अगर आपसे कोई पूछे कि पिछले 5-6 सालों में देश में कितनी आदिवासी जमीन खदानों, सड़कों या बांधों के लिए ली गई और कितने आदिवासी परिवार बेघर हुए? तो आपको जानकर हैरानी होगी कि इसका जवाब देश के जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) के पास भी नहीं है.
हाल ही में जब संसद में झारखंड के राजमहल से सांसद विजय कुमार हांसदा के द्वारा यह सीधा सवाल पूछा गया, तो सरकार ने साफ कह दिया कि हमारे पास इसका कोई केंद्रीय डेटा या हिसाब-किताब नहीं है.
आखिर यह पूरा मामला क्या है और इससे आदिवासियों की जिंदगी पर क्या असर पड़ रहा है? आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं.
हमारे पास डेटा नहीं है, केंद्र ने राज्यों पर डाला पाला
संसद में जब सरकार से पूछा गया कि 2019 के बाद से कितनी आदिवासी जमीन ली गई और कितने लोग विस्थापित हुए, तो जवाब मिला: जमीन का मामला राज्य सरकार का होता है (संविधान की राज्य सूची का विषय). इसलिए किस राज्य में कितनी जमीन ली गई, कितने लोगों को मुआवजा मिला या नहीं मिला, इसका राष्ट्रीय रिकॉर्ड केंद्र नहीं रखता.
सवाल यह उठता है, जब आदिवासियों के हक के लिए अलग से एक केंद्रीय मंत्रालय बना है, तो उसके पास ही अगर बेघर हुए आदिवासियों का डेटा नहीं होगा, तो उनके लिए सही नीतियां कैसे बनेंगी?
कागजों पर मजबूत कानून, पर जमीन पर क्या?
कागजों में आदिवासियों को अपनी जमीन बचाने के लिए बड़े-बड़े अधिकार मिले हुए हैं: जैसे : – ग्राम सभा की मंजूरी जरूरी – नियम कहता है कि बिना गांव की ‘ग्राम सभा’ की सहमति के जमीन नहीं ली जा सकती.
जब तक फैसला नहीं, तब तक बेदखली नहीं – वन अधिकार कानून (FRA) कहता है कि जब तक किसी आदिवासी के जमीन के दावे का पूरा निपटारा न हो जाए, उसे कोई उसकी जमीन से हटा नहीं सकता.

लेकिन असली दिक्कत क्या है?
जब सरकार के पास इस बात का रिकॉर्ड ही नहीं है कि किस राज्य में ग्राम सभा की बात मानी गई और कहाँ जबरदस्ती हुई, तो कानून का पालन हो भी रहा है या नहीं, यह कौन देखेगा?
हक की लड़ाई के लिए अदालतों के चक्कर
जब अपनी ही सरकार के पास आदिवासियों के विस्थापन का हिसाब नहीं होता, तो उनके पास अदालत जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता.
संसद के आकड़ों के मुताबिक, आज भी अनुसूचित क्षेत्रों (Scheduled Areas) में जमीन छीनने के खिलाफ 6 बड़े मामले अदालतों में लटके हैं:

ओडिशा: खदानों (Mining Projects) के खिलाफ 3 मामले हाईकोर्ट में चल रहे हैं.
गुजरात: हाईवे (National Highways) चौड़ा करने के नाम पर जमीन लेने के खिलाफ 2 मामले कोर्ट में हैं.
हिमाचल प्रदेश: चंबा में बिजली परियोजना (Hydro Project) के खिलाफ आदिवासी कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं.
आदिवासियों के लिए इसका क्या मतलब है?
इस पूरे मामले से एक बात साफ नजर आती है, विकास के नाम पर जमीन तो ले ली जाती है, लेकिन विस्थापित हुए आदिवासियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है. जब तक केंद्र सरकार हर विस्थापित आदिवासी परिवार और ग्राम सभा की सहमति का पारदर्शी हिसाब नहीं रखेगी, तब तक जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों का अधिकार सिर्फ कागजी दावों तक ही सीमित रहेगा.



