देश में मातृ स्वास्थ्य को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के आंकड़ों के मुताबिक, 15 से 49 साल की 52.2 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं. यानी देश में हर दो गर्भवती महिलाओं में से एक के शरीर में खून की कमी है.
यह आंकड़ा लोकसभा में आदिवासी महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े सवाल के जवाब में सरकार की ओर से साझा किया गया. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने बताया कि एनीमिया की समस्या से निपटने के लिए सरकार की ओर से कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. सदन में सवाल प्रियंका गांधी वाड्रा के द्वारा किया गया था.
अस्पताल में प्रसव बढ़ा, लेकिन एनीमिया अब भी बड़ी चुनौती
संसद में दिए आंकड़ों के मुताबिक, देश में संस्थागत प्रसव यानी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों में होने वाली डिलीवरी का आंकड़ा बढ़कर 90.6 फीसदी हो गया है. वहीं मातृ मृत्यु अनुपात में भी सुधार दर्ज किया गया है. यह आंकड़ा 93 से घटकर 87 प्रति एक लाख जीवित जन्म हो गया है.
हालांकि, इन आंकड़ों के बीच गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की स्थिति चिंता बढ़ाती है. एनीमिया का सीधा असर गर्भवती महिला की सेहत के साथ-साथ गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी पड़ सकता है. गंभीर मामलों में यह प्रसव के दौरान जटिलताओं का कारण बन सकता है.
सरकार की योजनाओं में पोषण और जांच पर जोर
हालांकि, एनीमिया से निपटने के लिए सरकार अनीमिया मुक्त भारत अभियान चला रही है. इसके तहत बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के बीच एनीमिया की जांच और उपचार पर जोर दिया जाता है.
सरकार की ओर से गर्भवती महिलाओं को आयरन और फोलिक एसिड की खुराक देने, नियमित जांच कराने और जरूरत पड़ने पर इलाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की गई है.

जननी शिशु सुरक्षा योजना के तहत सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव कराने वाली महिलाओं को मुफ्त दवाएं, जांच, भोजन और परिवहन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं.
आदिवासी इलाकों में चुनौती और बड़ी
आदिवासी और दूर-दराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अब भी एक बड़ी चुनौती है. ऐसे क्षेत्रों में मोबाइल मेडिकल यूनिट्स के जरिए स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की व्यवस्था की गई है. विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों यानी PVTG आबादी वाले क्षेत्रों में इन सेवाओं के जरिए महिलाओं और बच्चों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है.
इसके अलावा, आदिवासी आबादी के बीच सिकल सेल बीमारी की जांच और उपचार के लिए भी अभियान चलाया जा रहा है.
प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और जननी सुरक्षा योजना के जरिए पात्र गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता देने का भी प्रावधान है.
सिर्फ अस्पताल पहुंचना काफी नहीं
संस्थागत प्रसव का आंकड़ा 90 फीसदी से ज्यादा पहुंचना स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की सेहत का सवाल इससे कहीं बड़ा है. अस्पताल में सुरक्षित प्रसव के साथ गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त पोषण, आयरन-फोलिक एसिड की उपलब्धता, नियमित जांच और समय पर इलाज भी जरूरी है.

ऐसे में 52.2 फीसदी गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का आंकड़ा बताता है कि मातृ स्वास्थ्य के मोर्चे पर अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में इन सेवाओं की वास्तविक पहुंच और इस्तेमाल की स्थिति पर लगातार निगरानी जरूरी होगी.



