रिपोर्ट – कनिका राणा/वसीम अख्तर
फोटो – रुस्तम खलखो
टाटा स्टील कंपनी की कुल बाजार पूंजीकरण 2.22 लाख करोड़ रुपए से अधिक है. जेएसडबल्यू लिमिटेड कंपनी का कुल बाजार पूंजीकरण 3,01,524 करोड़ रुपए से अधिक है. स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड कंपनी का कुल बाजार पूंजीकरण 72,078 करोड़ से अधिक है. तीनों की एक समानता है कि ये लोहा का उत्पादन करती है.
ये रकम दिखने में कैसा होगा, इसका महज फतांसी दुनिया में अंदाजा ऐसे भी लगा सकते हैं कि अन्ना आंदोलन के समय बाबा रामदेव ने कहा था कि भारत का काला धन स्विस बैंक में इतना पड़ा है कि इस रकम से स्वर्ग तक पैसों की सीढ़ी बनाई जा सकती है.
खैर, मूल बात पर लौटते हैं. साल 2015 में हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट में लालदेव असुर को उन अंतिम असुर आदिवासियों में बताया गया है, जो लोहा गलाने की पारंपरिक कला को जानते हैं. उनके मुताबिक पारंपरिक लौह गलाने की प्रक्रिया में लौह अयस्क से भरपूर पत्थरों को पीसकर कोयले के साथ एक बेलनाकार भट्ठी में डाला जाता था. इसके बाद हिरण की खाल से बने धौंकनी की मदद से भट्ठी में हवा पहुंचाई जाती थी.
इस तरह तैयार लोहे का इस्तेमाल खेती के औजार और घरेलू सामान बनाने में किया जाता था, इन वस्तुओं को आसपास के ग्रामीण बाजारों में बेच दिया जाता था. दुनिया को लोहा बनाने की कला जिस असुर जनजाति ने सिखाया वो आज खत्म होने के कगार पर तो पहुंच ही चुकी है, जो बची भी है, उसे आज तक बिजली के एक बल्ब का इंतजार है.

अंतिम आदिवासी कड़ी में आज हम पड़ताल कर रहे हैं इसी असुर जनजाति की. साल 2011 की जनगणना और रांची स्थित रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान के मुताबिक झारखंड में असुर जनजाति की आबादी महज 22,459 बची है. दशकों पहले अपनी मूल पहचान यानी लोहा गलाने की कला से दूर हो चुका यह समुदाय अब पूरी तरह से खेती और मजदूरी पर शिफ्ट हो चला है.
असुर कभी शिकार और संग्रह पर निर्भर रहने वाले समुदाय थे. उनका जीवन उन जंगलों से गहराई से जुड़ा हुआ था, जिनमें वे रहते थे. लेकिन जब ब्रिटिश सरकार ने 1865 में भारतीय वन अधिनियम (Indian Forest Act) लागू किया, तो असुरों समेत कई जनजातियां अपनी जड़ों से कट गईं, क्योंकि इस कानून ने जंगल से मिलने वाले उत्पादों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया था.
आजादी के बाद भारत सरकार ने भी इन घुमंतू जनजातियों को लगभग मजबूर कर दिया कि वे एक जगह बस जाएं और कृषि आधारित जीवनशैली अपना लें. ऐसे में यह हुनर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक नहीं पहुंच सका. बाप ने बेटे को नहीं सिखाया, या सिखाने का वक़्त ही नहीं मिला, क्योंकि पेट पालने की जद्दोजहद में यह परंपरा पीछे छूट गई. आज की पीढ़ी ने अपने पिता से पूछा था कि क्या उन्हें लोहा गलाना आता है, जवाब “ना” में मिला. यहीं से यह परंपरा हमेशा के लिए खत्म हो गई.
राजधानी रांची से 184 किलोमीटर दूर लातेहार जिले के महुआडांर प्रखंड के ढ़ोढ़ीकोना गांव में बिजली के खंभे तो साल 2018 में ही लग गए थे. लेकिन उन खंभों में न तो तार लगे, न ही असुर जनजाति बहुल इस गांव में आज तक बिजली पहुंची. ये आज भी ढ़िबरी का इस्तेमाल कर रहे हैं. गांव के 18 साल के युवक मनोज असुर आंध्रप्रदेश में मजदूरी करते हैं. धान रोपाई के लिए बीते अगस्त में गांव लौटे थे. पांचवी तक पढ़े मनोज कहते हैं, हमलोग तो बिजली, साफ पानी, अच्छी पढ़ाई जैसी चीजों की उम्मीद नहीं रखते हैं. खुद से जो चीजें बन पड़ती है, उतना करते हैं, उसी से खुद को ऊपर उठाने की कोशिश कर रहे हैं.
गांव के 80 प्रतिशत से अधिक पुरुष दूसरे राज्यों में जाकर काम कर रहे हैं. आम बोलचाल की भाषा में गाँव वाले “प्लाइन जाना” कहते हैं. इसी गांव के 60 साल के निर्मल असुर रांची में रहने लगे हैं. खुद मजदूरी कर रहे हैं, लेकिन बच्चों को पढ़ा रहे हैं.
गांव में सड़क की समस्या इतनी गंभीर है कि छोटी से छोटी ज़रूरत के लिए भी ग्रामीणों को महुआडांड़ जाना पड़ता है. गांव में सड़क नहीं है, सो किसी के पास बाईक भी नहीं है. न्यूनतम जरूरत के लिए भी प्रखंड मुख्यालय यानी महुआडांर जाने में बतौर किराया 200 रुपये (आते-जाते सौ-सौ) ख़र्च हो जाता हैं.

इसका असर ये है कि किसी के बेहद गंभीर बीमार पड़ने पर भी केवल स्थानीय जड़ी-बूटी पर ही निर्भर रहने का ऑप्शन इनके पास है. अगर कभी हिम्मत कर भी लिया कि उपचार कराना है, तो खाट पर मरीज को लाद कर ले जाने के अलावा और कोई चारा नहीं है.
असुराइन से सरकारी कागजों पर देवी बन चुकी मंजू देवी और सुषमा देवी बताती हैं कि चावल, मड़ुआ, सब्ज़ी, सब कुछ खुद उगाकर ही खाते हैं. यहां तक कि तबीयत बिगड़ने पर भी शहर जाने की नौबत टाली जाती है.
“पानी साफ़ करें कि रोपा रोपें? रोपा नहीं करेंगे तो खाएँगे क्या?”
गांव में हम पानी ढूंढ़ते-ढूंढ़ते एक कुंऐ के पास पहुंचे. वहां हमें प्रीता असुर पानी भरते दिखीं. वो बताती हैं, पानी की समस्या इस गांव की सबसे गहरी मुश्किल है. कुएं का पानी बेहद गंदा रहता है. काई लगा, हरा हो चुका पानी. इसी पानी से गांव के लोग सारा काम करते हैं. पीते हैं, नहाते हैं, सब कुछ. बरसात के मौसम में पानी की हालत और ख़राब हो जाती है, तब पानी को कपड़े से छानकर साफ़ करना पड़ता है.
रोपा के सीज़न में पानी साफ़ करने तक की फ़ुर्सत नहीं मिलता, इसलिए गंदा पानी ही पिया जाता है. प्रीता के दर्द को ऐसे समझिये. वो कहती हैं, “पानी साफ़ करें कि रोपा रोपें? रोपा नहीं करेंगे तो खाएँगे क्या?”
यही परेशानी बच्चों तक पहुंचती है. ग्राउंड पर एक बच्चा मिला, जो खेत के नीचे से रिसकर निकलने वाले पानी ‘चुआँ’ से पानी अपने हाथ से माँगने कि मुद्रा में भरता दिखा. बच्चा स्कूल के बीच पानी भरने आया था. स्कूल में पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. स्कूली बच्चे बारी-बारी से स्कूल से कुछ दूर जाकर पानी भरकर लाते हैं. वह पानी भी पीला और गंदा दिखता है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े तैरते नज़र आते हैं. नल-जल योजना के तहत टंकी लगने के शुरुआत के डेढ़ महीने पानी आया, उसके बाद आज तक टंकी से एक बूंद पानी नहीं आया.

देश में दशकों से आरक्षण और जनसंख्या को लेकर बड़ी बहस जारी है. दूसरी तरफ़ जो समुदाय पहले से ही खत्म होने की कगार पर हैं, उनकी हालत पर किसी का ध्यान नहीं है. धीरे-धीरे उनकी पहचान भी मिटती जा रही है. ढ़ोढ़ीकोना में अब गिने-चुने लोगों के अलावा कोई असुरी भाषा तक नहीं बोल पाता. हालात ये हैं कि, गांव में सिर्फ़ तीन लड़कियों ने मैट्रिक पास किया है. इनमें से एक हैं मैट्रिक पास प्रीता असुर (20), जो बताती हैं कि गांव में रोज़गार न होने और बाहर जाकर कुछ न कर पाने की मजबूरी में अब वे घर के काम-काज में लगी हैं. दूसरी हैं 16 साल की रातरानी असुर, जो महुआडांड़ जाकर पढ़ाई कर आईं और अब घर पर बैठी हैं. वे नर्स बनना चाहती थीं, लेकिन पैसों की कमी के कारण सपना अधूरा रह गया.
20 साल से कोई अधिकारी नहीं पहुंचा गांव
सरकार बुज़ुर्गों को 1000 रुपये वृद्धा पेंशन देती है, लेकिन इतने में गुज़ारा नहीं चलता. यही वजह है कि 60 साल की उम्र में भी निर्मल असुर जैसे बुज़ुर्गों को दूसरों के खेत में हल जोतना पड़ता है. मंजू देवी और सुष्मा देवी बताती हैं कि इस पेंशन से सिर्फ़ तेल, साबुन, नमक जैसी ज़रूरी चीज़ें ही ख़रीदी जाती हैं. पक्का मकान नहीं है, बिजली नहीं है, सड़क नहीं है, शौचालय नहीं है. शौचालय के लिए सरकारी योजना ज़रूर आई थी. दीवारें भी बनीं, लेकिन दरवाज़ा तक नहीं लगाया गया. नतीजा यह कि शौचालय होते हुए भी काम का नहीं है.
साल 2004-06 के दौरान केके सोन लातेहार के जिलाधिकारी थे. वो आखिरी जिलाधिकारी थे, जो इस गांव तक पहुंचे थे. उस दौरान उन्होंने गांव में एक बैठने की जगह बनवाई थी. ग्रामीणों के मुताबिक उनका ट्रांसफर हुआ और उसके बाद फिर कोई नहीं आया. गांव कि महिलाएं बताती है जहां भी महिलाओं के लिए शिविर लगता हैं, ग्रामीण जाते हैं, अपनी बात रखते हैं, लेकिन वहां भी कुछ नहीं होता.
पिछली दो पीढ़ियों से असुर समुदाय की लोहा गलाने की तकनीक पूरी तरह खत्म हो चुकी है. जो पहचान कभी उनका गौरव था, वह अब सिर्फ़ किताबों और यादों में बचा है.

