रांची के विक्रमशिला वाटिका अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 104/D में कथित सेक्स रैकेट चलाने के मामले में अदालत ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका. अदालत ने यह भी माना कि छापेमारी के दौरान किसी ग्राहक की मौजूदगी, आपत्तिजनक सामग्री, नकद राशि या वेश्यावृत्ति से जुड़ा कोई ठोस सबूत बरामद नहीं हुआ था.
2021 में दर्ज हुआ था मामला
मामला वर्ष 2021 का है. 26 मार्च 2021 को सदर थाना पुलिस को सूचना मिली थी कि चेशायर होम रोड स्थित विक्रमशिला वाटिका अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 104/D में देह व्यापार कराया जा रहा है. पुलिस टीम ने मौके पर पहुंचकर फ्लैट में एक महिला और दो पुरुषों को पाया था.
पुलिस के अनुसार, महिला की पहचान पियाली कर्मकार, जबकि पुरुषों की पहचान सुंदर रजक और अजय शर्मा के रूप में हुई थी. मामले में दिलीप रजक उर्फ शिवा को भी आरोपी बनाया गया था. पुलिस ने इनके खिलाफ Immoral Traffic (Prevention) Act की धारा 3 और 4 के तहत केस दर्ज किया था.
चार साल से ज्यादा समय तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने सुंदर कुमार रजक उर्फ सुंदर राजक, दिलीप रजक उर्फ शिवा और पियाली कर्मकार को बरी कर दिया. सह आरोपी अजय शर्मा के खिलाफ मामला अलग रखा गया है, क्योंकि वह 30 सितंबर 2026 को अदालत में उपस्थित नहीं हुआ. उसका जमानत रद्द कर गैर-जमानती वारंट जारी किया गया और उसके खिलाफ अलग रिकॉर्ड खोला गया.
कोर्ट ने कहा, फ्लैट को ‘ब्रॉथल’ साबित नहीं कर पाया अभियोजन
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सिर्फ फ्लैट के अंदर तीन लोगों का मिलना और बिस्तर का अस्त-व्यस्त होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वहां वेश्यावृत्ति चल रही थी.
कोर्ट के मुताबिक छापेमारी के दौरान कोई ग्राहक नहीं मिला. पुलिस ने कोई नकद राशि, रजिस्टर या ऐसा सामान भी बरामद नहीं किया, जिससे फ्लैट में देह व्यापार होने की पुष्टि होती. चार मोबाइल फोन जब्त किए जाने की बात कही गई, लेकिन उन्हें अदालत में भौतिक साक्ष्य के तौर पर पेश नहीं किया गया. न ही मोबाइल की कॉल डिटेल या मैसेज की जांच का कोई प्रमाण सामने आया.

अदालत ने यह भी नोट किया कि पुलिस की गवाही में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अंतर था. घटना के समय, महिला के फ्लैट में रहने की अवधि और दरवाजा किसने खोला, इन बातों को लेकर गवाहों के बयान एक जैसे नहीं थे.
पुलिस के सामने दिए कथित कबूलनामे पर भी सवाल
अभियोजन पक्ष ने आरोपियों के पुलिस के सामने दिए गए कथित बयानों पर काफी भरोसा किया था. अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारियों के सामने दिए गए कबूलनामे को सामान्य तौर पर आरोपी के खिलाफ सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि आरोपियों के कथित बयानों के आधार पर जिन बातों का जिक्र किया गया, उनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई. कथित दलालों, वेबसाइट और फ्लैट की किरायेदारी से जुड़ी जानकारी की भी पर्याप्त कानूनी साक्ष्य से पुष्टि नहीं हो सकी.
स्वतंत्र गवाह और जांच अधिकारी की गवाही भी नहीं हुई
छापेमारी के दौरान अपार्टमेंट के गार्ड अभिषेक करवा और केयरटेकर अभिमन्यु महतो मौजूद थे. दोनों के नाम जब्ती सूची में गवाह के रूप में दर्ज थे, लेकिन अदालत में उनकी गवाही नहीं कराई गई.
इसके अलावा मामले के जांच अधिकारी को भी कोर्ट में पेश नहीं किया गया. अदालत ने कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी की गवाही महत्वपूर्ण थी, क्योंकि फ्लैट की किरायेदारी, मोबाइल फोन, कथित वेबसाइट और कथित बिचौलियों से जुड़ी जांच की जानकारी उन्हीं के माध्यम से सामने आ सकती थी.
पियाली कर्मकार को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी
पियाली कर्मकार के मामले में अदालत ने विशेष टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन की अपनी कहानी के अनुसार वह पश्चिम बंगाल से लाई गई महिला थी और कथित तौर पर दूसरे लोगों द्वारा चलाए जा रहे नेटवर्क में उसका इस्तेमाल किया जा रहा था.
अदालत ने कहा कि धारा 3 और 4 के तहत उसके खिलाफ यह साबित नहीं हुआ कि वह फ्लैट चलाती थी, उसका प्रबंधन करती थी या किसी अन्य व्यक्ति की वेश्यावृत्ति की कमाई पर निर्भर थी. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2026 के Prajwala v. Union of India फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें वेश्यावृत्ति में शोषित महिला को पीड़ित के रूप में देखने के सिद्धांत पर जोर दिया गया है.
तीनों आरोपियों को बरी किया
अदालत ने कहा कि संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता. अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि फ्लैट का इस्तेमाल वेश्यालय के रूप में किया जा रहा था या तीनों आरोपी उसे चलाने, प्रबंधित करने अथवा किसी अन्य व्यक्ति की वेश्यावृत्ति की कमाई पर जीवन यापन करने में शामिल थे.
इसके बाद अदालत ने सुंदर कुमार रजक, दिलीप रजक और पियाली कर्मकार को धारा 3 और 4 के आरोपों से बरी कर दिया. तीनों के जमानत बांड समाप्त कर दिए गए. हालांकि, छह महीने तक ऊपरी अदालत में अपील की स्थिति में पेशी सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक को 5,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड जमा करने का आदेश दिया गया.
Also Read : पश्चिम बंगाल : पूर्व टीएमसी नेता और बहू से सामूहिक दुष्कर्म का आरोप, चार BJP कार्यकर्ताओं पर FIR

