वंदे मातरम् के पूरे गीत या इसके शुरुआती दो छंदों के गायन को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने इसे लेकर हो रही सियासत पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय गीत के गायन को राजनीतिक मुद्दा बनाना उचित नहीं है. सरकारों और राजनीतिक दलों को बेरोजगारी, युवाओं के भविष्य और बाढ़ जैसी गंभीर समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए.
मायावती ने कहा कि केंद्र हो या राज्य, सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक दल कई बार अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप पुराने फैसलों और नीतियों में बदलाव करते हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की राजनीति के जरिए कई बार जनता का ध्यान वास्तविक और जरूरी मुद्दों से हट जाता है.
बेरोजगार युवाओं और नई पीढ़ी के मुद्दे प्राथमिकता में हों
बसपा प्रमुख ने कहा कि देश में इस समय कई ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सरकारों को गंभीरता से काम करने की जरूरत है. खासकर बेरोजगार युवाओं, छात्र-छात्राओं और नई पीढ़ी के भविष्य से जुड़े सवालों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.
उन्होंने ‘जेन-जी’ और ‘जेन-अल्फा’ पीढ़ी का जिक्र करते हुए कहा कि आज के बच्चों और युवाओं की शिक्षा, रोजगार और बेहतर भविष्य से जुड़े सवाल देश के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. सरकारों को इन समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए.
बाढ़ से हो रहे नुकसान पर भी ध्यान देने की अपील
मायावती ने देश के कुछ हिस्सों में आई बाढ़ का भी मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि बाढ़ के कारण कई जगहों पर लोगों को जान-माल का नुकसान झेलना पड़ रहा है. ऐसे समय में सरकारों और राजनीतिक दलों को राहत एवं बचाव कार्यों के साथ प्रभावित लोगों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए.
उन्होंने कहा कि जब देश के सामने बेरोजगारी, युवाओं का भविष्य और प्राकृतिक आपदा जैसे गंभीर मुद्दे मौजूद हैं, तब ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा करना उचित नहीं है.
कहां से शुरू हुआ ‘वंदे मातरम्’ विवाद?
दरअसल, इस विवाद की ताजा शुरुआत कांग्रेस कार्यसमिति के उस फैसले से हुई, जिसमें पार्टी ने अपने कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो छंदों के गायन की अपनी पुरानी परंपरा को जारी रखने का फैसला किया. कांग्रेस का कहना है कि पार्टी लंबे समय से इन्हीं दो छंदों का गायन करती रही है.
कांग्रेस के इस फैसले के बाद बीजेपी ने सवाल उठाए और आरोप लगाया कि कांग्रेस पूरे राष्ट्रीय गीत के बजाय केवल दो छंदों तक सीमित रहकर ‘वंदे मातरम्’ का पूरा सम्मान नहीं कर रही है. इसके बाद इस मुद्दे पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई.
इसी मुद्दे को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले की आलोचना की है. इसके बाद ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है.
कांग्रेस और बीजेपी में तेज हुई बयानबाजी
दरअसल, ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है. कांग्रेस कार्यसमिति ने पार्टी के कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के शुरुआती दो छंदों के गायन की अपनी पुरानी परंपरा को जारी रखने का फैसला किया है. वहीं, केंद्र सरकार की ओर से पूरे गीत के गायन पर जोर दिया जा रहा है.

कांग्रेस का कहना है कि पार्टी के कार्यक्रमों में शुरुआती दो छंदों के गायन की परंपरा पुरानी है और इसके पीछे ऐतिहासिक कारण हैं. कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि ‘वंदे मातरम्’ का सम्मान सभी करते हैं, लेकिन इसे लेकर अनावश्यक राजनीतिक विवाद खड़ा नहीं किया जाना चाहिए.
वहीं, बीजेपी ने कांग्रेस के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस राष्ट्रीय गीत को लेकर देश की भावनाओं का सम्मान नहीं कर रही है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है और इसके पूरे स्वरूप को सम्मान मिलना चाहिए.
बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस का शुरुआती दो छंदों तक सीमित रहने का फैसला राजनीतिक सोच से प्रेरित है. वहीं कांग्रेस ने बीजेपी पर ‘वंदे मातरम्’ जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय को राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगाया है.
यानी विवाद का मुख्य सवाल यह है कि क्या ‘वंदे मातरम्’ का पूरा गीत गाया जाना चाहिए या फिर परंपरा के मुताबिक उसके शुरुआती दो छंदों का ही गायन किया जाए. इसी मुद्दे को लेकर दोनों दलों के बीच बयानबाजी लगातार तेज हो रही है.
मायावती ने दी जनहित के मुद्दों पर ध्यान देने की नसीहत
मायावती ने केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे ऐसे मुद्दों पर राजनीति करने के बजाय जनता की मूल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करें. उन्होंने कहा कि देश के युवाओं को रोजगार, छात्रों को बेहतर शिक्षा और बाढ़ जैसी आपदाओं से प्रभावित लोगों को तत्काल मदद की जरूरत है. ऐसे जनहित के मुद्दों को राजनीतिक प्राथमिकता मिलनी चाहिए.


