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    Home»जेपीएससी / जेएसएससी»क्या टीडीपीएल को सीबीआई जांच से बचाने के लिए यूपी की योगी सरकार सुप्रीम कोर्ट तक गई थी?
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    क्या टीडीपीएल को सीबीआई जांच से बचाने के लिए यूपी की योगी सरकार सुप्रीम कोर्ट तक गई थी?

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkAugust 21, 2026No Comments5 Mins Read7
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    जोहार लाइव ब्यूरो

    झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विवादों के केंद्र में आई TSR Data Processing Private Limited (TDPL) का उत्तर प्रदेश में भी विवादों और भर्ती परीक्षाओं से जुड़ा लंबा इतिहास रहा है. उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद सचिवालयों में हुई भर्तियों से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परीक्षा कराने वाली निजी एजेंसियों और पूरी भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए थे.

    मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद सचिवालयों में वर्ष 2020-21 के दौरान विभिन्न पदों पर हुई भर्तियों का था. इन भर्तियों में परीक्षा संचालन का काम निजी एजेंसियों को दिया गया था, जिनमें TSR Data Processing Private Limited और रभव लिमिटेड भी शामिल थीं. भर्ती प्रक्रिया के खिलाफ असफल अभ्यर्थियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और आरोप लगाया था कि चयन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर भाई-भतीजावाद, पक्षपात और हेराफेरी हुई.

    एकलपीठ के समक्ष पहले चयन रद्द करने की मांग की गई थी. अप्रैल 2023 में एक मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक पदों पर भर्ती निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए तथा भर्ती प्रक्रिया पर जनता का विश्वास कायम रहना जरूरी है. अदालत ने हालांकि उस स्तर पर पूरी चयन प्रक्रिया को रद्द नहीं किया, लेकिन भविष्य में विधानसभा और विधान परिषद के तृतीय श्रेणी पदों की भर्ती उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से कराने का निर्देश दिया. अदालत ने स्पष्ट कहा कि ऐसी भर्तियां निजी एजेंसियों या चयन समितियों के भरोसे नहीं छोड़ी जानी चाहिए.

    यूपी के छात्रों को एकल पीठ का यह फैसला उचित्त नहीं लगा. उन्होंने एकल पीठ के इस आदेश को असफल अभ्यर्थियों ने चुनौती दी. इसके बाद मामला खंडपीठ के समक्ष पहुंचा. यहां बचाव पक्ष के तौर पर यूपी विधानपरिषद और यूपी के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी मौजूद थे.

    इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस ए रहमान मसूदी और जस्टिस ओमप्रकाश शुक्ला की डबल बेंच वाली पीठ ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा था कि परीक्षा करानेवाली एजेंसी की विश्वसनीयता उच्च स्तर की होनी चाहिए. यह फेयर सेलेक्शन की गारंटी के लिए बेहद जरूरी है.

    बता दें, विधानसभा और विधान परिषद का यह परीक्षा यूपी लोक सेवा आयोग को लेना था, लेकिन इसकी जगह बाहरी एजेंसी को परीक्षा कराने का जिम्मा दिया गया. कोर्ट ने माना कि एजेंसी का चयन विश्वनीय आधार पर नहीं किया गया. ऐसा लगता है विधानपरिषद के चेयरमैन, सेक्रेटरी और नोडल ऑफिसर ने बाहरी एजेंसी को प्रेफर किया. जो इंपैनल एजेंसी थी उसे संज्ञान में नहीं लिया. पूरी प्रक्रिया में नियमों की अवहेलना की गई है.

    कोर्ट लिखता है, 8 जुलाई 2020 की चिट्ठी में नोडल ऑफिसर को निर्देश दिया गया था कि वो बाहरी एजेंसी को नियुक्ति करे. हमें ऐसा कोई पत्राचार नहीं मिला जिससे यह लगे कि यूपी पब्लिक सर्विस कमिशन ने परीक्षा कराने से इंकार किया हो. इससे संदेह पैदा होता है. जिस एजेंसी को चुना गया उसके पक्ष में ऐसी कोई बात नहीं मिली जिससे यह लगे कि यह कंपनी परीक्षा कराने के लिए सक्षम है. जो निष्पक्षता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करे.

    कोर्ट ने यूपी सरकार से पूछा था कि यूपी पब्लिक सर्विस कमिशन प्रयागराज या यूपी स्टाफ सेलेक्शन कमिशन को संपर्क किया था कि आप परीक्षा करा दें? क्या इन्होंने मना किया था परीक्षा कराने से? क्यों बाहर की एजेंसी को लेकर आए? जिन एजेंसियों को परीक्षा कराने का जिम्मा दिया वो विश्वसनीय थी? क्या इसकी स्क्रूटनी की गई थी? हाईकोर्ट ने मामले की सीबीआई जांच का आदेश देते हुए भर्ती प्रक्रिया को प्रथम दृष्टया बेहद संदिग्ध बताया था.

    इस फैसले के खिलाफ यूपी सरकार साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट गई. मामला अब भी विचाराधीन है.

    टीडीपीएल के एक निदेशक गिरफ्तार, दूसरे की तलाश जारी

    टीडीपीएल के निदेशक रामवीर यादव ने झारखंड सीआईडी के समक्ष को बयान दिए हैं, उसमें भी इस बात की पुष्टि हुई है कि मामला अब भी कोर्ट में है और वो खुद इस मामले में जेल जा चुका है. हालांकि इसके बाद इस कंपनी को यूपी में ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था.

    इधर बीते मंगलवार 18 जुलाई को सीआईडी ने यूपी के लखनऊ स्थित कंपनी के कार्यालय पर छापेमारी की, जिसमें कंपनी के कामकाज से संबंधित कई दस्तावेज बरामद किए. साथ ही कंपनी के कार्यालय को फिलहाल सील कर दिया गया.

    मिली जानकारी के मुताबिक कंपनी के एक निदेशक रामवीर सिंह को झारखंड सीआईडी ने पहले ही गिरफ्तार कर लिया है. वहीं दूसरे निदेशक सत्यपाल सिंह की गिरफ्तारी में सीआईडी कई जगहों पर लगातार छापेमारी कर रही है.

    उत्तर प्रदेश पुलिस के रिकॉर्ड से पता चलता है कि राम बीर और सत्य पाल एक अलग भर्ती मामले में जमानत पर हैं. यह मामला वर्ष 2019 में ग्राम विकास अधिकारियों की भर्ती की जांच कर रही विशेष जांच टीम (एसआईटी) की ओर से मार्च 2021 में दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर दर्ज हुआ था. रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों को 7 अप्रैल 2021 को गिरफ्तार किया गया था और उनके पास से कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी बरामद की गई थी.

    Also Read : टीडीपीएल के यूपी ऑफिस को झारखंड सीआईडी ने किया सील, साल 2024-25 में 19.62 करोड़ रही है कंपनी की कमाई

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