कनिका राणा/वसीम अख्तर
फोटो – रुस्तम खलखो
बीते कई सालों से झारखंड में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि परिसीमन होना है या होना चाहिए. परिसीमन यानी राज्य के राजनीतिक सीमांकन को नए सिरे से, विस्तृति और परिवर्तित रूप में तय किया जाना. इन चर्चाओं के बीच आदिवासी नेताओं को इस बात का डर सता रहा है कि जिस झारखंड की पहचान राजनीतिक और सामाजिक तौर पर आदिवासी बहुत प्रदेश की रही है, परिसीमन के बाद इसका यह नक्शा बदल जाएगा. बहुत संभावना है कि झारखंड का आदिवासी जो इस वक्त बेहद सक्षम तौर पर राजनीति के लिहाज से निर्णायक भूमिका है, उसमें शायद कमी आ जाए.
जाहिर है, अगर आदिवासी बहुल या आदिवासी प्रधान राज्य का टैग हटने की संभावना भी अगर बनी, तो इसमें सबसे अंतिम या फिर कह लीजिये कि भौगोलिक तौर पर भी अंतिम छोर पर निवास कर रहे आदिम जनजातियों का हश्र क्या होगा. शायद …बेहद भयानक.
ऐसे में जोहार लाइव ने राज्य के सात आदिम जनजातियों के वर्तमान स्थिति के सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति के दस्तावेजीकरण की तरफ एक छोटा सा कदम बढ़ाया है. अगले सात दिनों तक हम हर दिन एक-एक आदिम जनजातियों की स्थिति की रिपोर्ट आप तक पहुंचाएंगे. इस सीरीज को हमने अंतिम आदिवासी नाम दिया है. आज पहली कड़ी में मिलवाते हैं कोरवा समुदाय से.
हम लातेहार जिले के महुआडांर प्रखंड के ग्वालखाड़ गांव पहुंचे, पत्थर से भरे फिसलन वाले रास्ते चढ़ते-उतराते हम जब यहां पहुंचे तो किसी आम आदिम जनजाति बहुत गांव की तरह खेत, पहाड़, अधनंगे बच्चे, सुंदर और साफ घर, साफ आसमान, जानवर… सब दिखने लगे.


तभी एक आवाज ने रोका. “चलते-चलते मर जाएंगे”-
यह महज एक वाक्य नहीं, बल्कि गवालखाड़ गांव में रहने वाली कोरवा जनजाति के लोगों के रोज़मर्रा के संघर्ष की दस्तखत थी. हर दिन भोजन को सुनिश्चित करने के लिए जंगल की सूखी लकड़ियों पर इनको सबसे ज्यादा भरोसा है. लकड़ी काटने के बाद लगभग 50 से 60 किलो वजनी लकड़ी के इस बोझ को लेकर दो घंटे के पैदल सफर पर निकलते हैं.
इन रास्तों के लिए इनका शरीर और दिमाग भले ही अभ्यस्त है, लेकिन खतरा हर दिन बराबर मंडराता रहता है. कभी फिसलन का, कभी जंगली जानवरों का, तो कभी दो घंटे पैदल पहुंच कर प्रखंड मुख्यालय महुआडांर पहुंचने के बाद इस सूखी लकड़ी के न बिकने का.
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जंगल तक पहुंची छूआछूत, प्यास बुझाना सबसे दूभर
संघर्षों की इस रूटीन को समझने के दौरान एक बेहद महीन और अचंभित करने वाली बात भी सामने आई. ग्वालखाड़ में दो समाज के लोग रहते हैं. इसमें आदिम जनजाति कोरवा के अलावा नगेसिया समुदाय के लोग भी रहते हैं. दोनों ने गांव का दो छोड़ पकड़ रखा है.
इनके बीच भेदभाव की भावना गहराई तक बैठी है, कि यह पानी भरने से लेकर स्कूल में पढ़ाई तक हर जगह नज़र आता है. मसलन, अगर नगेसिया समुदाय का कोई व्यक्ति गांव के चुंआ से पानी भरने आता है, उस वक्त वहां खड़े कोरवा जाति के व्यक्ति या बच्चे को खड़ा रहना पड़ता है.
अगर कोरवा जाति का कोई बच्चा इसी चुएं से पानी भर रहा है, तो नगेसिया न समुदाय का बच्चा पहले उस जगह को धोता है, फिर पानी भरता है.
एक कदम और बढ़ते हैं और छूआछूत की गहरी होती परत को उघेड़ कर दूसरी परत देखते हैं. पास के राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय में बांटे जा रहे मिड-डे मील इसका सबूत था. यहां तीनों ही समाज के बच्चों के लिए अलग थालियां थी. तीनों को अलग-अलग समय पर भोजन परोसा जा रहा था. सबसे पहले किसान समुदाय के बच्चों को, फिर नगेसिया समुदाय और अंत में कोरवा आदिम जनजाति के बच्चों को खाना दिया जाता है.
12 साल की जसिंता कोरवाइन इसकी भुग्तभोगी है. जोहार लाइव से वो कहती है, हमलोगों को मिड-डे मील किसान समुदाय के बच्चों के खाने के बाद मिलता है. यहां तक कि जब हम पानी भरने जाते हैं, तब किसान समुदाय के लोग पहले उस जगह को धोते हैं, फिर पानी भरते हैं.
गांव के पारंपरिक ग्राम प्रधान राधे श्याम नगेसिया (किसान) समुदाय से हैं, ऐसे में किसान समुदाय का प्रभाव अधिक है. स्कूल में रसोइये का काम भी उनकी बहु के जिम्मे है, ऐसे में सामाजिक भेदभाव की जड़ों को गहरा करना और आसान हो जा रहा. इसका असर ये है कि यह भेदभाव कोरवा समुदाय के बच्चों के मन में पढ़ाई से लेकर खाने तक, हर तरह से मन में बैठ गया है. जिसके वजह से बच्चों का स्कूल जाना छूट गया हैं.

गांव में पानी की कोई बुनियादी सुविधा नहीं है. पानी लाने के लिए गांव वालों को करीब एक से डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर एक चुआं (झरने जैसा प्राकृतिक स्रोत) तक जाना पड़ता है, जिसके पानी में गंदगी और कीड़े तक मिले होते हैं. रिपोर्टिंग के दौरान हमने देखा कि भारी बारिश में भी करीब 10 से 12 साल की दो बच्चियां इसी चुआं से पानी भर रही थीं. जसिंता कोरवाइन 12 साल की है और स्कूल जाती है. बच्चियों ने बताया कि धूप हो या बारिश, पीने का पानी हो या नहाने का, हर ज़रूरत के लिए वे यहीं आती हैं. गांव में हर परिवार के लोग बारी-बारी से ज़रूरत पड़ने पर इसी चुआं से पानी लाते हैं.
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कागजों पर तैर रही सरकारी योजना
गांव वालों का कहना है कि उन्हें सरकार की तरफ से किसी भी तरह की सुविधा नहीं मिली है. प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का हाल भी गांव में बेहद खस्ता है. मुखिया के प्रयासों से यह योजना गांव तक पहुंची तो ज़रूर, लेकिन शुरुआत में एक बार गैस सिलेंडर भरकर मिलने के बाद दूसरी बार आई सरकारी सिलेंडर भरवाने की सुविधा ही गायब हो गई.
असल सवाल यह है कि आर्थिक तंगी से जूझता यह पूरा गांव पेट भरेगा या गैस सिलेंडर भरवाएगा. महिलाओं को सिर्फ वृद्धा पेंशन की सुविधा मिलती है. पीएम जनमन योजना, बिरसा आवास योजना जैसी किसी भी योजना का लाभ इस गांव तक नहीं पहुंचा है.
गांव के बच्चे ज़्यादातर तीसरी कक्षा तक ही पढ़ पाते हैं, उसके बाद मजदूरी करने चले जाते हैं, क्योंकि घर चलाने के लिए हर हाथ का कमाना ज़रूरी हो जाता है. गांव में सबसे पढ़े-लिखे व्यक्ति सुरेंद्र कोरवा हैं, जो दसवीं पास हैं.
वो कहते हैं, फिलहाल स्थिति ये है कि गांव के बच्चे केवल अपना नाम लिखना जानते हैं. मैंने दसवीं पास की, शहर जाकर नौकरी की. एक बाइक के शो-रूम में पर्ची काटने का काम मिला, जहां हर दिन 200 रुपए मिलते थे. बाद में वो भी मिलना मुश्किल होने लगा. अब मैं भी जंगल से लकड़ी काटकर बेचता हूं, उससे थोड़ा ज्यादा तो कमा लेता हूं.
घर के नाम पर सिर्फ एक बक्सा, बिस्तर के नाम पर एक चटाई
गांव के घरों की हालत बेहद दयनीय है. घर के नाम पर बस एक बक्सा है, बिस्तर के नाम पर एक चटाई है जिस पर लोग सोते हैं, और ओढ़ने के लिए एक कंबल. राशन की स्थिति भी बेहतर नहीं हैं. डीलर राशन काटकर देता है, दो किलो कम तौलकर और आवाज़ उठाने पर भी कोई उनकी बात नहीं सुनता. सरकार से जो चावल, दाल, चीनी और कपड़े मिलने चाहिए, वे कभी उन तक पूरी तरह पहुंचते ही नहीं. बीच में ही गायब हो जाते हैं. जो चावल मिलता भी है, वह महीने भर के लिए पर्याप्त नहीं होता.
गांव की सुध लेने कोई बड़ा अफसर या फिर चाहे वह विधायक हो, या डीसी, आज तक कोई नहीं आया.

गांव वालों से जब पूछा कि उन्होंने आखिरी बार अपने लिए क्या खरीदा था, तो जवाब मिला कि आलू और सोयाबीन जैसी छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए भी उन्हें महुआडांड़ तक जाना पड़ता है. पहाड़ पर कुछ भी उपलब्ध नहीं है, इसलिए छोटी से छोटी ज़रूरत के लिए भी उन्हें नीचे शहर उतरना पड़ता है.
गांव के लोग जंगल से कुकड़ी, बासकरील और साग जैसी चीज़ें लाकर खाते हैं. यह लोग भटुए के साग को ही दाल की तरह इस्तेमाल करते हैं. जो दाल आम तौर पर घरों में खाई जाती है, वह इस गांव के लोगों की थाली तक नहीं पहुंचती. जंगल से मिलने वाली इन चीज़ों पर भी अब उनका अधिकार धीरे-धीरे छिनता जा रहा है. क्योंकि इन्हें अब तक वन पट्टा के मिलने का इंतजार है.
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आर्थिक तंगीः पहले साथ रहते हैं, फिर पैसा होने पर शादी करते हैं
गांव में सरहुल, जितिया और होली जैसे त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें हड़िया, पुआ और पकवान के साथ पूड़ी-सब्ज़ी बनाई जाती है. शादी को लेकर भी इस समाज के अपने खास रीति-रिवाज़ हैं. आर्थिक तंगी के कारण अक्सर विधिवत शादी नहीं हो पाती. लड़का पक्ष लड़की को देखने जाता है, पसंद आने पर उसे अपने घर ले आता है और दोनों पति-पत्नी की तरह साथ रहने लगते हैं.
असली शादी तब होती है जब उनके अपने बच्चों की शादी की बारी आती है, उससे ठीक पहले खुद की शादी संपन्न की जाती है. शादी की रस्म में लड़के पक्ष के लोग ढोल-मंजीरे के साथ बारात लेकर लड़की के घर जाते हैं. इनके यहां “अगुवा” (रिश्ता जोड़ने वाला) शादी करवाता है, न कोई पूजा होती है और न ही कोई कथा. बस लड़का-लड़की को नहलाकर, हल्दी लगाकर, सिंदूर भरकर और खाना खिलाकर बारात लड़की को घर ले आती है.
गांव की एक महिला, शर्मिला कोरवाइन की कहानी वहां के हालात को साफ तौर पर बयां करती है. करीब 22 साल की शर्मिला के पांच बच्चे हैं. सबसे बड़ा बेटा करीब सात साल का, दूसरा बेटा पांच साल का, तीसरी बेटी दो साल की, और चौथे-पांचवें जुड़वां बेटे. शर्मिला खुद कमज़ोर हैं, और उनके पांचों बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. आंगनबाड़ी की तरफ से उन्हें पोषाहार नहीं मिलता और बच्चे कई तरह की बीमारियों से जूझ रहे हैं.
शर्मिला बताती हैं कि आंगनबाड़ी सेविका ने उन्हें कभी परिवार नियोजन की जानकारी तक नहीं दी. गर्भावस्था के दौरान उन्हें किसी तरह की मदद नहीं मिली. हर बार बच्चे का जन्म घर पर ही हुआ, न गर्भावस्था के समय कोई देखने आया, न प्रसव के बाद. न तो कभी अस्पताल की कोई सुविधा उन्हें मिली और न ही बच्चों का टीकाकरण हो पाया.
इन तमाम मुश्किलों के बावजूद, कोरवा समाज की कई महिलाएं यह ज़रूर कहती हैं कि वे चाहती हैं उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले. यही उम्मीद है, जो पहाड़ की चोटी पर बसे इस गांव को हर दिन आगे बढ़ने का हौसला देती है. भले ही सरकार की योजनाएं यहां तक पहुंचने का रास्ता आज तक न ढूंढ पाई हों.

