनपट्टा का वितरण किया गया है. जाहिर है, लगभग 40 हजार व्यक्तिगत और 1600 के लगभग सामुदायिक वन पट्टों का वितरण किया जाना अब भी बाकि है.
इन्हीं बाकियों में झारखंड के लातेहार जिला के मनिका प्रखंड का तेहराई गांव भी शामिल है. अंतिम आदिवासी ऋंखला के तीसरे हिस्से में आज चर्चा परहिया आदिम जनजाति और उसके आर्थिक स्थिति के कारणों पर.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक इस समुदाय की आबादी 25,585 मात्र है. परहिया बहुल तेहराई गांव में कुल 53 घर हैं. लेकिन यहां के लोगों के पास एक इंच का वनपट्टा नहीं है. गुस्से में गांववाले कहते हैं, आगे भी किसी को नहीं मिलेगा.
ज़मीन नहीं है, इसलिए खेती नहीं. खेती नहीं, इसलिए रोज़गार नहीं. और रोज़गार नहीं, इसलिए यहां के परहिया ईंट-भट्ठों पर काम करने बिहार, यूपी सहित दक्षिण भारत की तरफ़ निकल पड़ते हैं.
तेहराई के 70 साल के बुजुर्ग सतन परहिया कहते हैं, यह हक़ कागज़ से आगे उन तक नहीं पहुंचा. गांव के पास ज़मीन नहीं है. जिनके पास थोड़े खेत हैं, बस वही खेती कर पाते हैं. बाकि सभी को मजदूरी ही करना पड़ता है. वो आगे कहते हैं, अगर मनरेगा का सहारा भी रहता तो, एक उम्मीद बंधती.
आखिर वनपट्टा मिलने में देरी क्यों
दिसंबर 2025 में सामाजिक संस्था झारखंड जनाधिकार महासभा ने इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट मीडिया के सामने पेश किया था. जिसके मुताबिक कानूनन ग्राम सभा, अनुमंडल स्तरीय समिति और जिला स्तरीय समिति की भूमिका तय है. जिसमें ग्राम सभा को सर्वोच्च माना गया है लेकिन व्यवहार में प्रशासनिक अधिकारी, ग्राम सभा को निर्णय लेने वाली संस्था के रूप में स्वीकार नहीं कर रहे हैं.
अनुमंडल और जिला स्तरीय समितियां वन विभाग की सिफारिशों के आधार पर निर्णय ले रही हैं, जो नियमों का उल्लंघन है. नियमों के अनुसार, यह कार्य ग्राम सभा और वन अधिकार समिति द्वारा किया जाना है. इसके इतर वन विभाग कथित तौर पर बिना अधिकार के दावों का सत्यापन कर प्रतिकूल रिपोर्ट सौंप रहा है, जिसके आधार पर दावे खारिज किए जा रहे हैं.
प्रशासनिक ढुलमुल रवैये का परिणाम देखिये, वन भूमि पट्टा देने में झारखंड देश के सभी वन राज्यों में नौवें स्थान पर है. पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ सबसे आगे है. यहां तक कि आंध्र प्रदेश,ओड़िशा, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, त्रिपुरा, तेलंगना जैसे राज्य झारखंड से काफी आगे हैं. झारखंड से पीछे केवल असम है.
साल 2023 में प्रभात खबर में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में पिछले 17 वर्षों में 60030 को ही वन भूमि पट्टा बांटा गया है. जबकि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में 457145 लोगों को वन भूमि का पट्टा बांटा गया है. ओड़िशा में 456923, मध्यप्रदेश में 266609, आंध्र प्रदेश में 223028,महाराष्ट्र में 197524, त्रिपुरा में 127931, तेलंगना में 97434 व गुजरात में 91686 लोगों को वन भूमि पट्टा दिया जा चुका है.
दक्षिण भारत बन रहा जीने का सहारा
इसी गांव के 24 साल के खुजू परहिया बिहार में ईंट भट्टे पर ईंट ढ़ोने का काम करते हैं. वो कहते हैं, एक दिन में 1000 ईंट ढ़ोएंगे तो 200 रुपया मिलता है. उससे कम ढ़ोने तो पैसे भी कम मिलेंगे.
क्या भट्ठे में काम करने का मन करता है? उन्होंने सीधा जवाब दिया, मन नहीं करता, लेकिन पेट पालने के लिए करना पड़ता है. रोपा के समय ही ज़्यादातर लोग घर लौटते हैं. बाकी पूरा साल कमाने वाले हाथ बाहर रहते हैं.
सुरेश परहिया की उम्र 45 साल है. वो बेंगलुरु में सेटरिंग का काम करते हैं. महीने की कमाई करीब 10 हज़ार रुपये है. इन्हीं 10 हज़ार में कमरे का किराया निकलता है, घर पैसा भेजा जाता है और अपना खर्च चलता है. घर में कोई बीमार पड़ जाए, तो इलाज भी इन्हीं पैसों से. एक आदमी की कमाई पर दो जगहों का खर्च टिका है.
जब कमाई इतनी कम हो, तो राशन ही सहारा बनता है. लेकिन यहां राशन भी पूरा नहीं मिलता. गांववालों के मुताबिक़ हर महीने नहीं, 2-3 महीने में एक बार मिलता है. उसमें दाल, नमक और चावल होता है.

खुजू बताते हैं कि एक बार उन्होंने घर लाकर अपने तराज़ू पर तौला तो वज़न 33 किलो निकला. यानी 2 किलो काटकर दिया गया था. जो बोलता है, उसे राशन वाला बढ़ाकर पूरा 35 किलो दे देता है. लेकिन गांववाले कहते हैं कि बोलने से फ़ायदा क्या, हम गरीब लोग हैं, कितना बोलेंगे.
वहीं मालती देवी बताती का कहना है कि सरकार जो राशन देती है, वह 8 दिन में ख़त्म हो जाता है. उसके बाद वे जंगल जाती हैं, वहां जो मिलता है उसे तोड़कर लाती हैं और उसे पकाकर चावल के साथ बच्चों को खिलाती हैं. महीने के बाकी दिन थाली में यही सब रहता है.
गांव में पानी की भारी दिक्कत है. टंकी लगी है, पर गांववालों के मुताबिक़ उससे कभी पानी नहीं आया. वह बस देखने के लिए है. यही हाल असुर समुदाय के गांव ढोड़ीकोना, बिरजिया समुदाय के गांव दौना और परहिया समुदाय के गांव तेहराई का है. तीनों गांवों में टंकी लगी है और तीनों में पानी नहीं आता. गांव का कुआं भी सूख जाता है.

अस्पताल से स्कूल तक, पड़ताल परत-दर-परत
गांव में सड़क नहीं है. एक अस्पताल इसी साल बना है, पर अब तक चालू नहीं हुआ. इमरजेंसी में किसी के बीमार पड़ने पर मनिका जाना पड़ता है. वहां तक पहुंचने के लिए गाड़ी बुलानी पड़ती है. उसका किराया 1000 से 1500 रुपये तक है. जिस गांव में एक आदमी की महीने भर की कमाई 10 हज़ार है, वहां एक बार अस्पताल पहुंचने का खर्च ही उसका सातवां-आठवां हिस्सा बन जाता है.
गांव में 52-53 घर हैं, पर स्कूल जाने वाले बच्चे सिर्फ़ 15-16. स्कूल में पांचवीं तक पढ़ाई होती है, उसके बाद बच्चों को गांव से बाहर जाना पड़ता है. गांववाले खुद मानते हैं कि लोग इतने जागरूक नहीं हैं कि बच्चों को पढ़ने भेजें. 15 साल की सुमंती कुमारी 10वीं की छात्रा है. वो गांव से बाहर जाकर पढ़ती हैं. उसका कहना है कि अगर गांव में स्कूल होता, तो उन्हें बाहर जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती.
घर बनाने के लिए ग्रामीण आवास योजना का पैसा आया था. गांववालों का आरोप है कि ठेकेदार ने दबाव बनाया कि आप लोग घर नहीं बना पाएंगे, हम बनवा देंगे. गांववालों ने पैसा ठेकेदार को दे दिया. खाते में 1 लाख 30 हज़ार रुपये आए थे, लेकिन उससे सिर्फ़ दीवार खड़ी हुई और छत ढाली गई. इसके अलावा कुछ नहीं हुआ.

जुलाई 2025 तक राज्यसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक़ झारखंड में करीब 4.6 लाख घर मंज़ूर हुए थे और उनमें से मात्र 1.36 लाख ही पूरे हुए थे.
सबसे बड़ी मुश्किल हाथी के हमलों से बचने का रहता है. मालती देवी एक बार फिर कहती हैं, इस इलाके में कभी भी हाथी का हमला हो जाता है. मुआवज़ा भी नहीं मिल पाता, क्योंकि प्रक्रिया बहुत लंबी है. पहले नुकसान की फोटो करानी पड़ती है, फिर कागज़ जमा करने मनिका जाना पड़ता है. इसमें समय लगता है, पैसा लगता है, और जाने का साधन भी नहीं है. इतना सब कैसे करेंगे? इसलिए छोड़ देते हैं.
योजनाओं का हाल: कौन-सी पहुंची, कौन-सी नहीं
“आख़िरी बार साड़ी कब ख़रीदी थी, यह भी याद नहीं.”
आरती देवी, परहिया आदिवासी महिला
मईयां सम्मान योजना का लाभ गांव की महिलाओं को मिलता है. इसके अलावा गांववाले किसी और योजना का फ़ायदा नहीं गिना पाते. उज्ज्वला योजना यहां अभी तक नहीं पहुंची. कार्ड के नाम पर उनके पास सिर्फ़ आधार कार्ड है. आरती देवी कहती हैं कि सोना तो दूर, आख़िरी बार साड़ी कब ख़रीदी थी, यह भी याद नहीं.
सुरेश परहिया बताते हैं कि खेती-बाड़ी छोड़कर वोट देने के समय भी वे गांव लौटते हैं. मन में उम्मीद रहती है कि इस बार हमारे लिए कुछ होगा. लेकिन कोई लाभ नहीं मिलता और मन टूट जाता है.
कहानी वहीं लौटती है जहां से शुरू हुई थी. ज़मीन नहीं, इसलिए वनपट्टा नहीं. वनपट्टा नहीं, इसलिए खेती और रोज़गार नहीं. रोज़गार नहीं, इसलिए पलायन. और इस पूरे चक्र में तेहराई का परहिया हर चुनाव में वोट देने घर लौटता है, पर बदले में उसे टूटी उम्मीद के सिवा कुछ नहीं मिलता

