मध्य प्रदेश के पन्ना और छतरपुर जिलों में इन दिनों एक अनोखा आंदोलन पूरे देश का ध्यान खींच रहा है. कहीं आदिवासी महिलाएं नदी किनारे बनी प्रतीकात्मक चिता पर लेटकर विरोध कर रही हैं, तो कहीं लोग घंटों नदी के पानी में खड़े होकर जल सत्याग्रह कर रहे हैं. इन तस्वीरों ने हर किसी के मन में एक सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? इसकी वजह है केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना, जिसे केंद्र सरकार देश की पहली राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना बता रही है.
सरकार का कहना है कि यह योजना बुंदेलखंड की पानी की समस्या दूर करेगी, जबकि आंदोलन कर रहे आदिवासियों का कहना है कि इस परियोजना से उनका घर, जमीन, जंगल और पूरी जिंदगी उजड़ जाएगी.
क्या है केन-बेतवा परियोजना और सरकार को इससे क्या फायदा?
केन-बेतवा परियोजना का मकसद मध्य प्रदेश की केन नदी के अतिरिक्त पानी को बेतवा नदी तक पहुंचाना है. इसके लिए केन नदी पर दौधन बांध बनाया जा रहा है. इसके अलावा करीब 221 किलोमीटर लंबी नहर, सुरंगें और दूसरी जल संरचनाएं तैयार की जा रही हैं. यह देश की पहली राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना है.
सरकार का दावा है कि इस योजना से बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों में सिंचाई की सुविधा बढ़ेगी. लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर जमीन को पानी मिलेगा, करीब 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध होगा और जलविद्युत के जरिए बिजली भी पैदा होगी. सरकार का मानना है कि इससे खेती मजबूत होगी, किसानों की आय बढ़ेगी और पानी का संकट काफी हद तक कम हो जाएगा.
तो आखिर विरोध क्यों?
दरअसल, दौधन बांध बनने से पन्ना और छतरपुर के कई गांव प्रभावित होंगे. कई गांव पूरी तरह या आंशिक रूप से डूब क्षेत्र में आ जाएंगे. सबसे ज्यादा असर आदिवासी परिवारों पर पड़ रहा है, जो पीढ़ियों से इन इलाकों में रहते आए हैं.
आंदोलन कर रहे लोगों का कहना है कि वे सिर्फ अपना मकान नहीं खो रहे, बल्कि अपनी पूरी जीवनशैली खो देंगे. अगर गांव खाली करना पड़ा तो उन्हें अपने पुश्तैनी घर, खेती की जमीन, जंगल, चरागाह, नदी, देवस्थल, श्मशान घाट और पूर्वजों से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान छोड़नी पड़ेगी.
इन परिवारों की रोजी-रोटी खेती, जंगल से मिलने वाले महुआ, तेंदूपत्ता, लकड़ी, जड़ी-बूटियों और पशुपालन पर निर्भर है. विस्थापन के बाद उनकी आजीविका पर भी संकट खड़ा हो जाएगा. ग्रामीणों का कहना है कि गांव सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि उनकी पहचान और संस्कृति का हिस्सा है.
कब शुरू हुआ आंदोलन और ‘चिता आंदोलन’ क्यों?
प्रभावित ग्रामीण कई सालों से अपनी मांगें उठा रहे हैं, लेकिन अप्रैल 2026 में आंदोलन ने बड़ा रूप ले लिया. पहले धरना शुरू हुआ, फिर लोग नदी में उतरकर जल सत्याग्रह करने लगे. इसके बाद आदिवासी महिलाओं ने विरोध का ऐसा तरीका अपनाया, जिसने पूरे देश का ध्यान खींच लिया.
महिलाएं नदी किनारे लकड़ियों से बनी प्रतीकात्मक चिता पर लेट गईं. उनका कहना था कि अगर उनका घर और जमीन छिन जाएगी तो उनके लिए यह जिंदा रहते हुए मौत के बराबर होगा. इसलिए उन्होंने ‘न्याय दो या मौत दो’ का संदेश देने के लिए चिता आंदोलन शुरू किया.
प्रशासन के आश्वासन पर कुछ समय के लिए आंदोलन स्थगित हुआ, लेकिन जब ग्रामीणों को लगा कि उनकी मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो जुलाई 2026 में आंदोलन फिर शुरू हो गया. अब जल सत्याग्रह, धरना और चिता आंदोलन लगातार जारी है.
क्या मांग रहे आंदोलनकारी?
आंदोलन कर रहे लोगों की मांग है कि उन्हें बाजार दर के हिसाब से उचित मुआवजा दिया जाए. सभी प्रभावित परिवारों का दोबारा सर्वे किया जाए. विस्थापन से पहले रहने के लिए घर और खेती के लिए जमीन उपलब्ध कराई जाए. वन अधिकार कानून के तहत आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा की जाए और किसी भी परिवार को बिना पुनर्वास के गांव छोड़ने के लिए मजबूर न किया जाए.
दूसरी ओर सरकार का कहना है कि केन-बेतवा परियोजना बुंदेलखंड के विकास के लिए बेहद जरूरी है. प्रशासन का दावा है कि प्रभावित परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास पैकेज दिया जा रहा है. जिन लोगों की शिकायतें हैं, उनकी जांच कराई जा रही है और जरूरत पड़ने पर दोबारा सर्वे भी किया जाएगा.
फिलहाल यह मामला विकास और विस्थापन के बीच संतुलन का बन गया है. एक तरफ सरकार इसे बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने वाली परियोजना बता रही है, तो दूसरी तरफ हजारों आदिवासी परिवार इसे अपने जल, जंगल, जमीन, आजीविका और अस्तित्व की लड़ाई मान रहे हैं.
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