मुस्कान चौधरी
आज अगर देश की लाखों बेटियां IAS-IPS बनने का सपना देख रही हैं और उसे पूरा भी कर रही हैं, तो इसकी नींव आज से 78 साल पहले, 17 जुलाई 1948 को रखी गई थी. इसी दिन स्वतंत्र भारत ने महिलाओं को भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) समेत अन्य सिविल सेवाओं में शामिल होने का अधिकार दिया. यह सिर्फ एक सरकारी फैसला नहीं था, बल्कि भारतीय महिलाओं को बराबरी का अवसर देने और उन्हें देश की प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बनाने की दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम था.
आजादी के शुरुआती दौर में प्रशासनिक सेवाएं लगभग पूरी तरह पुरुषों के कब्जे में थीं. महिलाओं के लिए इन सेवाओं में प्रवेश आसान नहीं था. 17 जुलाई 1948 के फैसले ने यह बाधा तोड़ी और महिलाओं के लिए सिविल सेवाओं के दरवाजे खोल दिए. इसके बाद वे संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा देकर IAS, IPS और अन्य केंद्रीय सेवाओं में शामिल होने की पात्र बनीं.
अन्ना राजम मल्होत्रा ने रचा इतिहास
इस फैसले के बाद 1951 में अन्ना राजम मल्होत्रा (तत्कालीन अन्ना राजम जॉर्ज) भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल होने वाली देश की पहली महिला बनीं. हालांकि उनका सफर आसान नहीं था. इंटरव्यू के दौरान उन्हें IAS की जगह दूसरी सेवाएं चुनने की सलाह दी गई. इतना ही नहीं, उनके नियुक्ति पत्र में यह शर्त भी थी कि शादी करने पर उनकी नौकरी समाप्त हो सकती है. बाद में यह नियम बदला गया और वह लंबे समय तक प्रशासनिक सेवा में रहीं.
किरण बेदी बनीं पहली महिला IPS
करीब दो दशक बाद 1972 में किरण बेदी देश की पहली महिला IPS अधिकारी बनीं. उन्होंने पुलिस सेवा में महिलाओं की भागीदारी का नया अध्याय शुरू किया. बाद में उन्होंने दिल्ली पुलिस, तिहाड़ जेल सुधार और कई प्रशासनिक जिम्मेदारियों के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई.
ये हैं सबसे फेमस महिला आईएस
1. राजबाला वर्मा (IAS)
झारखंड कैडर की 1983 बैच की IAS अधिकारी राजबाला वर्मा ने वर्ष 2016 से 2018 तक राज्य की मुख्य सचिव के रूप में कार्य किया. उनके कार्यकाल में झारखंड में ई-गवर्नेंस, सड़क अवसंरचना और सरकारी योजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन पर विशेष जोर दिया गया. उन्होंने प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाने और विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में कई अहम फैसले लिए. केंद्र और राज्य सरकार के साथ बेहतर तालमेल बनाकर विकास परियोजनाओं को गति देने के कारण उन्हें एक कुशल और प्रभावी प्रशासक के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली.
2. निधि खरे (IAS)
3.दुर्गा शक्ति नागपाल (IAS)
उत्तर प्रदेश कैडर की IAS अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को 2013 में गौतमबुद्ध नगर में अवैध बालू खनन के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय पहचान मिली. उन्होंने खनन माफिया के खिलाफ कई छापेमारी कर करोड़ों रुपये के अवैध कारोबार पर रोक लगाई. कार्रवाई के बाद उनका निलंबन भी काफी चर्चा में रहा, जिसके बाद पूरे देश में ईमानदार प्रशासनिक अधिकारियों की सुरक्षा और स्वतंत्रता पर बहस छिड़ गई. आज भी उन्हें बेखौफ और ईमानदार प्रशासन की मिसाल माना जाता है.
4. स्मिता सभरवाल (IAS)
तेलंगाना कैडर की वरिष्ठ IAS अधिकारी स्मिता सभरवाल को “People’s Officer” के नाम से जाना जाता है. उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय में रहते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य और नागरिक सेवाओं से जुड़े कई सुधारात्मक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया. आम लोगों से सीधे संवाद और पारदर्शी प्रशासन की वजह से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली. सोशल मीडिया के जरिए जनता से जुड़ने की उनकी कार्यशैली भी काफी चर्चित रही.
5. आरती डोगरा (IAS)
राजस्थान कैडर की IAS अधिकारी आरती डोगरा ने स्वच्छता और सामाजिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया. उन्होंने बूंदी जिले में ‘बैंको बिकानो’ (Banko Bikano) अभियान चलाकर खुले में शौच मुक्त अभियान को नई पहचान दिलाई. दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निभाया और महिलाओं व दिव्यांगों के सशक्तिकरण के लिए कई पहल कीं. उनके काम की देशभर में सराहना हुई.
6. बी. चंद्रकला (IAS)
उत्तर प्रदेश कैडर की IAS अधिकारी बी. चंद्रकला बुलंदशहर की जिलाधिकारी रहते हुए अपनी सख्त कार्यशैली के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं. सरकारी अधिकारियों और ठेकेदारों को मौके पर फटकार लगाने वाले उनके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए. उन्होंने सड़क निर्माण, सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों में लापरवाही पर कड़ी कार्रवाई की. उनकी कार्यशैली ने जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर नई बहस शुरू की.
7. रंजना चोपड़ा (IAS)
पंजाब कैडर की वरिष्ठ IAS अधिकारी रंजना चोपड़ा ने शिक्षा, पर्यटन और प्रशासनिक सुधारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया. पंजाब सरकार में कई अहम विभागों की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने प्रशासनिक दक्षता और सुशासन पर जोर दिया. नीति निर्माण और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में उनकी भूमिका को व्यापक सराहना मिली. उनके लंबे प्रशासनिक अनुभव और नेतृत्व क्षमता ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई.
बदलाव आया, लेकिन बराबरी अभी दूर
महिलाओं के लिए सिविल सेवाओं का रास्ता खुलने के बाद उनकी भागीदारी बढ़ी जरूर, लेकिन अभी भी संतुलित प्रतिनिधित्व का लक्ष्य दूर है. अशोका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डेटा (TCPD) के अनुसार, 1951 से 2020 के बीच IAS में भर्ती हुए 11,569 अधिकारियों में केवल 1,527 महिलाएं थीं.
वहीं, 1970 में IAS में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 9 प्रतिशत थी, जो 2020 तक बढ़कर करीब 31 प्रतिशत हो गई. राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) के अनुसार, वर्तमान में देश के सेवारत IAS अधिकारियों में लगभग 21 प्रतिशत महिलाएं हैं.
महिलाओं की भागीदारी क्यों है जरूरी?
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, लोक प्रशासन में महिलाओं की अधिक भागीदारी से सरकारी सेवाएं अधिक संवेदनशील, जवाबदेह और लोगों की जरूरतों के अनुरूप बनती हैं. इससे शासन व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ती है और लोगों का सरकारी संस्थानों पर भरोसा भी मजबूत होता है.

