झारखंड सहित देश के अन्य हिस्सों में नक्सलवाद लगभग खत्म हो चला है. लेकिन वर्तमान समय में भी नक्सलियों के समर्थक और कुछ खूंखार नक्सली पुलिस की पहुंच से दूर है. इन सब के बीच खबर ये है कि नक्सली अपने दिवंगत नेता और नक्सल आंदोलन के जनक चारु मजूमदार को लेकर ‘चारु फोर्टनाइट’ कार्यक्रम चलाते है.
चारू मजूमदार का जन्म 15 मई 1918 को हुआ और उनकी मृत्यु 28 जुलाई 1972 को हुई थी. ऐसे में हरेक साल नक्सली एक सप्ताह उनको समर्पित करते हुए देशभर में कार्यक्रम करते हैं. इस साल भी 28 जुलाई से 11 अगस्त तक चारू फोर्टनाइट मनाए जाने की सूचना है. ऐसे में चारु फोर्टनाइट को लेकर खुफिया एजेंसियो के द्वारा सभी राज्यों को अलर्ट किया गया है. इसे लेकर झारखंड में भी विशेष सतर्कता बरती जा रही है.
गृह मंत्री अमित शाह के देश से नक्सलवाद खत्म होने के घोषणा के बाद चारु फोर्टनाइट का समय आने वाला है. पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां दोनो ही यह जानने का प्रयास कर रही है कि खत्म हो चले नक्सलवाद के बाद चारु फोर्टनाइट का क्या असर होगा.
वही दूसरी तरफ प्रतिबंधित भाकपा माओवादी संगठन के द्वारा हर वर्ष मनाए जाने वाले “चारू फोर्टनाइट” को लेकर सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं. यह अवधि 28 जुलाई से 11 अगस्त तक का होता है. इस दौरान नक्सली (माओवादी) संगठन अपने संस्थापक चारू मजूमदार की पुण्यतिथि और क्रांतिकारी नेता कन्हाई चटर्जी की स्मृति में विभिन्न कार्यक्रम, विरोध अभियान और संगठनात्मक गतिविधियां चलाते आए है.
क्या है इसके पीछे की कहानी
नक्सल जानकार बताते हैं कि नक्सल आंदोलन के जनक कहे जाने वाले चारू मजूमदार का निधन 28 जुलाई 1972 को हुआ था. उनकी स्मृति में माओवादी संगठन हर वर्ष इस अवधि को “चारू फोर्टनाइट” के रूप में मनाता है. इसका समापन 11 अगस्त को कन्हाई चटर्जी की पुण्यतिथि पर होता है.
इस दौरान संगठन अपने कैडरों को सक्रिय करने, जनसंपर्क बढ़ाने और विभिन्न क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का प्रयास करता है.चारू फोर्टनाइट के दौरान माओवादी संगठन पोस्टर, बैनर, पर्चे और प्रचार सामग्री के जरिए अपनी विचारधारा फैलाने की कोशिश कर सकता है. साथ ही, सुरक्षा बलों और सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की कोशिश भी की जाती है.
चारु मजूमदार और कानू सान्याल दोनो नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रमुख चेहरे
1918 में बंगाल में जन्मे चारु मजमुदार भारतीय नक्सलवाद के जनक कहे जाते हैं.नक्सल जानकार बताते है की पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी क्षेत्र से जुड़े चारु मजूमदार ने 1960 के दशक में सशस्त्र किसान आंदोलन की शुरुवात की थी.1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी में हुए किसान विद्रोह को चारु मजमुदार ने ही लीड किया था.
बताया जाता है की जुलाई 1972 में उनकी गिरफ्तारी के कुछ दिनों बाद पुलिस हिरासत में मृत्यु हो गई थी.वही कानू सन्याल भी नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे. सन्याल ने चारु मजूमदार और अन्य साथियों के साथ मिलकर 1967 के किसान विद्रोह का नेतृत्व किया, जिसने देश में नक्सल आंदोलन की शुरुआत की, चारु मजूमदार और कानू सान्याल दोनों को नक्सलबाड़ी आंदोलन के संस्थापक नेताओं में गिना जाता है.
क्यों जारी किया गया अलर्ट
हाल के वर्षों में झारखंड सहित अन्य राज्यो में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई से माओवादी संगठन पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है. फिर भी चारू फोर्टनाइट के दौरान किसी भी संभावित गतिविधि को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था में किसी तरह की ढिलाई नहीं बरती जा रही है, ऐसे में 11 अगस्त तक माओवादी प्रभाव और पूर्व में प्रभाव में रहे इलाकों में व्यापक तलाशी अभियान, सघन वाहन जांच और खुफिया निगरानी के निर्देश दिए गए है.
जारी सुरक्षा इनपुट में आशंका जताई गई है कि कमजोर पड़ चुका भाकपा (माओवादी) इस अवधि का इस्तेमाल अपने संगठन को दोबारा मजबूत करने, कैडरों का मनोबल बढ़ाने और प्रभाव वाले इलाकों में अपनी सक्रियता बढ़ाने की कोशिश कर सकता है. इसी संभावना को देखते हुए नक्सल प्रभावित जिलों में विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं.
लेकिन सवाल ये है कि जब माओवाद के खत्म होने का डंका बज चुका है, झारखंड के नक्सलियों के भागने, की बात कही जा रही है, महज गिनती के नक्सलियों के होने का दावा किया जा रहा है, तो यह भय किस बात की. भला जान बचाते भागते फिर रहे नक्सली इस वक्त संगठन विस्तार या किसी सांस्कृतिक समारोह की शायद ही सोचें.
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