रिपोर्ट – कनिका राणा/वसीम अख्तर
फोटो – रुस्तम खलखो
सरकारी राशन न मिले तो खत्म होने के कगार पर पहुंच चुका आदिम जनजाति समुदाय शायद पूरी तरह खत्म होने को तैयार हो जाए. इस राशन को पाने के लिए हर महीने सर पर 33 किलो चावल के लिए ढ़ाई घंटे पहाड़ की चढ़ाई और फिर उतराई. एक गांव से दूसरे गांव और फिर नजदीकी बाजार जाने के लिए हर बार नदी पार करने की नौबत.
तिस पर अगर बरसात आ जाए, तो पूरे दो महीने का अघोषित लॉकडाउन. जीवन जीने के लिए शहर और दूसरे राज्यों का सहारा. अगर बीमार पड़ गए तो जड़ी बूटी के सहारे गांव की झोपड़ी में खुद को कैद के अलावा दूसरे उपाय सोचने तक की जगह नहीं. यही हकीकत है आदिम जनजाति बहुल दौना गांव के बिरिजिया समुदाय की.
राजधानी रांची से 196 किलोमीटर दूर लातेहार जिले के इस गांव की बेबसी ही इनकी हकीकत है. अंतिम आदिवासी ऋंखला में आज हम पहुंच रहे हैं बिरिजिया समुदाय के बीच. 2011 की जनगणना के मुताबिक पूरे राज्य में इनकी आबादी सिर्फ़ 6,276 दर्ज हुई थी. दौना गांव में करीब 250 लोग इसी समुदाय के हैं.
केंद्र सरकार की ओर से साल 2023 में घोषित 24,000 करोड़ की पीएम-जनमन योजना का एक छींट भी इस गांव तक नहीं पहुंच पाया है. इस बात को पुख्ता मानने के लिए नरेश सक्सेसा की एक कविता ‘पार’ का सहारा लेते हैं.
पुल पार करने से पुल पार होता है
नदी पार नहीं होती
नदी पार नहीं होती नदी में धंसे बिना
नदी में धंसे बिना पुल का अर्थ भी समझ में नहीं आता
नदी में धंसे बिना पुल पार करने से पुल पार नहीं होता
सिर्फ़ लोहा-लंगड़ पार होता है
कुछ भी नहीं होता पार
नदी में धंसे बिना न पुल पार होता है
न नदी पार होती है.
हालांकि इस कविता की व्याख्या कई संदर्भों में की जा सकती है. लेकिन सपाट समझ से इसे दौना की इस स्थिति से जोड़ सकते हैं.
दौना जाने के लिए सड़क नहीं, नदी पार करनी पड़ती है. ग्रामीण बताते हैं कि बरसात में नदी भर जाती है, तब पूरा गांव दो महीने के लिए अपने ही घर में कैद हो जाता है. गांव के बिनय बिरजिया नदी में खड़े होकर कहते हैं, पानी ज़्यादा होता है तो सब बंद हो जाता है. इधर के लोग इधर, उधर के लोग उधर. गांव में एक पुल तक नहीं है. चूंकि सदियों से यही स्थिति है, ऐसे में हम दो महीने का राशन इकट्ठा कर लेते हैं. इस दौरान अगर किसी के घर में राशन की कमी हुई, तो आपस में राशन का चंदा कर बंटवारा कर लेते हैं. अगर कोई बीमार पड़ा तो इंतजार और मरने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है.
गांव के प्रेम बिरिजिया बीते कई सालों से केरलम जाकर मजदूरी करते थे. इसी साल जनवरी माह में घर लौटे थे. ठंढ़ थी, सो आग सेंक रहे थे. पैर चल गया. पैसे नहीं थे, ऐसे में स्थानीय झोलाछाप डॉक्टर की मदद से इलाज कराने लगे. सुधार न होता देख, हिम्मत और पैसे जुटाकर एक बार मुख्य बाजार लातेहार भी गए, पर फ़ायदा नहीं हुआ और लौट आए.

हालात ये हो गए हैं कि वो अब विकलांग होने के कगार पर पहुंच चुके हैं. इस घाव का मवाद हर दिन बढ़ता जा रहा है और वो बिल्कुल भी चल नहीं पाते. घर में पत्नी और छोटा बच्चा है. वे पूछते हैं, “बच्चे को संभालूं या पत्नी को?” घर में चावल है, वही खाते हैं.
इस बेबसी को ग्राम प्रधान दानियल बिरजिया के शब्दों से समझिये. वो कहते हैं, सरकार और सरकारी मदद के बारे में सोचने की शुरूआत अभी इस गांव के लोगों तक नहीं पहुंचा है. ऐसे में वो और उनके जैसे गांव के 250 से अधिक लोग अपने हालात और इस स्थिति के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराते.
पहाड़ से उतरकर फुलमनी देवी सरकारी राशन लेने नीचे जा रही थीं. परिवार को दो वक्त का खाना सुनिश्चित हो, इसके लिए आना-जाना मिलाकर करीब ढाई घंटे का सफ़र तय करना है. पूर्व के रघुवर सरकार के समय डाकिया योजना की शुरूआत की गई थी. जिसके तहत आदिम जनजातियों के दरवाजे तक राशन पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी. लेकिन जब गांव में सड़क ही नहीं है, भला क्विंटल-क्विंटल राशन, वो भी हर महीने कौन राशन डीलर पहुंचा पाएगा.
18 साल की राजंती के सिर पर 33 किलो चावल का बोझ था. वे कहती हैं कि उतरना आसान है, चढ़ाई में पहाड़ भी चढ़ना है और सिर पर राशन भी. गांव के रमेश बताते हैं, हमेशा सिर्फ़ चावल मिलता है. दाल, नमक या कोई और चीज़ शायद ही कभी.
2008 का नियुक्ति पत्र, जो आज भी संभालकर रखा है
कमल बिरजिया के पास 24 फ़रवरी 2008 का होमगार्ड नियुक्ति पत्र है. उनके मुताबिक़ गांव के 52 लोगों की नियुक्ति हुई थी, पर किसी को बुलाया नहीं गया. वे कहते हैं कि अगर तब सबकी नौकरी लग जाती तो गांव की दशा बदल जाती. 18 साल से पत्र इस उम्मीद में रखा है कि सरकार कभी बुलाएगी. थक-हारकर वे खेती करने लगे. दोनों बेटे केरल में मज़दूरी करते हैं, बहुएं घर पर हैं. उनका कहना है कि नौकरी होती तो बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलती और पलायन न करना पड़ता.
पंडित नेहरू मध्य विद्यालय के छात्र राजकमल बिरजिया और मोहित बिरजिया कहते हैं कि पढ़ाई अच्छी होती है, लेकिन शिक्षक बहुत कम हैं. ज़्यादा शिक्षक होते तो वे और अच्छा सीख पाते.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कह चुके हैं कि बिरजिया समेत झारखंड के आठों PVTG समुदाय विलुप्ति की ओर बढ़ रहे हैं. उनके मुताबिक़ इन्हें बचाना और रोज़गार के अवसर देना सरकार की ज़िम्मेदारी है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जमशेदपुर में 75 PVTG के लिए 24,000 करोड़ के मिशन की बात की और कहा कि सिर्फ़ पैसा भेजने की बजाय घर बनाकर देना ज़रूरी है.
दौना की तस्वीर इन बयानों से उलट है. यहां रोज़गार का पत्र 18 साल से तिजोरी में बंद है, और आवास व शौचालय अधूरे हैं. पीएम आवास, बिरसा आवास, ओडीएफ, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का इस गांव के लिए कोई मतलब नहीं है.
जोहार लाइव की पिछली पड़ताल में सामने आया था कि इसी स्कूल की शिक्षिका ज्योति तिलरा के मुताबिक़ 100 में से 30 बच्चों के पहचान पत्र से बिरजिया टाइटल ग़ायब है. उसी रिपोर्ट में सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा के कहे को याद किया था: “हम आदिवासी हैं, हमें कोई और नाम न दिया जाए.” यानी जिस समुदाय के पास सड़क नहीं, पुल नहीं, उसकी पहचान भी अब काग़ज़ पर अधूरी है.
नरेश सक्सेना की कविता कहती है कि पुल पार करने से नदी पार नहीं होती. दौना के बिरजिया रोज़ नदी पार करते हैं, पर सवाल अब भी इस पार खड़ा है: उन तक पुल कब पहुंचेगा? फिर उस पुल के सहारे नियुक्ति पत्र को नौकरी में बदला जाएगा. हालांकि फिलहाल ये सब महज कोरी कल्पना की नजर आती है.
केंद्र में सत्ताधारी दल बीजेपी का दावा है कि 2014 के बाद से देश ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ (नीतिगत पक्षाघात) से निकलकर सुधार और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ चला है. चूंकि दौना गांव में पुल नहीं है, सो इसका प्रभाव अभी तक वहां नहीं पहुंच पाया है.

