Close Menu
Johar LIVE
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Johar LIVEJohar LIVE
    • होम
    • क्राइम
    • राजनीति
    • बिजनेस
    • झारखंड
    • आदिवासी
    • बिहार
    • स्वास्थ्य
    • पर्यावरण
    • स्पेशल स्टोरी
    • खेल-सिनेमा
    • होम
    • क्राइम
    • राजनीति
    • बिजनेस
    • झारखंड
    • आदिवासी
    • बिहार
    • स्वास्थ्य
    • पर्यावरण
    • स्पेशल स्टोरी
    • खेल-सिनेमा
    Johar LIVE
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Home»जोहार ब्रेकिंग»करोड़ों का DMFT फंड, हजारों योजनाएं… फिर भी सारंडा की तस्वीर क्यों नहीं बदली?
    जोहार ब्रेकिंग

    करोड़ों का DMFT फंड, हजारों योजनाएं… फिर भी सारंडा की तस्वीर क्यों नहीं बदली?

    Joharlive NetworkBy Joharlive NetworkJuly 18, 2026No Comments8 Mins Read6
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Email Copy Link
    DMFT FUND
    DMFT FUND AND ADIVASI LIFE (Representative Image)
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Email Copy Link

    विजय उरांव

    नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी पिछले दिनों चाईबासा यानि कि पश्चिमी सिंहभूम जिला में तीन दिवसीय दौरे पर पहुंचे. बाबुलाल मरांडी दौरे के बाद सरांडा के गांवों की स्थिति को देखते हुए जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) फंड के इस्तेमाल को लेकर सवाल किए. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितना पैसा खर्च हुआ, बल्कि यह भी है कि जिस उद्देश्य से यह राशि दी गई, उसका लाभ खनन प्रभावित गांवों और लोगों तक आखिर कितना पहुंचा.

    तीन दिनों के पश्चिमी सिंहभूम दौरे के बाद बाबूलाल मरांडी ने दावा किया कि पिछले दस वर्षों में जिले को डीएमएफटी के तहत 3742.15 करोड़ रुपये मिले, जिनमें से लगभग 75.68 प्रतिशत राशि खर्च भी हो चुकी है. इसके बावजूद कई खनन प्रभावित गांव आज भी पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उन्होंने पूरे मामले की जांच, डीएमएफटी पर श्वेत पत्र जारी करने, सोशल ऑडिट कराने और सभी खर्च का विवरण सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराने की मांग की.

    चलिए समझते हैं आखिर DMFT क्या है?

    DMFT यानी जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट. यह एक वैधानिक ट्रस्ट है, जिसमें खनन कंपनियों से मिलने वाली राशि जमा होती है. इस फंड में कंपनियों के द्वारा यदि वह 12 जनवरी 2015 से पहले की है तो रॉयल्टी की 30 फीसदी राशि देती है. यदि 12 जनवरी 2015 के बाद की है, तो वह 10 फीसदी रॉयल्टी देती है. यह राशि खनन प्रभावित गांवों व उसके विकास के लिए देती है.
    इस राशि का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क, पर्यावरण संरक्षण, महिला एवं बाल विकास, कौशल विकास, रोजगार सृजन और अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए करना होता है, ताकि खनन से प्रभावित लोगों के जीवन स्तर में सुधार हो सके.

    झारखंड में DMFT की स्थिति

    खान मंत्रालय के अनुसार पूरे झारखंड में DMFT के तहत अब तक 18,448.02 करोड़ रुपये जमा हुए हैं. इसमें से 15,088.95 करोड़ रुपये की योजनाएं मंजूर हुई हैं और 10,406.45 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं. अगर चाईबासा की बात करे तो झारखंड में खनन से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में पश्चिम सिंहभूम का नाम सबसे ऊपर आता है. लौह अयस्क की खदानों से हर साल करोड़ों रुपये का राजस्व आता है. इसी से जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) के खाते में भी बड़ी रकम जमा होती है. आज चाईबासा के पास करीब 4 हजार करोड़ रुपये का DMFT फंड है. यह झारखंड में धनबाद के बाद दूसरा सबसे बड़ा फंड है.

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, चाईबासा में अब तक 3,926.16 करोड़ रुपये का DMFT फंड जमा हुआ है. इसमें से 2,693.98 करोड़ रुपये की योजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है, जबकि 2,093.31 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं. जिले में कुल 8,915 विकास योजनाएं स्वीकृत हुई हैं. इनमें से 7,529 योजनाएं पूरी हो चुकी हैं, जबकि करीब 1,386 योजनाओं पर अभी काम चल रहा है.

    यानी कुल जमा राशि का लगभग 53 प्रतिशत खर्च हो चुका है और स्वीकृत परियोजनाओं में से करीब 85 प्रतिशत पूरी हो चुकी हैं. यह बताता है कि जिले में विकास कार्य लगातार आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अभी भी बड़ी राशि खर्च होना बाकी है.

    चाईबासा की स्थिति बाकी जिलों से कैसी है?

    अगर जिलों की बात करें तो सबसे ज्यादा DMFT फंड धनबाद (4,246.32 करोड़ रुपये) के पास है. इसके बाद चाईबासा (3,926.16 करोड़ रुपये) दूसरे स्थान पर है. तीसरे स्थान पर चतरा (1777.42 करोड़ रुपये) है, वहीं चौथे स्थान पर रामगढ़ (1611.67 करोड़ रुपये) है तथा हजारीबाग 1019.96 के साथ पांचवें स्थान पर है.

    लेकिन योजनाओं की संख्या के मामले में चाईबासा पूरे राज्य में सबसे आगे है. यहां 8,915 योजनाएं स्वीकृत हुई हैं, जो किसी भी जिले में सबसे ज्यादा हैं. इनमें से 7,529 योजनाएं पूरी भी हो चुकी हैं. यानी सिर्फ फंड ही नहीं, योजनाओं के क्रियान्वयन में भी चाईबासा की स्थिति मजबूत दिखाई देती है.

    हालांकि कुछ बड़े जिलों में खर्च की रफ्तार अभी भी धीमी है. उदाहरण के लिए धनबाद में 4,246 करोड़ रुपये से ज्यादा का फंड जमा है, लेकिन खर्च अभी करीब 1,829 करोड़ रुपये ही हुआ है. इसी तरह चतरा, लातेहार और पाकुड़ में भी बड़ी राशि अभी खर्च होना बाकी है.

    चलिए समझते हैं खनन प्रभावित क्षेत्रों में आदिवासियों की की स्थिति क्या है, क्या कहती है सरकारी रिपोर्ट, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिमी सिंहभूम की साक्षरता दर 58.6 प्रतिशत है, जबकि महिला साक्षरता केवल 46.3 प्रतिशत है. बेहतर पेयजल की सुविधा लगभग 69 प्रतिशत परिवारों तक ही पहुंची है, जबकि स्वच्छता सुविधाएं सिर्फ 16 प्रतिशत परिवारों के पास हैं.
    पोषण के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक है. पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग 48 प्रतिशत बच्चे ठिगने (स्टंटेड) और करीब 45 प्रतिशत बच्चे कम वजन के पाए गए हैं. ऐसे आंकड़े बताते हैं कि भारी वित्तीय निवेश के बावजूद कई सामाजिक चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं.
    सारंडा पर विभिन्न मीडिया (Mongabay India, Down To Earth और अन्य संस्थानों) की ग्राउंड रिपोर्टें बताती हैं कि देश के सबसे समृद्ध लौह अयस्क क्षेत्रों में शामिल होने के बावजूद यहां के आदिवासी आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं. कई गांवों में आज भी लोग ‘चुआ’ (उथले गड्ढों) का दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, क्योंकि सामुदायिक वनाधिकार और वन विभाग की मंजूरी नहीं मिलने से पेयजल परियोजनाएं वर्षों तक अटकी रहीं. रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि कई वन गांवों को राजस्व गांव का दर्जा और वनाधिकार का पूरा लाभ नहीं मिल पाने से सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और अन्य सरकारी योजनाओं का विस्तार बाधित हुआ. दूसरी ओर, लौह अयस्क खनन से पर्यावरण, जलस्रोत और पारंपरिक आजीविका पर असर पड़ा, जबकि स्थानीय लोगों का आरोप है कि खनन से होने वाले आर्थिक लाभ और रोजगार का पर्याप्त हिस्सा उन्हें नहीं मिला. कुल मिलाकर, विभिन्न स्वतंत्र रिपोर्टें इस निष्कर्ष पर पहुंचती हैं कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध सारंडा में विकास और सामाजिक न्याय के बीच अब भी गहरी खाई बनी हुई है.

    आगे सबसे बड़ी चुनौती

    वहीं, आंकड़ो की माने तो चाईबासा में हजारों योजनाएं पूरी हो चुकी हैं, लेकिन अभी भी करीब 1,386 परियोजनाएं अधूरी हैं और DMFT के खाते में भी बड़ी राशि उपलब्ध है. ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि बची हुई परियोजनाएं समय पर पूरी हों और जो पैसा खनन प्रभावित गांवों के विकास के लिए मिला है, उसका पूरा और पारदर्शी उपयोग हो.

    खनन से सबसे ज्यादा असर जिन गांवों पर पड़ता है, वहां बेहतर सड़क, अस्पताल, स्कूल, पेयजल, सिंचाई और रोजगार जैसी सुविधाएं पहुंचाना ही DMFT का असली उद्देश्य है. आने वाले वर्षों में चाईबासा की सफलता इसी बात से तय होगी कि यह फंड गांवों के लोगों की जिंदगी में कितना बदलाव ला पाता है.

    कैग की एक रिपोर्ट कहती है कि कई जिलों में इस राशि का उपयोग अधिकारियों के बंगले, सरकारी भवनों और प्रशासनिक सुविधाओं पर किया गया. रिपोर्ट के अनुसार बोकारो में करीब 1.08 करोड़ रुपये खर्च कर 24 ओपन जिम बनाए गए. रांची में 85.86 लाख रुपये की लागत से मैक्लुस्कीगंज में डाक बंगले का निर्माण कराया गया. वहीं चतरा और लोहरदगा में उपायुक्त कार्यालय, कलेक्ट्रेट भवन की मरम्मत तथा अन्य प्रशासनिक कार्यों पर भी डीएमएफटी की राशि खर्च किए जाने की बात सामने आई. कुछ स्थानों पर थानों में शौचालय निर्माण जैसे कार्य भी इसी फंड से कराए गए.

    संसद में सरकार ने क्या बताया?

    केंद्र सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022-23 में दिसंबर 2022 तक झारखंड में डीएमएफटी के तहत कुल 617.05 करोड़ रुपये खर्च किए गए. इनमें सबसे अधिक 316.82 करोड़ रुपये अकेले पश्चिमी सिंहभूम में खर्च हुए. इसके बाद हजारीबाग में 141.88 करोड़, धनबाद में 39.08 करोड़, गोड्डा में 33.07 करोड़ और रांची में 26.37 करोड़ रुपये खर्च किए गए.
    यानी पूरे राज्य में डीएमएफटी के तहत हुए कुल खर्च का लगभग आधा हिस्सा अकेले पश्चिमी सिंहभूम में हुआ.
    फंड संग्रह के मामले में भी पश्चिमी सिंहभूम सबसे आगे रहा. वर्ष 2020-21 में जिले को 242.40 करोड़ रुपये और 2021-22 में 499.50 करोड़ रुपये डीएमएफटी के तहत प्राप्त हुए.

    संसद में पूछे गए एक अन्य प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच पश्चिमी सिंहभूम में कौशल विकास, आजीविका, महिला एवं बाल कल्याण तथा दिव्यांग कल्याण से जुड़ी 213 परियोजनाएं स्वीकृत की गईं. इनकी कुल लागत 39.21 करोड़ रुपये है, जिनमें से 33.67 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं.

    इसके अलावा पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और जल प्रबंधन से जुड़ी 41 परियोजनाओं पर 48.08 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए, जिनमें से 45.56 करोड़ रुपये खर्च होने की जानकारी सरकार ने संसद में दी.

    यहीं से बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है. सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि पश्चिमी सिंहभूम को सबसे अधिक डीएमएफटी राशि मिली और सबसे अधिक खर्च भी हुआ. लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस खर्च का प्रभाव जमीन पर दिखाई देता है?

    Also Read : “गरीब धूल में, अधिकारी ऐश में, देना होगा हिसाब”… DMFT फंड पर बाबूलाल का तीखा हमला

    DMFT क्या है? झारखंड में DMFT की स्थिति पश्चिमी सिंहभूम जिला
    Follow on Facebook Follow on X (Twitter) Follow on Instagram Follow on YouTube Follow on WhatsApp Follow on Telegram
    Share. Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Telegram WhatsApp Email Copy Link
    Previous Article‘हर किसान तक पहुंचे सरकारी योजना’… कृषि विभाग की समीक्षा में हेमंत सोरेन के बड़े निर्देश

    Related Posts

    जोहार ब्रेकिंग

    ‘हर किसान तक पहुंचे सरकारी योजना’… कृषि विभाग की समीक्षा में हेमंत सोरेन के बड़े निर्देश

    July 17, 2026
    खेल-सिनेमा

    विश्व कप में झारखंड का चौका, सलीमा कप्तान, टीम इंडिया में 4 बेटियां

    July 17, 2026
    आदिवासी

    चिता पर लेटीं आदिवासी महिलाएं, आखिर क्यों उठी ‘मौत या न्याय’ की मांग?

    July 17, 2026
    जोहार ब्रेकिंग

    100 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने छोड़ा ISRO, क्या खतरे में पड़ जाएगा गगनयान मिशन ?

    July 17, 2026
    जोहार ब्रेकिंग

    श्रावणी मेला 2026: सुरक्षा का मास्टर प्लान तैयार, भीड़, आतंक और अपराध… हर मोर्चे पर रहेगी नजर

    July 17, 2026
    जोहार ब्रेकिंग

    फर्जी बैंक गारंटी से 55 करोड़ भुगतान का आरोप, बाबूलाल ने CM को लिखा पत्र

    July 17, 2026
    Latest Posts

    करोड़ों का DMFT फंड, हजारों योजनाएं… फिर भी सारंडा की तस्वीर क्यों नहीं बदली?

    July 18, 2026

    ‘हर किसान तक पहुंचे सरकारी योजना’… कृषि विभाग की समीक्षा में हेमंत सोरेन के बड़े निर्देश

    July 17, 2026

    अपहरण, फिरौती और धमकी… 12 घंटे में रांची पुलिस ने रेस्क्यू की 5 साल की बच्ची

    July 17, 2026

    विश्व कप में झारखंड का चौका, सलीमा कप्तान, टीम इंडिया में 4 बेटियां

    July 17, 2026

    चिता पर लेटीं आदिवासी महिलाएं, आखिर क्यों उठी ‘मौत या न्याय’ की मांग?

    July 17, 2026
    Facebook X (Twitter) Instagram
    © 2026 Johar LIVE. | About Us | AdSense Policy | Privacy Policy | Terms and Conditions | Contact Us

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.