रिपोर्ट – आदिल नवाब/समीर सत्या
फोटो – नयन कुमार महतो
बदलते तकनीक के साथ साइबर फ्रॉड, डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसे कई मामले हर रोज सुनने और देखने को मिलते रहते हैं. लेकिन इन सभी मामलों में एक बात कॉमन है कि अपराधी कोई अज्ञात शख्स होता है. एक रैंडम कॉल जिसके झांसे में आप या तो आ सकते हैं या नहीं आ सकते हैं.
लेकिन गोड्डा, साहेबगंज, दुमका, पाकुड़, जामताड़ा जिलों के आदिम जनजाति पहाड़िया के गांवों में चुपचाप धोखाधड़ी का एक ऐसा रैकेट पनप रहा है, जो इन पहाड़िया समुदाय के लोगों के पैसे इतने सफाई से हड़प ले रहा है, जिसका पता लगा पाना पीड़ितों के लिए बहुत ही मुश्किल होता है.
झारखंड में दो पहाड़िया समुदाय निवास करती है. माल पहाड़िया, जिनकी आबादी साल 2011 की जनगणना के मुताबिक 1,35,797 है. वहीं सौरिया पहाड़िया की आबादी इसी जनगणना के मुताबिक 46,222 मात्र है. इनकी पारंपरिक आजीविका झूम खेती (जिसे स्थानीय भाषा में ‘कुरवा’ भी कहा जाता है) पर आधारित है. इसके तहत वे जंगल के एक हिस्से को साफ करके कुछ साल खेती करते हैं. इसके अलावा वे वनोपज (जड़ी-बूटियां, फल, कंदमूल और शहद) एकत्र करते हैं और शिकार पर निर्भर रहे हैं.
पैसा गायब होता है, डर से बोलते नहीं
साफ पानी के अभाव में मलेरिया जैसी बीमारियों की सबसे अधिक शिकार होनेवाली ये आदिम जनजाति इस समय एक अलग समस्या से जूझ रही है. इनके खाते में आनेवाले पैसे में सेंधमारी की जा रही है. कभी इन्हें इसकी जानकारी होती है, कभी पता ही नहीं चलता. ज्यादातर घटनाएं उन लोगों के साथ होती हैं जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते.
दरअसल, उनके खाते में आने वाली विभिन्न सरकारी योजनाओं की राशि निकालने के लिए वे पूरी तरह ग्राहक सेवा केंद्र यानी कस्टमर सर्विस प्वाइंट (सीएसपी) पर निर्भर होते हैं. इस पूरे खेल को कई तरीकों से अंजाम दिया जाता है. इसमें सबसे प्रचलित तरीका यह है कि गांव के किसी ऐसे शख्स को शामिल किया जाता है जो पैसे के लेन-देन में गांव वालों की मदद करता है. जिसे बिचौलिया या दलाल कहा जाता है.
उसके मार्फत लाभार्थी को सीएसपी ले जाया जाता है, जहां खाते से निकाली गई रकम में से कुछ पैसे लाभार्थी को दे दिए जाते हैं और बाकी आपस में बांट लिए जाते हैं. दूसरा एक और प्रचलित तरीका यह होता है कि सीएसपी कर्मचारी की ओर से यह बहाना बनाया जाता है कि किसी इंश्योरेंस या किसी सरकारी स्कीम के तहत आपके पैसे कट गए हैं. ध्यान देनेवाली बात ये है कि इन आदिवासियों को इस बात की बहुत कम जानकारी होती है कि किस योजना के कितने पैसे मिलते हैं और उनके खाते में कितने पैसे हैं. स्थानीय दलाल इसी बात का फायदा उठाते हैं.

इसी की पड़ताल करने हम गोड्डा जिले के सुंदरपहाड़ी प्रखंड के भुस्की पहाड़ के ऊपर बसे गांवों में पहुंचे. वहां हमें जो जानकारी मिली, वह और भी चौंकाने वाली थी. देवा पहाड़िया के खाते में पहले से 1000 रुपये थे, लेकिन सीएसपी जाने के बाद उन्हें 400 रुपये कम दिए गए. इसमें किसी भी तरह का कोई बिचौलिया शामिल नहीं था. यह काम सीधे सीएसपी के कर्मचारी द्वारा किया जा रहा था.
इसके बाद हम इसकी पड़ताल करने पाकुड़ पहुंचे. जिले के आमड़ापाड़ा प्रखंड के के बड़ा बांध कोय में जुलाई महीने के दूसरे हफ्ते में मैया योजना की तीन महीने की राशि लगभग हर महिला के खाते में आ गई थी. लेकिन गांव के एक बिचौलिए के द्वारा इन महिलाओं को सिर्फ दो महीने के ही पैसे दिए गए. पहाड़िया महिलाएं इसके बारे में बात तो करती हैं, लेकिन किसी दलाल या सीएसपी का नाम लेने से कतराती हैं. उन्हें डर है कि अगर वो नाम लेती हैं तो आनेवाले समय में ये सीएसपी संचालक उनके पैसे निकाल कर नहीं देगा.
यह सिर्फ एक महिला के साथ नहीं हो रहा था, बल्कि गांव की ज्यादातर महिलाओं के साथ ऐसा किया जा रहा था. चूंकि योजनाओं की राशि सरकार की ओर से लगभग एक ही समय पर सभी के खातों में भेजी जाती है, इसलिए ये महिलाएं भी साथ में सीएसपी जाना पसंद करती हैं. इससे सीएसपी में भीड़ हो जाती है और इसी भीड़ का फायदा उठाकर उनके साथ यह कथित धांधली की जाती है.
अमड़ापाड़ा के ही बिरेन्द्र हेम्ब्रम के साथ सीएसपी के माध्यम से उनके 20 हजार रुपये का कथित गबन कर लिया जाता है. जब इस बात की जानकारी उनके बेटे को होती है, तब बैंक मैनेजर और गांव के बुजुर्गों की मौजूदगी में इस मामले को सुलटा लिया जाता है. जब हम उनसे इस बारे में बात करने जाते हैं, तो वे ऑफ कैमरा बातचीत तो करते हैं, लेकिन ऑन कैमरा कुछ भी कहने से इनकार कर देते हैं.
इसी इलाके के आलूबेड़ा गांव की संजली मरांडी के बैंक खाते से दो किस्तों में 9,900 रुपये की कथित अवैध निकासी की जाती है. इसके बाद वह एफआईआर दर्ज कराती हैं और मामला सामने आता है.
माइंस से मिले मुआवजा पर गिद्ध नजर
बता दें, आलूबेड़ा कोयला खदान से सटा इलाका है. जिन लोगों का जमीन माइंस के लिए गया है, उन लोगों को बतौर मुआवजा बड़ी रकम दी गई है. स्थानीय दलालों के पास ऐसे लोगों की पूरी लिस्ट है. वो उन्हें अपना सबसे आसान शिकार बनाते हैं. ऐसे लोग जब भी पैसा निकालने जाते हैं, एक बड़ी रकम उनके खाते से दलाल निकाल ले जाते हैं.
जाहिर है, यह जानकारी सीएसपी कर्मचारी को होती है कि किसके खाते में कितने रुपये हैं. अपनी पुश्तैनी जमीन खदान के लिए देकर जो राशि इनकी बची हुई पूंजी के रूप में खातों में आई है, उस पर बाज जैसी नजर गड़ाए बैठे सीएसपी कर्मचारी और उनके ऊपर के अधिकारियों तक भी इसके तार जुड़ते हैं.
सवाल यह भी है कि इन मामलों का निपटारा इतनी जल्दी कैसे कर लिया जाता है? एक ग्रामीण ने बताया कि बिरेन्द्र हेम्ब्रम के मामले में जब सुलह के लिए बैठक हुई थी, तो उसमें बैंक के मैनेजर भी शामिल थे. फिर सवाल उठता है कि बैंक मैनेजर ने उस सीएसपी का लाइसेंस रद्द क्यों नहीं किया? कार्रवाई करने के बजाय सुलह क्यों कराई जा रही है?
पहाड़िया समुदाय से ही आने वाले एक शिक्षित युवक सुनील पहाड़िया जो भारतीय जनता पार्टी से भी जुड़े हैं, वो कहते हैं, जिस तरीके से ऑनलाइन फ्रॉड करनेवाले लोगों का जीवनस्तर रातों रात बदल जाता है, वैसे ही इन सीएसपी संचालकों का जीवनस्तर बदल जा रहा है.

इस पूरे स्कैम में साइबर फ्रॉड की तरह अपराधी ना ही अपरिचित होता है और ना ही किसी रैंडम कॉल के द्वारा बेवकूफ बना कर पैसे चपत करने की कोशिश होती है. ये गांव के सबसे नजदीकी ग्राहक सेवा केंद्र के द्वारा, जिसे सीएसपी भी कहा जाता है, इस घोटाले के खेल को अंजाम दिया जा रहा है.
लेकिन सीएसपी धारक इतना भी प्रभावशाली नहीं होता, कि अकेले वो इस खेल को अंजाम दे सके. जाहिर है, इसमें कथित तौर पर कई तरह के स्टेकहोल्डर शामिल होते हैं. शिकार को भी बड़ी संजीदगी से चुना जाता है. ताकि अगर पोल भी खुल जाए तो मामले को लोकल लेवल में ही निपटा लिया जाय.
ग्राहक सेवा केंद्र, जिसे शॉर्ट में सीएसपी कहा जाता है, की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि गांवों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों तक बैंकिंग सेवाएं आसानी से पहुंच सके. जिन जगहों पर बैंक शाखाएं नहीं हैं या बहुत दूर हैं, वहां लोगों को पैसे जमा करने, निकालने, आधार आधारित लेन-देन, खाता खोलने और दूसरी बुनियादी बैंकिंग सुविधाएं उनके गांव के करीब ही मिल सकें. लेकिन जिस व्यवस्था को लोगों की सुविधा के लिए बनाया गया था, उसी का कथित तौर पर कुछ जगहों पर दुरुपयोग भी किया जा रहा है.
साफ पानी आज तक मयस्सर नहीं
प्रीमिटिव ट्राइब के दो बड़े समुदाय, सौरैया पहाड़िया और माल पहाड़िया, जो ज्यादातर पहाड़ों के ऊपर बसे गांवों में रहते हैं. आजादी के बाद बीते 78 सालों में बुनियादी सुविधाओं के नाम पर इनके पास छिटपुट ही किसी तरह की योजनाएं पहुंची हैं. साफ पानी और सड़क जैसी बुनियादी परेशानियों से जूझता यह समुदाय रोजमर्रा की जिंदगी में कई तरह के संघर्ष करता है. फॉर्मल एजुकेशन न के बराबर होने की वजह से यह समुदाय सबसे आसान शिकारों में से एक है.

हालात ये हैं कि, हर साल डायरिया-मलेनिया की मार ये आदिम जनजाति सबसे अधिक झेलती है. साल 2025 के जून महीने में पाकुड़ जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड के छोटा चटकम और पास के अमड़ापाड़ा प्रखंड के बास्को गांव में 25 से अधिक लोग मलेरिया और डायरिया को चपेट में आए थे. साल 2024 के ही नंवबर माह में लिट्टीपाड़ा में ही चार बच्चों सहित कुल पांच लोगों की मौत मलेरिया से हो गई थी. उस वक्त की गई स्वास्थ्य विभाग की जांच में पूरे प्रखंड में कुल 972 लोग मलेरिया की चपेट में आए थे.
संसद में गोड्डा के सांसद निशिकांत दुबे की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, उसी साल गोड्डा जिले के सुंदरपहाड़ी इलाके में पहाड़िया आदिम जनजाति के 30 लोगों की मौत हो गई थी.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मलेरिया के डॉ राजेश कुमार राव ने पाकुड़ जिले के सौरिया पहाड़िया आदिम जनजाति बहुल आठ गांवों में मलेरिया को लेकर रिसर्च किया था. 2021 में छपी इस रिपोर्ट के मुताबिक, इलाके में मलेरिया के 20 प्रकार के मच्छर और 92.2 फीसद लोगों में मलेरिया के एक टाइन प्लाज्मोडियम फाल्सिपेरम के लक्षण पाए गए थे.
इस देश की नाकामी भी है कि आजादी के 75 साल बाद भी एक ऐसा समुदाय मौजूद है, जिसे सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए कई तरह की मुश्किलों से गुजरना पड़ता है.
जाहिर है बिना सीएसपी कर्मचारी के मंजूरी के पूरे गांव के महिलाओं का ढाई ढाई हजार गबन कर जाना किसी एक आदमी के बस की बात ही नहीं है. इतने पैसे की हेराफेरी को सिर्फ बिचौलिए के बूते वह भी नियमित तरीके के, संभव नहीं है. इसमें बैंक कर्मियों, स्थानीय प्रभावशाली लोग की मिलीभगत साफ तौर पर नजर आती है. यही पैटर्न है, जिसे लगभग हर पहाड़िया गांव में फॉलो किया जा रहा है.

