मुस्कान चौधरी
हिंदी सिनेमा में जब भी रौबदार शख्सियत, दमदार आवाज और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने वाले सुपरस्टार्स की बात होगी, विनोद खन्ना का नाम सबसे अलग नजर आएगा. आज 6 अक्टूबर को उनकी जयंती है. विनोद खन्ना सिर्फ एक कामयाब अभिनेता नहीं थे, बल्कि 70 और 80 के दशक में वे ऐसे सितारे थे, जिनके स्टारडम की चमक अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता के सामने भी फीकी नहीं पड़ती थी.
लेकिन पर्दे पर खलनायक से नायक और फिर सुपरस्टार बनने तक का उनका सफर जितना शानदार था, उतना ही उतार-चढ़ाव से भरा भी. शोहरत के शिखर पर पहुंचने के बाद उन्होंने अचानक फिल्मों से दूरी बना ली, आध्यात्मिक राह चुनी और ओशो के आश्रम तक पहुंच गए. फिर कुछ साल बाद उसी चमकती फिल्मी दुनिया में दोबारा लौटे और राजनीति के मैदान में भी अपनी पहचान बनाई.
लेकिन विनोद खन्ना की कहानी सिर्फ फिल्मों की कहानी नहीं है. यह उस शख्स की कहानी है जिसने शोहरत की ऊंचाई देखी, फिर उसी शोहरत को छोड़कर आध्यात्मिकता की राह पकड़ ली. जिसने ओशो के आश्रम में माली तक का काम किया और करीब पांच साल बाद फिर उसी फिल्मी दुनिया में लौट आया, जिसे अपने करियर के शिखर पर छोड़ गया था और इसके बाद भी सफर रुका नहीं. वह राजनीति में गया, सांसद बना और केंद्र सरकार में मंत्री भी रहा.
विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर में एक पंजाबी हिंदू परिवार में हुआ था. उनके पिता किशनचंद खन्ना का कपड़े, रंग और रसायनों का कारोबार था. लेकिन जन्म के कुछ ही समय बाद देश का बंटवारा हुआ और परिवार को पेशावर छोड़कर मुंबई आना पड़ा. पिता का सपना था कि उनका बेटा पढ़-लिखकर उनका बिजनेस संभालेगा. विनोद खन्ना ने मुंबई के सिडेनहैम कॉलेज से कॉमर्स की पढ़ाई पूरी की, लेकिन कॉलेज के दिनों से ही उनके सिर पर थिएटर और सिनेमा का जुनून सवार हो चुका था. जब विनोद खन्ना ने घर में ऐलान किया कि वे फिल्मों में बतौर एक्टर अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं, तो घर में भूचाल आ गया.

उन्होंने ‘सोलहवां साल’ और ‘मुगल-ए-आजम’ जैसी फिल्में देखीं और फिल्मों की दुनिया उन्हें अपनी तरफ खींचने लगी. हालांकि उनका पहला प्यार क्रिकेट था. उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि वह क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन जब लगा कि विश्वनाथ या किसी बड़े टेस्ट खिलाड़ी के स्तर तक पहुंचना मुश्किल है, तो फिल्मों की तरफ मुड़ गए. शायद यही फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ था.
शुरुआत हीरो से नहीं, खलनायक से हुई
1968 में विनोद खन्ना ने फिल्म ‘मन का मीत’ से बॉलीवुड में कदम रखा. शुरुआत में उन्हें सहायक और खलनायक की भूमिकाएं मिलीं. लेकिन उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा था, जिसे कैमरा नजरअंदाज नहीं कर सकता था. लंबा कद, दमदार आवाज, आकर्षक चेहरा और स्क्रीन पर अलग तरह की मौजूदगी.
1970 में ‘सच्चा झूठा’, ‘आन मिलो सजना’ और ‘पूरब और पश्चिम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें पहचान दिलाई. फिर आई 1971 की ‘मेरे अपने’. यहां से विनोद खन्ना सिर्फ एक सहायक अभिनेता नहीं रहे. उन्होंने एक गुस्सैल युवक का किरदार निभाया और दर्शकों ने उन्हें गंभीरता से लेना शुरू कर दिया. उसी साल ‘मेरा गांव मेरा देश’ में उन्होंने डाकू का किरदार निभाया. दिलचस्प बात यह थी कि वह खलनायक थे, लेकिन दर्शकों की नजर में उनका स्टारडम किसी हीरो से कम नहीं था.
जब खलनायक हीरो पर भारी पड़ने लगा
70 का दशक हिंदी सिनेमा के लिए बदलाव का दौर था. रोमांस की जगह एक्शन तेजी से लोकप्रिय हो रहा था. और इसी दौर में विनोद खन्ना एक्शन स्टार के तौर पर उभरे. ‘हेरा फेरी’, ‘खून पसीना’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘परवरिश’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘कुर्बानी’ जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी.
1977 उनके करियर के सबसे शानदार वर्षों में रहा. एक तरफ ‘खून पसीना’, दूसरी तरफ ‘अमर अकबर एंथनी’. फिर ‘परवरिश’ और ‘इनकार’ जैसी फिल्में. विनोद खन्ना अब सिर्फ बड़े स्टार नहीं थे. वह बॉक्स ऑफिस के भरोसेमंद नाम बन चुके थे और सबसे बड़ी बात, वह अमिताभ बच्चन के साथ स्क्रीन शेयर करते थे, लेकिन उनकी पहचान सिर्फ ‘अमिताभ के साथ काम करने वाले अभिनेता’ की नहीं बनी. दोनों की जोड़ी दर्शकों को खूब पसंद आती थी. निर्देशक मनमोहन देसाई ने भी माना था कि उनकी फिल्मों में विनोद खन्ना अमिताभ बच्चन के बराबर की भूमिका में नजर आते थे.

1980 में आई ‘कुर्बानी’ ने विनोद खन्ना के स्टारडम को और मजबूत किया. फिल्म में फिरोज खान और जीनत अमान भी थे. ‘आप जैसा कोई’ और ‘लैला ओ लैला’ जैसे गानों ने फिल्म को जबरदस्त लोकप्रियता दी. विनोद खन्ना अपने करियर के उस दौर में थे, जब वह इंडस्ट्री के सबसे ज्यादा फीस लेने वाले अभिनेताओं में शामिल थे. उनके पास पैसा था. शोहरत थी. बड़े बैनर थे. सफल फिल्में थीं. लेकिन इसी मुकाम पर उन्होंने ऐसा फैसला लिया, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी.
जब सुपरस्टार ने सब कुछ छोड़ दिया
सन 1982 में विनोद खन्ना ने अपने करियर के चरम पर फिल्मों से ब्रेक ले लिया. वजह थी आध्यात्मिकता. वह ओशो रजनीश के शिष्य बन चुके थे. उन्होंने अमेरिका के ओरेगन में बने ओशो के कम्यून रजनीशपुरम का रुख किया. यह सिर्फ छुट्टी या छोटा ब्रेक नहीं था. वह करीब पांच साल तक वहां रहे. जिस इंसान के आसपास मुंबई में निर्माता, निर्देशक, सितारे और कैमरे रहते थे, वह ओशो के आश्रम में माली का काम कर रहा था. एक सुपरस्टार ने ग्लैमर की दुनिया से खुद को लगभग काट लिया. उस वक्त यह फैसला जितना चौंकाने वाला था, उतना ही विवादित भी. लेकिन विनोद खन्ना के लिए यह उनके जीवन का बेहद निजी और आध्यात्मिक दौर था.
करीब पांच साल बाद विनोद खन्ना वापस लौटे. 1987 में ‘इंसाफ’ से उनकी वापसी हुई. उनका स्टारडम पहले जैसा नहीं था, लेकिन उनकी स्क्रीन प्रेजेंस अब भी कायम थी. 1989 में ‘सूर्या’ और फिर यश चोपड़ा की ‘चांदनी’ आई. श्रीदेवी और ऋषि कपूर के साथ बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया. विनोद खन्ना ने साबित कर दिया कि कुछ साल पर्दे से दूर रहने के बाद भी उनका आकर्षण खत्म नहीं हुआ था. लेकिन अब वह पहले वाले युवा एक्शन हीरो नहीं थे. समय बदल चुका था. और विनोद खन्ना ने भी खुद को बदला.
हीरो से पिता तक… लेकिन स्टारडम कायम
90 के दशक में उनकी मुख्य अभिनेता वाली लोकप्रियता कम होने लगी. इसके बाद उन्होंने सहायक भूमिकाएं करनी शुरू कीं. लेकिन यहां भी वह भीड़ में खोए नहीं. ‘वांटेड’, ‘दबंग’, ‘दबंग 2’ और ‘दिलवाले’ जैसी फिल्मों में उन्होंने पिता और वरिष्ठ किरदार निभाए.
नई पीढ़ी के सलमान खान के साथ स्क्रीन पर नजर आए तो दर्शकों ने उन्हें फिर उसी सम्मान के साथ देखा. यानी जिस अभिनेता ने कभी खुद एक्शन हीरो के तौर पर धूम मचाई थी, वही बाद में नए दौर के सुपरस्टार के पिता के किरदार में भी उतना ही सहज नजर आया.
फिल्मों के बाद राजनीति का सफर

विनोद खन्ना की जिंदगी का अगला बड़ा अध्याय राजनीति था. 1997 में वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए. 1998 में पंजाब की गुरदासपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीता. इसके बाद वह लगातार राजनीति में सक्रिय रहे. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उन्हें केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री बनाया गया. इसके बाद वह विदेश राज्य मंत्री भी रहे. 1999 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 2018 में मरणोपरांत दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 2009 में चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी. 2014 में वह फिर गुरदासपुर से लोकसभा पहुंचे. यानी फिल्मी पर्दे से संसद तक का उनका सफर भी उतना ही दिलचस्प रहा, जितना फिल्मों का.
विनोद खन्ना की निजी जिंदगी भी हमेशा चर्चा में रही. उन्होंने 1971 में गीतांजलि तलियार से शादी की. उनके दो बेटे राहुल और अक्षय खन्ना हुए, जिन्होंने बाद में फिल्मों में अपना करियर बनाया. 1985 में दोनों का तलाक हुआ. 1990 में उन्होंने कविता दफ्तरी से शादी की. इस शादी से उनके एक बेटा और एक बेटी हुए. लेकिन उनकी जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव शायद आध्यात्मिकता का था.

उन्होंने कॉलेज के दिनों में परमहंस योगानंद की किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ अ योगी’ पढ़ी थी. इसके बाद आध्यात्मिकता में उनकी रुचि बढ़ती गई. फिर ओशो से मुलाकात ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी.
लंबे समय तक कैंसर से लड़ी जंग
विनोद खन्ना लंबे समय तक ब्लैडर कैंसर से जूझते रहे. उन्होंने अपनी बीमारी को परिवार से छिपाया, खासकर इसलिए कि उनकी बेटी की परीक्षाएं चल रही थीं. छह साल तक जर्मनी में इलाज और सर्जरी के बावजूद वह इस बीमारी से उबर न सके. 27 अप्रैल 2017 को 70 साल की उम्र में मुंबई के एचएन रिलायंस अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली.
अमिताभ बच्चन ने उन्हें याद करते हुए कहा था कि उनके जैसा चलने वाला और भीड़ भरे कमरे में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाला कोई दूसरा नहीं था. यह सिर्फ एक सह-कलाकार की तारीफ नहीं थी. यह उस दौर के एक ऐसे अभिनेता की पहचान थी, जिसकी मौजूदगी को नजरअंदाज करना मुश्किल था.
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