आज सोनम वांगचुक के अनशन का 19वां दिन है. उनकी सेहत को लेकर जो खबरें सामने आ रही हैं, या खासकर सोशल मीडिया पर जो तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे हैं, वे बेहद चिंता पैदा करने वाले हैं. यह कहना बेहद दुखद लगता है कि सरकार ने मानो सोनम वांगचुक और उनके माध्यम से इस देश की एक महत्वपूर्ण जनआवाज को कुर्बान करने का फैसला कर लिया है. जिस सरकार की आंखों के सामने देश की संपत्ति लूटी जाती रहे और वह चुप बैठी रहे, उसके लिए नागरिक आंदोलनों की आखिर क्या अहमियत रह जाएगी?
जो संस्थाएं निष्पक्ष होकर काम करने के लिए बनी थीं, वे आज सरकार के नियंत्रण में हैं. चुनाव भी उसी तरह कराए जा रहे हैं, जैसा सत्ता चाहती है. इस पर बेहिसाब पैसा खर्च हो रहा है, लेकिन अधिकांश मीडिया यह पूछने की जहमत नहीं उठाता कि यह पैसा कहां से आ रहा है. इसके उलट, यही मीडिया अपने अदृश्य आकाओं के इशारे पर कभी विपक्ष तो कभी सत्ता पक्ष के ही लोगों को बदनाम करने में जुटा रहता है.
और जो कुछ मीडिया संस्थान सच बोलने की कोशिश करते हैं, उनके और उनके मालिकों के सिर पर हमेशा कार्रवाई की तलवार लटकती रहती है. ऐसे माहौल में किसी जायज मांग को लेकर चल रहे आंदोलन को कुचल देना और आंदोलनकारी को शारीरिक व मानसिक यातना देना सरकार के लिए आसान हो जाता है.
एक समय था जब भारतीय जनता पार्टी सोनम वांगचुक का बहुत सम्मान करती थी. हालांकि भाजपा की एक खासियत यह भी है कि कोई व्यक्ति तब तक ही उसका प्रिय रहता है, जब तक वह उसके राजनीतिक हितों के अनुकूल हो. वर्ष 2018 में भाजपा ने सोनम वांगचुक को री-इन्वेस्ट सम्मेलन में बुलाया था. उनसे वैकल्पिक ऊर्जा जैसे विषयों पर चर्चा की गई और उनकी खूब सराहना भी हुई.
उस समय सरकार दुनिया को यह दिखाना चाहती थी कि वह वैकल्पिक ऊर्जा को कितना महत्व देती है, इसलिए वांगचुक को मंच दिया गया. बाद में जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, तब वांगचुक ने भी सरकार के फैसले की सराहना की. लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि सरकार की मंशा कुछ और ही है.
उन्होंने लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने, वहां दो लोकसभा सीटें बनाने और स्थानीय लोगों के जमीन संबंधी अधिकारों की रक्षा जैसी मांगें उठाईं. इन मांगों को लेकर उन्होंने कई बार अनशन और आंदोलन किए, लेकिन सरकार ने केवल आश्वासन दिए, कोई ठोस कदम नहीं उठाया. क्योंकि सरकार जो दिखाती है, उसकी नीयत अक्सर उससे अलग होती है.
आज वांगचुक की मांग साफ है कि नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच हो, इसके लिए जिम्मेदार मंत्री को पद से हटाया जाए और परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए. इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है. भाजपा के शासनकाल में लगभग हर बड़ी प्रतियोगी परीक्षा विवादों में रही है.
मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले से लेकर नीट पेपर लीक और हाल के शिक्षक भर्ती परीक्षा के पेपर लीक तक, ऐसे कई मामले सामने आए हैं. सवाल यह है कि यह सब बार-बार क्यों हुआ और हर बार सरकार का रवैया इतना बेपरवाह क्यों दिखाई दिया? इसका सीधा जवाब है कि सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण और पूरे तंत्र पर मजबूत पकड़.
चुनावों में अलग-अलग तरीकों से मिली सफलता को भाजपा अब जनता की चुप्पी और समर्थन का प्रमाण मानने लगी है. उसे लगता है कि अब कोई भी उससे सवाल पूछने की हिम्मत न करे. यही नया अहंकार आज भाजपा की कार्यशैली में दिखाई देता है. और जब मैं भाजपा कहता हूं, तो उसमें उसके सहयोगी दल भी शामिल हैं, क्योंकि उनकी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान लगभग समाप्त हो चुकी है और उनका संचालन सीधे दिल्ली से होता है.
मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह करता हूं कि कृपया इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान दें. नीट परीक्षा और उससे जुड़ा पूरा विवाद कोई छोटा मामला नहीं है. इस परीक्षा में हुई अनियमितताओं ने लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित किया है.
यह पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं. और यह किसी राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक मुद्दा है. लाखों छात्र, जिन्होंने नीट की परीक्षा दी और उनके माता-पिता गहरे मानसिक तनाव और पीड़ा से गुजरे हैं.
इस पीड़ा में भाजपा के समर्थक, पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी शामिल हैं. इसलिए इस आंदोलन को राजनीतिक चश्मे से देखना, जैसा कि केंद्र सरकार कर रही है, दरअसल उसकी संकीर्ण सोच का परिचायक है.

