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    Home»जोहार ब्रेकिंग»राज्य बनने के बाद स्वास्थ्य बजट 44 गुणा बढ़ा, सफर धक्के वाले एंबुलेंस तक ही, स्वास्थ्य व्यवस्था की 360 डिग्री पड़ताल करती रिपोर्ट
    जोहार ब्रेकिंग

    राज्य बनने के बाद स्वास्थ्य बजट 44 गुणा बढ़ा, सफर धक्के वाले एंबुलेंस तक ही, स्वास्थ्य व्यवस्था की 360 डिग्री पड़ताल करती रिपोर्ट

    Joharlive NetworkBy Joharlive NetworkJuly 17, 2026Updated:July 17, 2026No Comments9 Mins Read7
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    झारखंड स्वास्थ्य
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    मुस्कान चौधरी

    कभी टॉर्च में ऑपरेशन, कभी खाट एंबुलेंस तो कभी धक्का एंबुलेंस. राज्य बनने के बाद से स्वास्थ्य बजट 44 गुना बढ़ गया, लेकिन नहीं बढ़ रहा, तो गरीब नागरिकों का झारखंड के स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा. बीते मंगलवार गुमला जिले में 15 साल की शिवानी कुमारी की तबीयत अचानक बिगड़ गई. उसे तेज सिरदर्द और लगातार उल्टियां हो रही थीं. परिजन उसे तत्काल चैनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे. बच्ची करीब तीन घंटे तक अस्पताल परिसर में अचेत अवस्था में पड़ी रही, लेकिन इस दौरान न तो कोई चिकित्सक समय पर उसे देखने पहुंचा और न ही उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्काल रेफर करने के लिए एंबुलेंस उपलब्ध कराई गई. और जब एंबुलेंस मिली भी, तो स्टार्ट नहीं हो सकी. उसे धक्का देना पड़ा. इन सब के बीच परिणाम ये हुआ कि बच्ची मर गई.

    हमने राज्य के स्वास्थ्य व्यवस्था की पड़ताल की. आखिर गरीब और आम लोग हर दिन इस स्थिति से क्यों गुजरते हैं. लगातार ऐसी घटनाओं के बाद भी स्वास्थ्य मंत्री राजनीतिक लप्फाजी के बजाय, इन्हें सुधारने पर ध्यान क्यों नहीं लगा रहे.

    आपातकालीन चिकित्सा सेवा की लाइफलाइन मानी जाने वाली 108 एम्बुलेंस सेवा नियमों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में 25 मिनट और ग्रामीण इलाकों में 40 मिनट के भीतर एम्बुलेंस पहुंचनी चाहिए. लेकिन तस्वीर देखिये.

    केस 1 : बात 17 सितंबर 2025 की है . पलामू के राजखाद गांव में एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुंची तो एक 20 वर्षीय गर्भवती महिला को बचाने के लिए परिवार ने जान जोखिम में डाल दी. परिजनों ने कई बार 108 एम्बुलेंस को फोन किया, लेकिन मदद नहीं मिली. आखिरकार गांव के लोगों ने महिला को लकड़ी की खाट पर बैठाकर उफनती धुरिया नदी कंधों पर उठाकर पार कराया. इसके बाद निजी वाहन से करीब 22 किलोमीटर दूर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया.

    केस 2 – 19 दिसंबर 2025 को चाईबासा जिले के नोवामुण्डी प्रखंड के बालजोड़ी गांव निवासी डिम्बा चातोम्बा अपने चार वर्षीय बेटे को इलाज के लिए दो दिन पहले सदर अस्पताल लेकर आए थे. बच्चे की तबीयत गंभीर थी और उसका इलाज अस्पताल में चल रहा था. लेकिन शुक्रवार (19 दिसंबर) को इलाज के दौरान बच्चे की मौत हो गई. मृत बच्चे के पिता डिम्बा चातोम्बा ने बताया कि बेटे की मौत के बाद उन्होंने अस्पताल प्रशासन से एंबुलेंस उपलब्ध कराने की गुहार लगाई. ताकि शव को गांव तक ले जाया जा सके. उन्होंने घंटों तक अस्पताल परिसर में एंबुलेंस का इंतजार किया और उसके बाद भी कोई मदद नहीं मिली. हार मानकर मजबूरी में मृत बच्चे के पिता डिम्बा चातोम्बा ने अपने चार वर्षीय बेटे के शव को एक झोले में रखा और चाईबासा सदर अस्पताल से नोवामुण्डी प्रखंड के बालजोड़ी गांव तक अकेले लेकर चले आए.

    केस 3 – 12 जून 2026 जामताड़ा जिले के गोपालपुर पंचायत के शहरबेड़ा गांव के मोनू टुडू की अचानक तबीयत बिगड़ गई. परिजनों ने तत्काल 108 एंबुलेंस सेवा से संपर्क किया, लेकिन कई बार फोन करने के बावजूद एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंची. मरीज की हालत लगातार गंभीर होती देख परिजनों और ग्रामीणों ने गांव में उपलब्ध ट्रैक्टर-ट्रॉली पर खटिया रखकर मोनू टुडू को जामताड़ा सदर अस्पताल पहुंचाया. हालांकि अस्पताल पहुंचने तक काफी देर हो चुकी थी. चिकित्सकों ने उपचार शुरू किया, लेकिन इलाज के दौरान ही उसकी मौत हो गई.

    केस 4 : 23 अगस्त 2025 को जमशेदपुर के मणिपाल टाटा मेडिकल कॉलेज (MTMC) में थर्ड ईयर के छात्र दिव्यांशु पांडेय ने सल्फास की गोलियां खा ली थीं। छात्रों का आरोप था कि कॉलेज परिसर में एम्बुलेंस खड़ी थी, लेकिन ड्राइवर मौजूद नहीं था। छात्रों के मुताबिक, एम्बुलेंस नहीं मिलने के कारण दिव्यांशु को काफी देर बाद निजी वाहन से अस्पताल ले जाया गया। इस दौरान करीब 40 मिनट की देरी हुई, जिससे उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। घटना के बाद छात्रों ने कॉलेज परिसर में प्रदर्शन कर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की.

    केस 5 : 14 दिसंबर 2025 को गुमला जिले के झलकापाट गांव की गर्भवती सुकरी देवी को प्रसव पीड़ा शुरू हुई। गांव तक एम्बुलेंस नहीं पहुंचने पर परिजन और ग्रामीण उन्हें खाट पर लादकर नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए। वहां से गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें सदर अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन समय पर इलाज नहीं मिल सका और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई।

    एंबुलेंस से डॉक्टर और बेड तक की कहानी

    मई 2025 में स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक में बताया गया कि 543 में से लगभग 450 एम्बुलेंस ही चल रही थीं, जबकि करीब 93 एम्बुलेंस खराब या बंद थीं. विभाग ने सभी जिलों को 15 दिन के भीतर इन्हें चालू करने का निर्देश दिया. अगस्त 2025 में झारखंड हाई कोर्ट में सरकार ने बताया था कि 510 एम्बुलेंस उपलब्ध हैं, जिनमें 430 कार्यरत हैं और 57 मरम्मत में हैं. साथ ही 30 नई Advanced Life Support (ALS) एम्बुलेंस खरीदने की जानकारी भी दी गई.

    झारखंड सरकार द्वारा 108 एम्बुलेंस सेवा का संचालन व रखरखाव एक पीपीपी (PPP) मॉडल के तहत चुनिंदा निजी एजेंसियों (जैसे GVK EMRI) को सौंपा गया है. इसमें प्रति एम्बुलेंस के लिए कोई निश्चित या अलग से ईंधन (पेट्रोल/डीजल) राशि नहीं दी जाती है.

    इसके बजाय, टेंडर के नियमों के अनुसार प्रति वाहन मासिक संचालन लागत (प्रति माह करीब ₹1.05 लाख) तय की जाती है. इस बजट में एम्बुलेंस का ईंधन, वाहन की मरम्मत, ऑक्सीजन की आपूर्ति और कर्मचारियों का वेतन शामिल होता है.

    ये तो हो गई एंबुलेंस की स्थिति. अब आते हैं डॉक्टरों की स्थिति पर

    बीते 2 अगस्त 2024 को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल की ओर से लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया गया था कि झारखंड में 8,544 एलोपैथिक डॉक्टर (सरकारी और गैर सरकारी) हैं. जबकि साल 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य की आबादी करीब 3 करोड़ 30 लाख है. हालांकि इस वक्त अनुमानित आबादी 4 करोड़ से अधिक बताई जा रही है. इस लिहाज से देखें तो प्रति 4,682 व्यक्ति पर 1 डॉक्टर है. जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित प्रति 1000 व्यक्ति पर 1 डॉक्टर के मुकाबले काफी कम है.

    वहीं राज्य में कुल 2,280 मेडिकल ऑफिसर के पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 1,613 पद ही वर्तमान में भरे हुए हैं, 667 पद अब भी खाली हैं. जामताड़ा में 45.16 फीसदी, धनबाद में 42.95 और कोडरमा में 42.86 फीसदी पद खाली हैं. झारखंड में कुल 1,325 ग्रेड ‘ए’ नर्स पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 810 पद वर्तमान में भरे हुए हैं, 515 पद अब भी खाली हैं. जिसमें पूर्वी सिंहभूम में 82.83 फीसदी, रामगढ़ में 71.88 और पलामू में 68.24 फीसदी पद खाली हैं.

    डॉक्टर और नर्स का अनुपात 1:1.5 है और प्रति 10,000 आबादी पर केवल 3 सार्वजनिक स्वास्थ्यकर्मी हैं. जबकि इसके लिए प्रति दस हजार पर छह स्वास्थ्य कर्मियों का होना अनिवार्य है.

    राज्य में मेडिकल अफसरों की पदों की स्थिति
    राज्य में मेडिकल अफसरों की पदों की स्थिति

    2 करोड़ से अधिक सलाना कराते हैं इलाज

    डॉक्टरों की कमी को मरीजों की भीड़ से समझिये. झारखंड इकॉनोमिक सर्वे 2024-25 के मुताबिक राज्य के सरकारी अस्पतालों में इन पेशेंट, यानी जिन्होंने एडमिट होकर इलाज कराया उनकी संख्या जहां साल 2020-21 में 5,77,456 थी, वहीं साल 2023-24 में यह बढ़कर 19,87,099 हो गई. वहीं आउट पेशेंट यानी जो इलाज कराने आए और डॉक्टर से दिखाकर चले गए, उनकी संख्या साल 2020-21 में 1,00,33,361 थी, जो साल 2023-24 (सितंबर तक) में बढ़कर 2,04,82,460 हो गई. सरकार के मुताबिक ऐसा आयुष्मान कार्ड, बढ़ती स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से है.

    पेशेंट की स्थिति (झारखंड इकॉनोमिक सर्वे 2024-25)

    हाल ही में बगाइचा सामाजिक केंद्र की ओर से एक हेल्थ रिपोर्ट जारी की गई है. इसमें बताया गया है कि इन मरीजों के इलाज के लिए झारखंड में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन डॉसियर 2021 के अनुसार, उप-स्वास्थ्य केंद्र 3,848 हैं, जबकि आवश्यकता 6,848 की है. पीएचसी 291 हैं, जबकि आवश्यकता 1,091 की है. सीएचसी 17 हैं, जबकि आवश्यकता 272 की है.

    मरीजों की बढ़ती भीड़ और उनके लिए उपलब्ध बेड की स्थिति देखिये. झारखंड में सरकारी और निजी दोनों को मिलाकर कुल 4,835 स्वास्थ्य संस्थान हैं. इसके अतिरिक्त, झारखंड में सरकारी अस्पतालों में कुल 13,909 बिस्तर उपलब्ध हैं. रांची में सबसे अधिक 2,211 बिस्तर हैं, इसके बाद धनबाद (1,244) और बोकारो (876) हैं. पाकुड़ में सबसे कम मात्र 169 बिस्तर उपलब्ध हैं.

    इकॉनोमिक सर्वे 2024-25 के रिपोर्ट के मुताबिक साल 2022-23 में झारखंड में जननी सुरक्षा योजना के तहत संस्थागत प्रसव जहां 7,54,807 हुए. वहीं 2023-24 का आंकड़ा 5,66,993 पर ही रह गया. यानी महिलाएं अस्पताल के बजाय घरों में बच्चा पैदा कर रही है, जो कि कहीं से भी सुरक्षित नहीं है. क्योंकि अस्पतालों में न तो बेड हैं, न डॉक्टर है और न ही अन्य जरूरी सुविधाएं.

    इसी सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक पांच वर्ष से कम आयु के लगभग 40 फीसदी बच्चे बौनेपन से ग्रस्त हैं, 22.4 फीसदी दुबलेपन से पीड़ित हैं और 39.4 फीसदी कम वजन वाले हैं. साथ ही, 6 से 59 माह आयु वर्ग के लगभग 68 फीसदी बच्चे एनीमिया से ग्रस्त हैं.

    और ये हालात तब हैं, कि राज्य बनने के बाद पेश हुए पहले बजट में स्वास्थ्य मद में 169 करोड़ रुपए दिए गए थे. वहीं बीते बजट यानी वित्त वर्ष 2024-25 के लिए पारित आम बजट के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग का बजट लगभग 7,470 करोड़ रुपए हो गया. यानी यह 44 गुणा बढ़ चुका है. लेकिन झोले में शव, टॉर्च में ऑपरेशन और खाट पर मरीज की तस्वीर बदस्तूर जारी है.

    इन्हें ठीक करने के बजाय राज्य के स्वाथ्य मंत्री रील्स, गैर-जरूरी बयानों में उलझे रहते हैं. एक वक्त था जब स्वास्थ्य मंत्री रहे बन्ना गुप्ता से इरफान अंसारी कहते थे, “परेशानी है तो इस्तीफा दे दीजिए”… आज स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर खुद इरफान अंसारी आए दिन सवालों के घेरे में रहते हैं. मगर ध्यान दीजिये, इस बात पर जरूर ध्यान दीजिये. तथाकथित तौर पर झारखंड सरकार ने स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के लिए रांची के कांके में बनने वाले RIMS-2 प्रोजेक्ट के लिए 4,189 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है.

    Also Read : उल्टी होने पर किया रेफर, धक्के के बाद भी चालू नहीं हुआ एंबुलेंस, थम गई मासूम की सांसें

    झारखंड झारखंड अस्पताल झारखंड स्वास्थ्य डॉ इरफान अंसारी स्वास्थ्य
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