आनंद दत्त
बीजेपी के पॉलिटिकल नक्शे में एक रंग खटक रहा है. इस नक्शे को देखें तो बिहार, यूपी, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश तक भगवा रंग पटा पड़ा है. बीच खड़ा झारखंड बीते सात साल से इस रंग के प्रभाव या उपस्थिति से बचा हुआ है.
इसकी एक बड़ी वजह है राज्य की 28 आदिवासी रिजर्व सीट. साल 2019 विधानसभा चुनाव के वक्त इन 28 में से 26 पर तो साल 2024 के विधानसभा चुनाव में 27 सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है. लाख जतन के बावजूद आदिवासियों का विश्वास जीतने में पार्टी असफल रही है.
वह भी तब, जब बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, चंपाई सोरेन जैसे धाकड़ आदिवासी चेहरा पार्टी के पास है. मधु कोड़ा, गीता कोड़ा को भी इस लिस्ट शामिल कर सकते हैं.
अब इस लिस्ट में नया नाम जुड़ा है गजेंद्र सिंह पटेल का. राज्य की राजनीति में यह बिल्कुल नया नाम है. मूलतः छत्तीसगढ़ के रहनेवाले पटेल आदिवासी समाज से आते हैं और बीजेपी ने उन्हें झारखंड भाजपा का नया प्रभारी नियुक्त किया है.
एरयपोर्ट से सीधे करिया मुंडा के दर पर
सोमवार 5 अक्टूबर को पहली बार वो झारखंड आए. साथ में सह प्रभारी निवेदिता सिंह और सौरभ सिंह भी मौजूद थे. परंपरा के मुताबिक पहले पार्टी मुख्यालय जाने और कार्यकर्ताओं से मिलने के बजाय गजेंद्र सिंह एयरपोर्ट से सीधे बिरसा मुंडा की जन्मस्थली खूंटी स्थिति उलिहातू गांव पहुंचे.

ये खास बात नहीं थी, खास बात ये थी कि वो करिया मुंडा से मिलने और पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेने पहुंचे. आप कह सकते हैं, शायद उनका होमवर्क पहले के प्रभारियों के मुकाबले ज्यादा माना जा सकता है.

बता दें, करिया मुंडा बीजेपी के वो आदिवासी नेता हैं, जिन्होंने लगातार सात बार लोकसभा का चुनाव जीता. लोकसभा के उपाध्यक्ष भी रहे. साल – में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से भी नवाजा. बेदाग छवि, निर्विवाद चेहरा.
क्यों बेहतर माना जाना चाहिए, इसको समझने के लिए 2019 में लौटना होगा. रघुवर दास की सरकार थी. मुख्यतः खूंटी जिले में पत्थलगड़ी आंदोलन की शुरुआत हो गई थी. 20 हजार से अधिक लोगों को देशद्रोह का मुकदमा लाद दिया गया.
चुंकी करिया मुंडा ने दशकों तक खूंटी लोकसभा का नेतृत्व किया था, ऐसे में उन्होंने खुद आगे बढ़कर कहा कि रघुवर सरकार इस मुद्दे को गलत तरीके से हैंडल कर रही है. अगर सरकार चाहे तो वो आगे बढ़कर इसे हल करने में मदद कर सकते हैं. गुमान में चल रही बीजेपी को ये सलाह दौ कौड़ी का लगा.
ठीक उसी वक्त एक और बड़ी राजनीतिक पहलकदमी चल रही थी. रघुवर सरकार ने निर्णय लिया कि आदिवासी इलाकों में गैर-मजरुआ जमीन का चिन्हिकरण कर के लैंड बैंक बनाएंगे और फिर उसे राज्य में निवेश को इच्छुक कंपनियों को दिए जाएंगे. इस पहल ने राज्यभर के आदिवासियों के मन में डर बिठा दिया कि अगर बीजेपी सरकार आती है, तो उनकी जमीन छीन ली जाएगी.
करिया मुंडा अपने घर पर बैठे अखबार पढ़ते, टीवी पर खबरें देखते, मसोस कर रह गए. लेकिन किसी ने उन तक पहुंचना और मदद मांगना जरुरी नहीं समझा. चुनाव हुआ और परिणाम ने सबको चौंका दिया. बीजेपी सरकार से बाहर हो चुकी थी. 28 में से 26 आदिवासी सीटों पर हार चीख कर बता रहा था कि गुमान छोड़, अगर करिया मुंडा से मदद ली होती तो शायद यूं पैरों तले जमीन नहीं खिसकी होती.
चुनाव फिर हुए. इस बार तो एक दम आगे बढ़कर आदिवासी मतदाताओं ने 28 में से 27 सीटों पर बीजेपी को नकार दिया. सारे हथकंडे धरे के धरे रह गए.
अब प्रभारी बदल गए हैं. मिजाज बदलने की आहट भी सुनाई देने लगी है. प्रभारी मुख्यालय से पहले करिया मुंडा के घर पहुंचे. सबने आशीर्वाद लिया. फोटो खिंचाई. हालांकि अभी शुरुआत है. इस संदेश के मुख्य मकसद कि जमीनी कार्यकर्ता पहले, को टॉप लीडरशिप कितना आत्मसात कर पाएगी, आगामी परिणाम इसी पर निर्भर करेगा.
चुनौतियां तो अभी शुरू हुई है
गजेंद्र पटेल शायद इससे पहले समीर उरांव की टीम में जरूर शामिल रहे हैं, लेकिन पहली बार राजनैतिक तौर पर झारखंड आए हैं. ऐसे में वो झारखंड के साथ-साथ यहां के कारकर्ताओं को समझने और फिर टास्क तैयार करने की दिशा में मुड़ेंगे.
पहली चुनौती होगी पूर्व के नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच गैप को पाटना. नेताओं के खास गुट की सुनने के बजाय पूरे संगठन को सुनना. रांची लॉबी के प्रभाव को कम कर, प्रदेश बीजेपी को एक एहसास देना कि केवल रांची बीजेपी के बजाय राज्य बीजेपी मुख्य आवाज है.
एक तरफ जहां झारखंड कांग्रेस के नेता और सांसद सुखदेव भगत को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया गया. सुखदेव भगत बतौर प्रभारी अपने पहले ही दौड़े में लगाता तीन दिनों तक पार्टी के कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों संग मैराथन बैठक लेकर रवाना हुए, वहीं गजेंद्र पटेल दो दिनी संक्षिप्त दौरे पर पहुंचे.
इन सब के बीच सबसे ज्यादा इंतजार बीजेपी के कार्यकर्ताओं को उस उत्साह का इंतजार है, जो वह बीते सात सालों से महसूस नहीं कर पा रहे हैं.

