भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सारंडा की बदहाली को लेकर हेमंत सरकार पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि हाल ही में सिंहभूम दौरे के दौरान उन्हें सारंडा के सुदूर गांवों में रहने वाले लोगों से मिलने और उनकी समस्याओं को करीब से देखने का मौका मिला. उन्होंने कहा कि राजनीति में आने से पहले से ही उनका इस इलाके से गहरा जुड़ाव रहा है, इसलिए यहां की हालत हमेशा उन्हें परेशान करती रही है.
मरांडी ने कहा कि यह बेहद दुख की बात है कि सारंडा के जंगलों से निकलने वाले लौह अयस्क ने टाटा, बोकारो और दुर्गापुर जैसे बड़े औद्योगिक शहरों को खड़ा किया, लेकिन जिस इलाके से यह खनिज निकलता है, वहीं आज भी लोग सड़क, बिजली, पानी, स्कूल और अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं.
उन्होंने कहा कि जहां का खनिज बड़े-बड़े शहरों को 24 घंटे बिजली देता है, अच्छी सड़कें और अस्पताल बनाता है, वहां के लोगों के हिस्से में आज भी बदहाली ही आई है. जिन गांवों से खनिज निकलता है, वहां आज तक कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा.
मरांडी ने कहा कि उनका सारंडा से पुराना रिश्ता रहा है. विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री बनने से पहले भी वह कई बार इन जंगलों में घूम चुके हैं. वर्ष 1998-99 में पर्यावरण मंत्री रहते हुए भी उन्होंने इस इलाके का दौरा किया था. उन्होंने कहा कि इतने साल बाद दोबारा यहां आने पर उम्मीद थी कि हालात बदले होंगे, लेकिन अफसोस आज भी लोगों की जिंदगी पहले जैसी ही मुश्किलों में गुजर रही है.
DMFT के 3700 करोड़ रुपये का हिसाब मांगा
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) की व्यवस्था की थी, ताकि खदानों के आसपास रहने वाले लोगों को बेहतर सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी सुविधाएं मिल सकें.
उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 10 वर्षों में पश्चिमी सिंहभूम जिले को DMFT के तहत करीब 3700 करोड़ रुपये मिले, लेकिन यह पैसा विकास पर खर्च होने के बजाय बंदरबांट की भेंट चढ़ गया. यही वजह है कि खनन प्रभावित गांवों के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं.
खदानों की नीलामी में झारखंड सबसे पीछे
मरांडी ने कहा कि झारखंड देश की करीब 40 प्रतिशत खनिज संपदा का मालिक है, लेकिन हेमंत सरकार पिछले साढ़े छह साल में सिर्फ तीन खदानों की ही नीलामी करा सकी. जबकि इसी दौरान देशभर में 434 खनिज ब्लॉकों की नीलामी हुई. पड़ोसी ओडिशा में 45 और छत्तीसगढ़ में 49 खदानों की नीलामी की गई.
उन्होंने कहा कि खदानों की नीलामी में यह सुस्ती ही सारंडा जैसे इलाकों के विकास में सबसे बड़ी रुकावट बन गई है. स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा, लोग पलायन करने को मजबूर हैं और क्षेत्र आज भी बाल तस्करी जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है.
मरांडी ने कहा कि अगर खनिज संपदा से मिलने वाले पैसे का सही इस्तेमाल होता और DMFT की राशि ईमानदारी से खर्च की जाती, तो आज सारंडा की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती थी. उन्होंने राज्य सरकार से खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर गंभीरता से काम करने और जनता के पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित करने की मांग की.
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