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    Home»धर्म/ज्योतिष»पत्नी धर्म की सीख देता है वट सावित्री व्रत :
    धर्म/ज्योतिष

    पत्नी धर्म की सीख देता है वट सावित्री व्रत :

    Team JoharBy Team JoharJune 10, 2021No Comments5 Mins Read0
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    सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य, उन्नति और संतान प्राप्ति के लिये यह व्रत रखती हैं। वट सावित्री व्रत हर परिस्थिति में अपने जीवनसाथी का साथ देने का संदेश देता है। इस वर्ष 10 जून गुरुवार अमावस्या को वट सावित्री व्रत मनाया जाएगा। इस अमावस्या कि वट सावित्री व्रत के दिन वृषभ राशि में सूर्य, चंद्रमा, बुध और राहु विराजमान रहेंगे। प्रसिद्ध ज्योतिष आचार्य प्रणव मिश्रा ने बताया कि शुक्र को सौभाग्य व वैवाहिक जीवन का कारक माना जाता है।

    साथ ही वृषभ राशि में चतुर्ग्रही योग बनना बेहद खाचार ग्रहों के एक राशि में होने पर चतुर्ग्रही योग बनाना शुभ माना गया है। इस योग से वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है और कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस वर्ष यह व्रत 10 जून दिन गुरुवार को रोहिणी नक्षत्र और धृति योग में पड़ रहा है, जो ज्योतिषीय गणना के अनुसार उत्तम योग है। ज्येष्ठ अमावस्या तिथि का प्रारंभ 09 जून दिन बुधवार को दोपहर 01 बजकर 59 मिनट पर हो रहा है, जो 10 जून को सायं 04 बजकर 22 मिनट तक रहेगी।।

    पूजा विधि :
    वट सावित्रि व्रत में वट वृक्ष के साथ-साथ सत्यवान-सावित्रि और यमराज की पूजा की जाती है। माना जाता है कि वटवृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव वास करते हैं। वट सावित्री व्रत के दिन सुहागिन स्त्रियों को प्रातःकाल उठकर स्नान करना चाहिये। तत्पश्चात सत्यवान और सावित्री की पूजा करे और वट वृक्ष को जल दे वट-वृक्ष की पूजा हेतु जल, फूल, रोली-मौली, कच्चा सूत, भीगा चना, गुड़ इत्यादि चढ़ाएं और जलाभिषेक करें। निम्न श्लोक से सावित्री को अर्घ्य दें –

    अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
    पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

    इसके बाद निम्न श्लोक से वटवृक्ष की प्रार्थना करें। यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले।
    तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा॥ इसके बाद वटवृक्ष के तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार या यथा शक्ति 5,11,21,51, या 108 बार परिक्रमा करें। वट वृक्ष के पते को बाल में लगा कर सावित्री सत्यवान की कथा सुनें। फिर बाँस के पंखे से सत्यवान-सावित्री को हवा करें।

    भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, नकद रुपए रखकर सासुजी के चरण-स्पर्श करें। वट तथा सावित्री की पूजा के पश्चात सौभाग्य पिटारी ,वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर ब्राम्हण को दान करें। घर में आकर पूजा वाले पंखें से अपने पति को हवा करें तथा उनका आशीर्वाद लें।

    वट सावित्री व्रत कथा : एक समय की बात है कि मद्रदेश में अश्वपति नाम के धर्मात्मा राजा का राज था। उनकी कोई भी संतान नहीं थी। राजा ने संतान हेतु यज्ञ करवाया। कुछ समय बाद उन्हें एक कन्या की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने सावित्री रखा। विवाह योग्य होने पर सावित्री के लिए द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पतिरूप में वरण किया।

    उसके माता-पिता की आंखो की रोशनी चली गई थी। सत्यवान जंगल से लकड़ियां काटकर लाता और उन्हें बेचकर जैसे-तैसे अपना गुजारा कर रहा था। जब सावित्रि और सत्यवान के विवाह की बात चली तो नारद मुनि ने सावित्रि के पिता राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के एक वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु हो जाएगी।

    हालांकि राजा अश्वपति सत्यवान की गरीबी को देखकर पहले ही चिंतित थे और सावित्रि को समझाने की कोशिश में लगे थे। नारद की बात ने उन्हें और चिंता में डाल दिया लेकिन सावित्रि ने एक न सुनी और अपने निर्णय पर अडिग रही। अंततः सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया। सावित्री सास-ससुर और पति की सेवा में लगी रही।

    नारद मुनि ने सत्यवान की मृत्यु का जो दिन बताया था, उसी दिन सावित्री भी सत्यवान के साथ वन को चली गई। वन में सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जैसे ही पेड़ पर चढ़ने लगा, उसके सिर में असहनीय पीड़ा होने लगी और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। कुछ देर बाद उनके समक्ष अनेक दूतों के साथ स्वयं यमराज खड़े हुए थे।

    जब यमराज सत्यवान के जीवात्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे, पतिव्रता सावित्री भी उनके पीछे चलने लगी। आगे जाकर यमराज ने सावित्री से कहा, ‘हे पतिव्रता नारी! जहां तक मनुष्य साथ दे सकता है, तुमने अपने पति का साथ दे दिया। अब तुम लौट जाओ’ इस पर सावित्री ने कहा, ‘जहां तक मेरे पति जाएंगे, वहां तक मुझे जाना चाहिए।

    यही सनातन सत्य है’ यमराज सावित्री की वाणी सुनकर प्रसन्न हुए और उसे वर मांगने को कहा। सावित्री ने कहा, ‘मेरे सास-ससुर अंधे हैं, उन्हें नेत्र-ज्योति दें’ यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे लौट जाने को कहा और आगे बढ़ने लगे किंतु सावित्री यम के पीछे ही चलती रही यमराज ने प्रसन्न होकर पुन: वर मांगने को कहा।

    सावित्री ने वर मांगा, ‘मेरे ससुर का खोया हुआ राज्य उन्हें वापस मिल जाए’ यमराज ने ‘तथास्तु’ कहकर पुनः उसे लौट जाने को कहा, परंतु सावित्री अपनी बात पर अटल रही और वापस नहीं गयी। सावित्री की पति भक्ति देखकर यमराज पिघल गए और उन्होंने सावित्री से एक और वर मांगने के लिए कहा तब सावित्री ने वर मांगा, ‘मैं सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनना चाहती हूं।

    कृपा कर आप मुझे यह वरदान दें’ सावित्री की पति-भक्ति से प्रसन्न हो इस अंतिम वरदान को देते हुए यमराज ने सत्यवान की जीवात्मा को पाश से मुक्त कर दिया और अदृश्य हो गए। सावित्री जब उसी वट वृक्ष के पास आई तो उसने पाया कि वट वृक्ष के नीचे पड़े सत्यवान के मृत शरीर में जीव का संचार हो रहा है। कुछ देर में सत्यवान उठकर बैठ गया। उधर सत्यवान के माता-पिता की आंखें भी ठीक हो गईं और उनका खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया।

    ranchi
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