ग्रेट निकोबार द्वीप में वनाधिकार को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है. ट्राइबल काउंसिल ने केंद्र सरकार और प्रशासन के उस दावे पर सवाल उठाए हैं, जिसमें कहा गया था कि वनाधिकार अधिनियम (Forest Rights Act – FRA) के तहत आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर ली गई है. काउंसिल का कहना है कि वास्तविक स्थिति इससे अलग है और निकोबारी समुदाय को अब तक उनके पारंपरिक जंगलों पर सामुदायिक वनाधिकार (Community Forest Rights) नहीं मिले हैं.
काउंसिल ने वर्ष 2022 में जारी उस प्रमाणपत्र को वापस लेने की मांग की है, जिसके आधार पर प्रशासन ने वनाधिकार संबंधी प्रक्रिया पूरी होने का दावा किया था. उनका कहना है कि बिना सामुदायिक वनाधिकार प्रदान किए ऐसा प्रमाणपत्र जारी करना वनाधिकार अधिनियम की भावना और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है.
विकास परियोजना से पहले अधिकारों की मान्यता जरूरी
ट्राइबल काउंसिल का कहना है कि वनाधिकार अधिनियम के तहत किसी भी विकास परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले वहां रहने वाले पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देना अनिवार्य है. उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया को पूरा किए बिना ग्रेट निकोबार की मेगा विकास परियोजना पर काम आगे बढ़ाया जा रहा है.
मेगा परियोजना पर पर्यावरणविदों की भी चिंता
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, नया हवाई अड्डा, टाउनशिप और अन्य आधारभूत ढांचे का निर्माण शामिल है. सरकार का कहना है कि इससे क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और रणनीतिक दृष्टि से ग्रेट निकोबार का महत्व और मजबूत होगा.
हालांकि, पर्यावरणविदों और आदिवासी अधिकारों से जुड़े कई संगठनों का कहना है कि बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य से द्वीप की समृद्ध जैव विविधता, संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र और वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों की पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हो सकती है.
ट्राइबल काउंसिल ने स्पष्ट किया है कि वह विकास के खिलाफ नहीं है, लेकिन विकास के नाम पर आदिवासी समुदाय के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जा सकती. काउंसिल की मांग है कि पहले वनाधिकार अधिनियम के तहत सभी वैध अधिकारों को मान्यता दी जाए और उसके बाद ही परियोजना से जुड़ी आगे की प्रक्रिया शुरू की जाए.
काउंसिल के इस बयान के बाद ग्रेट निकोबार परियोजना और वनाधिकार का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है. अब सभी की निगाहें प्रशासन और केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं.
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