Johar Live Desk : होली का त्योहार बस आने ही वाला है और पूरा देश जश्न के रंग में रंगने को तैयार है। दिवाली के बाद यह भारत के सबसे बड़े और धूमधाम से मनाए जाने वाले त्योहारों में गिना जाता है। इस साल होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, होली का इतिहास सत्य युग से जुड़ा हुआ है। यह सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत, प्रेम, एकता और वसंत ऋतु के स्वागत का प्रतीक है। इसे होलिका पूर्णिमा भी कहा जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे फगुआ, होलिकोत्सव, डोल जात्रा (बंगाल) और शिमगा (महाराष्ट्र) जैसे नामों से जाना जाता है। आइए जानते हैं होली से जुड़ी कुछ प्रमुख पौराणिक कथाएं :
प्रह्लाद और होलिका की कहानी: भक्ति की जीत
होली की सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद से जुड़ी है।कहते हैं कि राक्षस राजा हिरण्यकश्यप चाहता था कि सब उसकी पूजा करें, लेकिन उसका बेटा प्रह्लाद हर समय भगवान विष्णु का नाम जपता था। इससे नाराज़ होकर हिरण्यकश्यप ने उसे मारने की कई कोशिशें कीं। आखिर में उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया, जिसे आग से न जलने का वरदान था। योजना यह थी कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाएगी और वह जल जाएगा। लेकिन हुआ उल्टा। भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर राख हो गई। तभी से होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई, जिसे “छोटी होली” भी कहा जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
श्रीकृष्ण और राधा रानी की फूलों वाली होली
होली का रंगीन रूप भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की प्रेम कथा से भी जुड़ा है। मान्यता है कि एक बार श्रीकृष्ण लंबे समय तक राधा से नहीं मिल पाए। उनके वियोग में प्रकृति भी उदास हो गई और फूल मुरझा गए। जब कृष्ण को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो वे राधा से मिलने पहुंचे। उनके आते ही चारों ओर खुशियां लौट आईं। कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने एक फूल तोड़कर राधा की ओर फेंका। राधा ने भी मुस्कुराते हुए फूल लौटाया। इसे देखकर गोपियां भी फूलों की बारिश करने लगीं। तभी से “फूलों की होली” की परंपरा चली आ रही है, जो प्रेम और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
राजा रघु और राक्षसी धोंडा की कथा
एक और कथा के अनुसार, सत्य युग में राजा रघु के राज्य में धोंडा (जिसे होलिका भी कहा गया) नाम की राक्षसी बच्चों को परेशान करती थी। राजा ने गुरु वशिष्ठ से समाधान मांगा। पता चला कि राक्षसी को किसी देवता, इंसान या राक्षस से नुकसान नहीं हो सकता। उसे सिर्फ बच्चों की शरारतों से हराया जा सकता था। गांव के बच्चों ने उसकी मिट्टी की मूर्ति बनाई और पूजा के बाद उसे जला दिया। मान्यता है कि मूर्ति के जलते ही असली राक्षसी भी खत्म हो गई। इसी खुशी में लोगों ने होली मनाई।
भगवान शिव और कामदेव की कथा
एक और मान्यता भगवान शिव और कामदेव से जुड़ी है। सती की मृत्यु के बाद शिव गहरे ध्यान में लीन हो गए थे। देवी पार्वती ने उन्हें पुनः संसार से जोड़ने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। तब कामदेव ने अपने प्रेम बाण से शिव को जगाने की कोशिश की। इससे शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया। हालांकि बाद में शिव को पार्वती से प्रेम हो गया और सब सामान्य हो गया। दक्षिण भारत में होली को “काम-दहन” या “कामन पंडिगई” के रूप में भी मनाया जाता है।
सिर्फ रंगों का नहीं, रिश्तों का भी त्योहार
होली हमें यह सिखाती है कि चाहे कितनी भी बुराई क्यों न हो, अंत में जीत अच्छाई की ही होती है। यह त्योहार मनमुटाव मिटाने, रिश्तों को मजबूत करने और खुशियां बांटने का मौका देता है।
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