रिपोर्ट – कनिका राणा/वसीम अख्तर
सभी फोटो – रुस्तम खलखो
‘’वे मुझसे मेरा आधार मांगते हैं
वे मांगते हैं अंगूठे की छाप,
आंखों की पुतलियों का स्कैन
वे कहते हैं – ‘इस बारह अंकों की संख्या में दर्ज है तुम कौन हो.’’
‘बोधिसत्व’ शीर्षक से अनुज लुगुन जब इस कविता को लिख रहे होंगे, शायद उन्हें अंदेशा रहा होगा कि झारखंड के आदिम जनजातियों के पहचान को खत्म के लिए कई स्तर पर धोखाधड़ी चल रही है.
राज्य के आठ आदिम जनजातियों का सरकारी दस्तावेजों से टाइटल यानी उनकी जातिगत पहचान को खत्म किया जा रहा है. जसिंता कोरवाइन अब जसिंता कुमारी हो चुकी है. सानियो असुराइन अब सानियो कुमारी बन चुकी है. सुशांति बिरहोर भी सुशांति देवी बन चुकी है.
रातरानी कुमारी, बिसरी देवी, कांति देवी जैसे सैंकड़ों-हजारों महिलाओं, बच्चों के सरकारी पहचान पत्र (आधार, मतदाता, बैंक खाता, पैन आदि) को देखकर कोई यह नहीं कह या बता पाएगा कि ये लोग उस आदिम जनजाति से आते हैं, जिन्हें भारत सरकार खत्म होने के कगार पर पहुंच चुकी जानजाति का दर्जा देती है.
भारत सरकार के केंद्रीय आदिवासी मंत्रालय के मुताबिक देशभर में कुल 730 आदिवासी समूह निवास करती है. इनमें से 75 समूहों को पर्टिकूलर वल्लनरेबल ट्राइबल ग्रुप (पीवीटीजी) यानी विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह का दर्जा दिया गया है.

राम दयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान (TRI), रांची और 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड की आठ विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) समुदायों की कुल आबादी 2,92,359 है. यह राज्य की कुल अनुसूचित जनजाति (ST) आबादी का करीब 3.38% और राज्य की कुल आबादी का मात्र 0.886 प्रतिशत. वहीं देश की कुल आबादी के लिहाज के देखें तो 0.024 प्रतिशत मात्र है.
सभी आठ आदिम जनजातियों की जनसंख्या को देखें को इसी आंकड़े के मुताबिक माल पहाड़िया झारखंड का सबसे बड़ा PVTG समुदाय है. इसकी आबादी 1,35,797 है. इसके बाद सौरिया पहाड़िया की आबादी 46,222, कोरवा की 35,145, परहिया की 25,585, असुर की 22,459, बिरहोर की 10,726, सबर की 9,688 और बिरजिया की मात्र 6,276 है.
जाहिर है, ये समुदाय आजादी के 79 साल बाद भी अस्तित्व की लड़ाई में ही उलझा हुआ है. उलझा ही नहीं, बल्कि हर कदम पर इस लड़ाई में मात भी खा रहा है. जोहार लाइव की टीम ने तीन जिलों से, सात दिनों में कुल 732 किलोमीटर का सफर तय कर राज्य के 8 आदिम जनजातियों में से 7 तक पहुंचा.
इस दौरान जो नतीजे सामने आए, वो बेहद चौंकाने वाले थे. हर समुदाय के पुरुष और महिलाओं के मूल टाइटल उनके आधार कार्ड या अन्य पहचान पत्रों से गायब मिले. उसकी जगह सिर्फ “देवी”, “कुमार” या “कुमारी” दर्ज कर दिया गया है.
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पहचान गायब, लोग बेबस

देश की राजधानी नई दिल्ली से 1407 किलोमीटर और झारखंड की राजधानी रांची से 184 किलोमीटर दूर लातेहार जिले के महुआडांर प्रखंड के दौना गांव की बिरजिया समुदाय निवास करती है. इसकी कुल आबादी पूरे राज्य में 6,276 है. गांव के कमल बिरजिया के आधार कार्ड में पत्नी बसंती बिरजियाईन का नाम तो सही दर्ज है, लेकिन बच्चों के कार्ड में सिर्फ “कुमार” और “कुमारी” लिखा है.
दौना गांव से लगभग 15 किलोमीटर दूर ग्वालखार गांव में कोरवा समुदाय बसती है. इसकी कुल आबादी पूरे राज्य में 35,145 है. गांव की 22 वर्षीय शर्मिला कोरवाइन जो कि अब शर्मिला देवी बन चुकी हैं, वो कहती हैं, ‘’मेरे आधार कार्ड में नाम के आगे “देवी” लिखा गया है. जबकि मेरे पति का नाम श्याम कोरवा है. यानी पति के नाम के साथ जनजातीय पहचान “कोरवा” जुड़ी है, पर पत्नी के नाम के आगे वह नहीं है.’’
मात्र 15 साल की उम्र में ब्याही शर्मिला के कुल पांच बच्चे हैं. जिसमें सबसे बड़ा बेटा सात साल का है. वो आगे कहती हैं, मेरे सभी बच्चों के नाम के पहचान पत्र में सरनेम की जगह “कुमार” और “कुमारी” दर्ज है, “कोरवा” नहीं.
ग्वालखार से 60 किलोमीटर दूर ढ़ोढ़ीकोना गांव में असुर समुदाय की बहुलता है, जिसकी आबादी पूरे राज्य में 22,459 मात्र है. कभी दुनियाभर में लोहा गलाने के अविष्कारक के रूप जाना जानेवाला यह समुदाय भी इससे अछूता नहीं दिखा. गांव की 10 साल की अंजली कुमारी से लेकर 22 साल की सानियो कुमारी और उम्रदराज़ रतरानी देवी, बिरसी देवी, कांति देवी तक, किसी के भी दस्तावेज़ में “असुर” शब्द नहीं मिला.
बता दें, हर आदिम जनजातियों में उनकी पहचान का प्रमुख माध्यम उनका सरनेम यानी टाइटल है. मसलन, बिरजिया पुरुषों के लिए “बिरजिया” और महिलाओं के लिए “बिरजियाईण”, कोरवा में “कोरवा” और “कोरवाईण”, असुर में “असुर” और “असुरयाईण” लिखा जाता है.
ठीक इसी तरह परहिया में “परहिया” और “परहायाईण”, जबकि बिरहोर समाज में पुरुष-महिला दोनों के लिए “बिरहोर” टाइटल इस्तेमाल होता है. यही टाइटल पीढ़ियों से इनकी जनजातीय पहचान का सबसे ठोस सबूत रहा है. लेकिन आधार कार्ड में इनमें से किसी का भी टाइटल दर्ज नहीं मिला.
अब हम महुआडांर से मनिका प्रखंड पहुंचे. यहां हमारी मुलाकात परहिया आदिम जनजाति से हुई, जिसकी आबादी पूरे राज्य में 25,585 है. प्रखंड के झाबर गांव में 50 वर्षीय सतन परहिया की मानें तो उनके गांव की लगभग सभी महिलाओं का टाइटल खत्म कर दिया गया है. यहां तक कि उनकी अगली पीढ़ी यानी उन महिलाओं के बच्चों के टाइटल भी अब नहीं हैं.
मनिका के बाद हम बालूमाथ प्रखंड के झाबर पंचायत के झाबर गांव की तरफ बढ़े. बिरहोर बहुल इस गांव के लोग भी इसी समस्या से जूझ रहे थे.
पड़ताल के अगले पड़ाव में रांची से 356 किलोमीटर दूर गोड्डा जिले में हम पहाड़िया आदिम जनजाति तक पहुंचे. जिले के भूस्की गांव में सौरैया पहाड़िया और गोगा गांव में माल पहाड़िया निवास करती है. ये भी पहचान की इसी लड़ाई में उलझे दिखे.
कैसे और क्यों हो रहा है ऐसा

सवाल साधारण है. आखिर ऐसा क्यों हो और क्यों किया जा रहा है? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए 15 साल पीछे जाना होगा. जब आधार बनाने के लिए गांव-गांव अभियान चलाया जा रहा था.
इन आदिम जनजाति बहुल इलाकों में जिन्हें इस काम का जिम्मा दिया गया, उनमें 90 फीसदी से अधिक लोग गैर-आदिवासी थे. उन्हें इनके टाइटल समझने में परेशानी हो रही थी. ऐसे में टारगेट पूरा करने के दवाब में बिना सोचे-समझे कि इसका परिणाम क्या होगा, उन आधार कर्मियों ने देवी, कुमारी, कुमार लिख दिया. इसमें सबसे अधिक नुकसान महिलाओं को हुआ.
दौना गांव के पंडित नेहरू मिडिल स्कूल की शिक्षिका ज्योति तिलरा उनके स्कूल में आनेवाले बच्चों के अभिभावकों से लगातार कहती आ रही हैं कि वो अपने बच्चे के पहचान पत्र में मूल टाइटल लगवाएं. बातचीत के दौरान वो कहती हैं, हमारी मानसिकता ये है कि बाहर से जो लोग आते हैं, हम उन्हें बड़ा मानते हैं. वो लोग जो कहते हैं, हमें लगता है कि वही ठीक है, वही सही है.
ये बात समझ में आती है कि उस वक्त टारगेट पूरा करने के दवाब में ऐसा कर दिया गया. लेकिन दूसरी समस्या ये है कि अब जब इनकी अगली पीढ़ी के नाम में भी कुमार और कुमारी क्यों किया जा रहा है?
झाबर गांव की बिरहोर समुदाय की फुलमनिया देवी इसका जवाब देती हैं. वो कहती हैं, ‘’जब हम प्रज्ञा केंद्र जाते हैं, तब आधार बनाने वाला कहता है कि जिसकी शादी नहीं हुई है, उसके नाम के टाइटल में कुमार और कुमारी ही लिखा जाएगा. हमलोग कुछ जानते नहीं है, जो टाइटल लिखकर देता है, वही आधार कार्ड लेकर आ जाते हैं.’’
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आखिर इससे दिक्कत क्या है

देशभर में रह रहे पीवीटीजी आबादी की जनसंख्या के लिहाज से झारखंड चौथे नंबर पर है. लोकसभा में एक सवाल के जवाब को ध्यान में रख कर पीआईबी की ओर से 30 जुलाई 2026 को जारी की गई पीएम-जनमन प्रोग्रेस रिपोर्ट के मुताबिक पहले नंबर पर मध्य प्रदेश है, जहां इनकी आबादी 23,85,266 है. दूसरे नंबर महाराष्ट्र में 6,74,918 और तीसरे नंबर पर आंध्र प्रदेश में 5,22,285 आबादी है.
पीवीटीजी का दर्जा तभी मिलता है जब कोई समुदाय अब भी शिकार और जंगल से भोजन जुटाने जैसी पुरानी जीवनशैली पर टिका हो, उसकी साक्षरता दर बाकी जनजातियों से बहुत कम हो, अत्यंत गरीबी और सबसे गंभीर शर्त- उसकी आबादी स्थिर हो या लगातार घट रही हो.
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर आधार या अन्य सरकारी कागजातों से इनके टाइटल को हटाया जा रहा है, तो इसका क्या-क्या नुकसान हो सकता है?
प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग सुषमा की बात को आगे बढ़ाते हैं और कहते हैं, ‘’इसका सीधा सा प्रभाव ये हो रहा है कि उनकी आदिवासी पहचान को ही खत्म कर दे रहा है. असुर लोग आज भी खुद को मानते हैं कि वो हिन्दू धर्म से अलग हैं. प्रकृति पूजक हैं, कोई देवी देवता नहीं है, जंगल ही देवता है. जैसे ही कुमार-कुमारी कर देते हैं, वो उन्हें सीधा वर्ण और जाति व्यवस्था में बताने का प्रयास होता है.’’
वो आगे कहते हैं, ‘’दूसरी समस्या ये है कि अब उनकी अगली पीढ़ी को जाति प्रमाण पत्र बनवाने में दिक्कत हो रही है. तीसरी समस्या तो सबसे नया है. चूंकि ऐसे लोगों का नाम अपने बाप-दादाओं के टाइटल से नहीं मिल रहा है, एसआईआर में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों का नाम काट दिया गया है. जाहिर है, उनके मतदान के अधिकार को ही छीन लिया गया है. अस्तित्व के साथ नागरिकता का संकट तोहफे में दिया जा रहा है.’’
वो आगे कहते हैं, ‘’इसलिए तो संसद के संविधान सभा में मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने साफ शब्दों में कहा था कि हम आदिवासी हैं, हमारी यही पहचान है. हमें कोई और नाम न दिया जाए.’’
शिक्षिका ज्योति तिलरा एक बार फिर कहती है, ‘’बिरिजिया में दो और टाइटल इस्तेमाल होता है, तिलरा और ठिठियो. जब सबका कुमार और कुमारी हो जा रहा है, ऐसे में मुझे डर है कि आगे चल कर सरकार हमारे उन दो टाइटल को भी नहीं मानेगी. केवल मेरे विद्यालय में 100 में से 30 बच्चों के साथ यह समस्या है, आगे और बढ़ने जा रही है.‘’
यह गड़बड़ी किसी एक क्लर्क की टाइपिंग गलती नहीं लगती, क्योंकि यह दर्जनों परिवारों में, पांचों समुदायों में, बच्चों से बुज़ुर्ग महिलाओं तक बार-बार दोहराई गई है, और खासकर महिलाओं और बच्चियों के दस्तावेज़ों में ज़्यादा दिखी है.
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जीन द्रेज़ लंबे समय से इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं. लातेहार जिले के मनिका और सतबरवा प्रखंडों में हुए एक सर्वे में, जिसमें द्रेज़ खुद शामिल थे, सामने आया कि करीब 42 फीसदी पीवीटीजी परिवारों को आधार से जुड़ी किसी न किसी वजह से सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में दिक्कत हुई.
द्रेज़ का कहना है कि आधार कार्ड और बैंक पासबुक में नाम के मामूली अंतर तक की वजह से पेंशन जैसी बुनियादी सुविधाएं रुक जाती हैं. उनके मुताबिक पहचान से जुड़ी धोखाधड़ी रोकने के लिए जितना हल्ला आधार को लेकर मचाया गया, असल में उतनी धोखाधड़ी होती ही नहीं, जबकि इसका खामियाजा सबसे ज़्यादा वही तबका भुगत रहा है, जिसे बचाने के लिए यह पूरा सिस्टम बनाया गया था.
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लड़ाई पहचान के इतर भी, हालात कठिन से कठिनतम

पहचान पर धीरे-धीरे, लेकिन गहरी चोट के इतर ये समुदाय दशकों से कई और झंझावतों से जूझ रहा है. मसलन, साफ पानी, गरीबी, प्रजनन दर, उचित शिक्षा, उचित्त स्वास्थ्य.
साल 2013 में केंद्रीय स्वास्थ्य और आदिवासी मंत्रालय की ट्राइबल हेल्थ इन इंडिया नाम की एक संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक देशभर की मात्र 10.7 प्रतिशत आदिवासी आबादी को पाइप से पानी पहुंच पाता है.
गरीबी को देखें तो, प्रदान नाम की संस्था की ओर से साल 2021 में जारी किए गए स्टेटस ऑफ आदिवासी लाइवलीहुड्स नाम की रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड के 95 प्रतिशत आदिवासी परिवार भूमिहीन, सीमांत या छोटे किसान हैं. झारखंड में सर्वे किए गए कुल आदिवासी परिवारों में 11.7 प्रतिशत भूमिहीन थे, जबकि 77.1 प्रतिशत के पास सीमांत स्तर की जमीन थी. रिपोर्ट में 2.47 एकड़ तक की जमीन को सीमांत भूमि माना गया है. वहीं आदिवासी परिवारों की औसत वार्षिक आय झारखंड में 75,378 रुपये बताई गई है.
इसी रिपोर्ट में ओडिशा के पीवीटीज समुदाय का वार्षिक आय 36,492 बताया गया है. हालांकि झारखंड के पीपीटीजी का आंकड़ा शामिल नहीं है, लेकिन अगर इसी आधार पर एक अनुमान के तौर पर झारखंड के पीवीटीजी की वार्षिक आय भी इसी के आसपास हो सकती है.
यानी प्रति माह 3 हजार और प्रति दिन 100 रुपए की कमाई है. यानी स्टारबक्स में मिलने वाले एक कप कॉफी का एक चौथाई हिस्सा. क्योंकि उसकी कीमत 420 रुपए है. शायद यही वजह है कि झारखंड राज्य खाद्य आयोग पूरे पीवीटीजी समूह को ही गरीबी रेखा से नीचे माना है.
शिक्षा के मामले में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्रियेटिव रिसर्च थाउट्स पर छपी एक रिसर्च के मुताबिक झारखंड के PVTG समूहों की साक्षरता 30% से भी कम बताई गई है. वहीं प्रदान की रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड के आदिवासी गांवों में से केवल 10 प्रतिशत गांवों में माध्यमिक विद्यालय हैं.
स्वास्थ्य के मामले में स्थिति और भी खराब है. केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय के स्वास्थ्य पोर्टल पर जब आप जाएंगे, वहां जो पहली लाइन लिखी है, वो पूरी स्थिति को बयां कर रही है. वहां लिखा है – भारत की जनजातीय आबादी और गैर-जनजातीय आबादी के स्वास्थ्य परिणामों के बीच व्यापक असमानता है. इस समस्या को और गंभीर बनाता है विभिन्न जनजातीय समुदायों के स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति से जुड़ा डेटा और जानकारी का लगभग पूरी तरह अभाव.
आगे लिखा है, अक्सर यही स्थिति नीति-निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है, क्योंकि इन स्वास्थ्य असमानताओं को दूर करने के लिए नीतियां और योजनाएं तैयार करते समय उनके पास पर्याप्त और विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध नहीं होती.
बहरहाल अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सहयोग से सर्व सेवा समिति संस्था की ओर से साल 2026 में पाकुड़ जिले के माल पहाड़िया समुदाय पर किए गए एक शोध के मुताबिक 90.1 प्रतिशत महिलाओं में एनीमिया पाया गया. वहीं 67 प्रतिशत पुरुषों में भी इसके लक्षण पाए गए. लगभग 85.96% परिवार खुले में शौच कर रहे थे.
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पहचान की राजनीति और अकेले लड़ी जा रही लड़ाई

भारत में जाति, धर्म और समुदाय की पहचान सिर्फ सांस्कृतिक गर्व की बात नहीं है, यह शिक्षा, नौकरी और सरकारी योजनाओं तक पहुंचने का दरवाज़ा भी है. संविधान ने अनुसूचित जनजातियों को जो सुरक्षा और आरक्षण दिया, उसका पूरा आधार ही यह पहचान है.
लेकिन विडंबना यह है कि जिस देश में लोग अपनी गाड़ियों की नंबर प्लेट पर बड़े गर्व से “ब्राह्मण”, “राजपूत”, “यादव” जैसी जातियां लिखवा कर घूमते हैं, वहीं सरकारी दस्तावेज़ों में सबसे संकटग्रस्त, सबसे पिछड़ी जनजातियों की पहचान चुपचाप “देवी” और “कुमार” में तब्दील होती जा रही है.
सरकार दावा करती है कि कोरवा, बिरजिया, असुर, परहिया और बिरहोर जैसे समुदाय पीवीटीजी की श्रेणी में आते हैं और इन्हें विशेष सरकारी लाभ मिलेंगे. लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इन परिवारों को खुद नहीं पता कि उनके सबसे ज़रूरी पहचान पत्र से ही उनकी जनजातीय पहचान चुपचाप मिटाई जा रही है. आज पुराने दस्तावेज़ों और जाति प्रमाण पत्र के सहारे लाभ मिल रहा है, लेकिन जब स्कूल जाने वाले बच्चे बड़े होकर खुद जाति प्रमाण पत्र बनवाने ब्लॉक ऑफिस जाएंगे, तो उनके पास दिखाने के लिए कुछ नहीं बचेगा- न खतियान, न सही आधार कार्ड, न कोई और सबूत.
यह सिर्फ पांच समुदायों की कहानी नहीं है. यह सवाल इस बात पर है कि जो सिस्टम पहचान देने के लिए बनाया गया, क्या वही सिस्टम अनजाने में सबसे कमज़ोर तबकों की पहचान छीन रहा है? जोहार लाइव ने ज़मीन पर जाकर देखा है- यह तबका अपनी पहचान के लिए लड़ रहा है, किसी राजनीति के लिए नहीं, सिर्फ उस एक कार्ड के लिए, जिसके बिना उसका अस्तित्व ही कागज़ों में दर्ज नहीं होगा.
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