कारगिल की ऊंची चोटियों पर दुश्मन के ठिकानों पर हमला हो या सियाचिन की बर्फीली ऊंचाइयों पर तैनात सैनिकों तक जरूरी सामान पहुंचाना, भारतीय वायुसेना ने युद्ध के मैदान से लेकर आपदा के समय तक अपनी क्षमता साबित की है. साल 1947-48 के जम्मू-कश्मीर संघर्ष से शुरू हुआ यह सफर 1965 और 1971 के युद्धों से गुजरते हुए 1999 के कारगिल युद्ध के ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ तक पहुंचा. आज राफेल, सुखोई-30 एमकेआई और स्वदेशी तेजस जैसे आधुनिक लड़ाकू विमान इसकी ताकत हैं. लेकिन अब युद्ध की तस्वीर बदल रही है और वायुसेना के सामने चुनौती भी पहले से कहीं बड़ी है.
भारतीय वायु सेना 8 अक्टूबर 1932 को अस्तित्व में आई, यह आज अपनी स्थापना के 94 वर्ष पूरे कर रही है. करीब नौ दशक के इस सफर में एक छोटी वायु इकाई से लेकर आधुनिक लड़ाकू विमानों, परिवहन विमानों, हेलीकॉप्टरों, रडार और हवाई सुरक्षा प्रणालियों से लैस सैन्य शक्ति तक का सफर तय किया गया है. युद्ध के समय दुश्मन के विमानों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने से लेकर दुर्गम सीमावर्ती इलाकों में सेना को मदद पहुंचाने और बाढ़-भूकंप जैसी आपदाओं में राहत अभियान चलाने तक इसकी भूमिका लगातार बढ़ी है.
लेकिन 2026 की भारतीय वायुसेना को केवल उसके लड़ाकू विमानों से समझना पर्याप्त नहीं होगा. आज आसमान में खतरा सिर्फ दूसरे लड़ाकू विमान से नहीं आता. ड्रोन, लंबी दूरी की मिसाइलें, रडार से बचने वाली तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक हमले और साइबर तकनीक ने युद्ध को पहले से ज्यादा जटिल बना दिया है. ऐसे में किसी वायुसेना की ताकत इस बात से भी तय होती है कि वह खतरे को कितनी जल्दी देख सकती है, उसकी जानकारी कितनी तेजी से अपने सैन्य तंत्र तक पहुंचा सकती है और कितनी सटीकता से जवाब दे सकती है. यही वह बदलाव है, जो भारतीय वायुसेना के अगले दौर को खास बनाता है.
युद्धों से मिली ताकत
आज की भारतीय वायुसेना की नींव उसके युद्ध अनुभवों में भी दिखाई देती है. साल 1947-48 में जम्मू-कश्मीर में भारतीय सैनिकों और जरूरी सामान की हवाई आवाजाही ने यह दिखाया कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में वायुसेना कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है.
साल 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में इसकी भूमिका और विस्तृत हुई. साल 1971 के युद्ध में पूर्वी मोर्चे पर भारतीय वायुसेना की कार्रवाई ने युद्ध की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके बाद सियाचिन जैसे अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र में सेना को लगातार सहायता पहुंचाने की जिम्मेदारी सामने आई.
साल 1984 में शुरू हुए ऑपरेशन मेघदूत के दौरान हेलीकॉप्टर और परिवहन विमान बेहद कठिन परिस्थितियों में सैनिकों और जरूरी सामग्री की आवाजाही का महत्वपूर्ण माध्यम बने.
फिर आया 1999 का कारगिल युद्ध, कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर भारतीय सेना की कार्रवाई को हवाई समर्थन देने के लिए भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर चलाया. मिराज-2000 जैसे विमानों ने पहाड़ों में मौजूद लक्ष्यों के खिलाफ कार्रवाई की. ऊंचाई और कठिन भूगोल के बीच चलाया गया यह अभियान भारतीय वायुसेना की युद्धक क्षमता के महत्वपूर्ण उदाहरणों में गिना जाता है.
राफेल, सुखोई और तेजस की ताकत
आज भारतीय वायुसेना के लड़ाकू बेड़े में अलग-अलग क्षमता और भूमिका वाले विमान हैं. सुखोई-30 एमकेआई भारत का भारी, दो इंजन वाला बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है. यह लंबी दूरी तक उड़ान भर सकता है और बड़ी मात्रा में हथियार ले जा सकता है. भारत में इसका निर्माण भी किया जाता है.
राफेल फ्रांस की दसॉ एविएशन का आधुनिक बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है. हवा में दूसरे विमानों से मुकाबला करने के साथ जमीन पर स्थित लक्ष्यों के खिलाफ कार्रवाई में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. भारत ने 36 राफेल विमान खरीदे हैं. फरवरी 2026 में रक्षा खरीद परिषद ने भारतीय वायुसेना के लिए 114 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों की प्रस्तावित खरीद को प्रारंभिक मंजूरी दी. प्रस्ताव में भारत में बड़े पैमाने पर निर्माण पर भी जोर दिया गया है.
इसके बीच तेजस भारत की अपनी लड़ाकू विमान बनाने की क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है. हल्के लड़ाकू विमान के रूप में विकसित तेजस भारतीय वायुसेना में स्वदेशी तकनीक की हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.
सितंबर 2025 में रक्षा मंत्रालय ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ 97 तेजस एमके-1ए विमानों के लिए 62,370 करोड़ रुपये से अधिक का अनुबंध किया था. मिराज-2000 और मिग-29 जैसे विमान भी भारतीय वायुसेना के लड़ाकू बेड़े का हिस्सा हैं, जबकि जगुआर की प्रमुख भूमिका जमीन पर स्थित सैन्य लक्ष्यों के खिलाफ कार्रवाई की रही है. इस तरह भारतीय वायुसेना का बेड़ा केवल एक तरह के विमान पर निर्भर नहीं है. अलग-अलग विमान अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं.
अब आसमान में बदल गया है युद्ध का तरीका
आधुनिक युद्ध में केवल यह मायने नहीं रखता कि किसी देश के पास कितने लड़ाकू विमान हैं. उतना ही महत्वपूर्ण यह है कि उन विमानों को दुश्मन की जानकारी कितनी जल्दी और कितनी सटीकता से मिलती है. रडार और निगरानी विमान दूर बैठे खतरे का पता लगा सकते हैं. हवा में निगरानी और चेतावनी देने वाली प्रणालियां युद्ध क्षेत्र की जानकारी जुटा सकती हैं.
उपग्रहों से मिलने वाली जानकारी भी इसमें मदद करती है. फिर यह जानकारी सैन्य नियंत्रण केंद्रों तक पहुंचती है और वहां से तय होता है कि किस विमान या हथियार प्रणाली से जवाब दिया जाना है. यानी आज हवाई युद्ध की पूरी प्रक्रिया केवल विमान उड़ाने तक सीमित नहीं है. पहले खतरे को देखना, फिर उसकी पहचान करना, जानकारी साझा करना, फैसला लेना और उसके बाद सटीक कार्रवाई करना—यही आधुनिक हवाई युद्ध की नई तस्वीर है.
ड्रोन ने बढ़ाई नई चुनौती
ड्रोन ने युद्ध के मैदान को और बदल दिया है. छोटे ड्रोन निगरानी से लेकर लक्ष्य की पहचान और कुछ परिस्थितियों में हमले तक के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. यह हवाई सुरक्षा के लिए नई चुनौती है. हर छोटे ड्रोन को रोकने के लिए महंगे लड़ाकू विमान का इस्तेमाल करना व्यावहारिक नहीं होगा. इसलिए ड्रोन को पहचानने और रोकने वाली अलग प्रणालियों की जरूरत बढ़ रही है.
भारतीय वायुसेना भी इस दिशा में अपनी क्षमता बढ़ा रही है. साल 2026 के वायु शक्ति अभ्यास में दूर से संचालित विमानों और ड्रोन रोधी प्रणालियों को शामिल किया गया. इससे स्पष्ट है कि भविष्य का युद्ध केवल पायलट वाले विमानों का युद्ध नहीं होगा.
लंबी दूरी की मिसाइलों ने हवाई युद्ध की दूरी भी बदल दी है. अब किसी विमान को हर लक्ष्य के बिल्कुल ऊपर पहुंचना जरूरी नहीं है. इससे रडार, लक्ष्य की जानकारी और सटीक निशाना तय करने वाली प्रणालियों का महत्व बढ़ गया है.
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध भी इसी बदलाव का हिस्सा है. दुश्मन के रडार और संचार तंत्र को प्रभावित करना और अपने सैन्य तंत्र को ऐसे हमलों से बचाना आधुनिक युद्ध में महत्वपूर्ण हो गया है. इसलिए आने वाले समय में किसी लड़ाकू विमान की क्षमता केवल उसकी गति या दिशा बदलने की क्षमता से नहीं आंकी जाएगी. उसके रडार, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियां और दूसरे सैन्य तंत्रों से जुड़कर काम करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी.
भारत की भौगोलिक स्थिति वायुसेना की भूमिका को और महत्वपूर्ण बनाती है. पश्चिम में पाकिस्तान और उत्तर तथा पूर्व में चीन से लगी सीमाओं के अलावा भारत के सामने हिमालय का कठिन भूगोल है. ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों और सैन्य सामग्री को जमीन के रास्ते पहुंचाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. ऐसे में परिवहन विमान और हेलीकॉप्टर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वहीं युद्ध की स्थिति में लड़ाकू विमान कम समय में बड़ी दूरी तय करके जमीन पर मौजूद सैनिकों को हवाई सहायता दे सकते हैं. इसलिए वायुसेना केवल आसमान की रक्षा करने वाली सेना नहीं है. उसकी क्षमता का सीधा असर जमीन पर चलने वाले सैन्य अभियान पर भी पड़ता है.
अगला दौर स्वदेशी तकनीक का
भारतीय वायुसेना के सामने अब एक साथ दो बड़ी जरूरतें हैं. पुराने लड़ाकू विमानों की जगह आधुनिक विमान लाना और अपनी स्वदेशी विमान निर्माण क्षमता को मजबूत करना. तेजस एमके-1ए की बड़ी खरीद इसी दिशा का हिस्सा है. इसके आगे स्वदेशी एएमसीए जैसे कार्यक्रम भारत को भविष्य के आधुनिक लड़ाकू विमान विकसित करने की दिशा में ले जा रहे हैं.
लेकिन आधुनिक वायुसेना केवल विमान खरीदने से नहीं बनती. उसके लिए प्रशिक्षित पायलट, इंजीनियर, तकनीकी कर्मचारी, हथियार, कल-पुर्जे, हवाई अड्डे, रडार, संचार और प्रशिक्षण का मजबूत ढांचा भी जरूरी है. यानी भारत के सामने चुनौती सिर्फ आसमान में ज्यादा विमान खड़े करने की नहीं, बल्कि पूरी हवाई युद्ध व्यवस्था को मजबूत करने की है.
साल 1932 में कुछ विमानों से शुरू हुई भारतीय वायुसेना आज राफेल, सुखोई-30 एमकेआई और तेजस जैसे लड़ाकू विमानों से लैस है. उसके पास परिवहन विमान, हेलीकॉप्टर, निगरानी प्रणालियां और हवाई सुरक्षा के अलग-अलग साधन भी हैं. युद्ध के मैदान में उसकी उपलब्धियां उसके करीब नौ दशक लंबे सफर को दिखाती हैं. लेकिन आने वाला समय नई चुनौती लेकर आया है. अब मुकाबला सिर्फ लड़ाकू विमान से लड़ाकू विमान का नहीं होगा. ड्रोन, मिसाइल, रडार, उपग्रह, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और तेजी से जुड़ते सैन्य संचार तंत्र युद्ध की दिशा तय करेंगे.
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