एक समय था जब केरलम के इडुक्की जिले के मरायूर इलाके के आदिवासी किसान अपनी उपज बेचने के लिए बिचौलियों पर निर्भर थे. खेतों में उगाई काली मिर्च, कॉफी, इलायची और जंगल से जुटाया शहद उनकी मेहनत का नतीजा था, लेकिन उसका सबसे बड़ा फायदा व्यापारी उठा ले जाते थे. आज यही किसान अपने नाम से पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर बेच रहे हैं. ‘अंजुनाड’ नाम का यह ब्रांड सिर्फ एक पानी की बोतल नहीं, बल्कि आदिवासी किसानों के संघर्ष से सफलता तक के सफर की कहानी है.
इस ब्रांड को गिरिज्योति ट्राइबल फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी (FPC) ने लॉन्च किया है. करीब 750 आदिवासी किसान इस कंपनी के शेयरधारक हैं. यानी कंपनी के मालिक भी किसान हैं और मुनाफे के हकदार भी वही. इस पहल को नाबार्ड और हाईरेंज डेवलपमेंट सोसाइटी (HDS) का सहयोग मिला है.
बिचौलियों के जाल से निकलने की शुरुआत
मरायूर के आदिवासी परिवार वर्षों से खेती और जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर रहे हैं. काली मिर्च, कॉफी, इलायची, अदरक, शहद, लेमनग्रास और कई तरह के वन उत्पाद उनकी आजीविका का हिस्सा रहे. लेकिन बाजार तक उनकी सीधी पहुंच नहीं थी. व्यापारी गांवों में पहुंचकर बेहद कम दाम पर सामान खरीद लेते थे और बाद में उसी सामान को कई गुना कीमत पर बेचते थे.
इस चुनौती को देखते हुए वर्ष 2015 में नाबार्ड और हाईरेंज डेवलपमेंट सोसाइटी ने ट्राइबल डेवलपमेंट फंड (TDF) के तहत आदिवासी किसानों को संगठित करना शुरू किया. किसानों को आधुनिक खेती, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग की ट्रेनिंग दी गई. मकसद साफ था. किसान सिर्फ फसल न उगाएं, बल्कि अपने उत्पादों का मालिकाना हक भी अपने पास रखें.
22 टन अदरक से मिली पहली सफलता, फिर बन गई अपनी कंपनी
कई साल की तैयारी के बाद 2023 में गिरिज्योति ट्राइबल फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी की स्थापना हुई. करीब 750 आदिवासी किसान इसके शेयरधारक बने. कंपनी बनने के बाद पहला बड़ा काम किसानों की उपज को सामूहिक रूप से खरीदकर सीधे बाजार तक पहुंचाना था.
शुरुआत में कंपनी ने 22 टन अदरक किसानों से खरीदकर बाजार में बेची. इससे किसानों को पहले की तुलना में बेहतर कीमत मिली और उन्हें यह भरोसा हुआ कि अपनी कंपनी बनाकर भी सफल कारोबार किया जा सकता है.
इसके बाद कंपनी ने ‘अंजुनाड ट्राइबल प्रोडक्ट्स’ नाम से अपने उत्पाद बाजार में उतारने शुरू किए. आज कंपनी ऑर्गेनिक कॉफी, काली मिर्च, इलायची, शहद, लेमनग्रास ऑयल, हर्बल उत्पाद, झाड़ू और ऑर्गेनिक सब्जियां बेच रही है. मरायूर में कंपनी का अपना रिटेल स्टोर भी है, जहां ग्राहक सीधे आदिवासी किसानों के उत्पाद खरीद सकते हैं.
हाईरेंज डेवलपमेंट सोसाइटी के अनुसार, इस परियोजना से जुड़े परिवारों की औसत वार्षिक आय करीब 25 हजार रुपये से बढ़कर लगभग 4 लाख रुपये तक पहुंची है. हालांकि यह आंकड़ा पूरे ट्राइबल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट का है, केवल गिरिज्योति कंपनी का नहीं. फिर भी यह बताता है कि संगठित खेती और सीधे बाजार तक पहुंच ने आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है.
पानी के कारोबार में उतरे, आगे पूरे देश तक पहुंचने की तैयारी
कृषि और वन उत्पादों में पहचान बनाने के बाद कंपनी ने अब ‘अंजुनाड’ पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर लॉन्च किया है. यह सिर्फ एक नया प्रोडक्ट नहीं, बल्कि किसानों के कारोबार को अगले स्तर पर ले जाने की कोशिश है. अब किसान केवल कच्चा माल बेचने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि अपना ब्रांड बनाकर उपभोक्ताओं तक तैयार उत्पाद पहुंचा रहे हैं.
कंपनी का मॉडल भी यही है कि खेत से बाजार तक की पूरी श्रृंखला किसानों के हाथ में रहे. इससे बिचौलियों की भूमिका कम होती है और उत्पाद की कीमत का बड़ा हिस्सा किसानों तक पहुंचता है. यही वजह है कि आज मरायूर का यह मॉडल देश के दूसरे हिस्सों के लिए भी मिसाल बन रहा है. कई संस्थानों और विकास परियोजनाओं की टीमें यहां पहुंचकर इस मॉडल का अध्ययन कर चुकी हैं.
‘अंजुनाड’ की यह कहानी बताती है कि अगर किसानों को सही प्रशिक्षण, संगठन और बाजार तक सीधी पहुंच मिले तो वे सिर्फ अच्छी खेती ही नहीं, बल्कि मजबूत ब्रांड भी खड़े कर सकते हैं. कभी जिन किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था, आज वही अपने नाम से बाजार में पहचान बना रहे हैं.
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