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    Home»जोहार ब्रेकिंग»World Senior citizen day: 2036 तक देश में 23 करोड़ बुजुर्ग होंगे, लेकिन राहत कितनी?
    जोहार ब्रेकिंग

    World Senior citizen day: 2036 तक देश में 23 करोड़ बुजुर्ग होंगे, लेकिन राहत कितनी?

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkAugust 21, 2026No Comments4 Mins Read0
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    उम्र बढ़ने के साथ इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत होती है सहारे की. लेकिन अगर यही सहारा पाने के लिए बुजुर्गों को बार-बार सरकारी दफ्तरों, हेल्पलाइन और योजनाओं का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो सवाल सिर्फ योजनाओं का नहीं, पूरी व्यवस्था का है.

    भारत तेजी से बुजुर्ग होती आबादी की तरफ बढ़ रहा है. साल 2011 में देश में करीब 10 करोड़ बुजुर्ग थे. साल 2036 तक यह संख्या बढ़कर 23 करोड़ होने का अनुमान है. यानी आने वाले वर्षों में देश की बड़ी आबादी ऐसी होगी, जिसे पेंशन, इलाज, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित यात्रा की ज्यादा जरूरत होगी.

    हेल्पलाइन पर लाखों शिकायतें, मदद की जरूरत कितनी बड़ी?

    बुजुर्गों की समस्याओं को समझने के लिए एल्डरलाइन 14567 के आंकड़े काफी कुछ बताते हैं. देशभर में तीन साल के दौरान 3.18 लाख से ज्यादा मामलों का समाधान किया गया.

    उत्तर प्रदेश 59,125 मामलों के साथ सबसे आगे रहा. कर्नाटक में 36,436, महाराष्ट्र में 31,049 और तमिलनाडु में 26,810 मामलों का समाधान हुआ. झारखंड में भी 20,647 मामलों में बुजुर्गों को मदद मिली, जबकि बिहार में यह आंकड़ा 16,205 रहा.

    इन शिकायतों में सरकारी योजनाओं की जानकारी से लेकर भावनात्मक सहारे और मुश्किल परिस्थितियों में तत्काल हस्तक्षेप तक की जरूरत सामने आई. यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि हेल्पलाइन काम कर रही है या नहीं. सवाल यह भी है कि देश के बुजुर्गों को इतनी बड़ी संख्या में मदद की जरूरत क्यों पड़ रही है?

    पेंशन का सहारा, लेकिन खर्च लगातार बढ़ रहा

    बुजुर्गों के लिए पेंशन सबसे अहम आर्थिक सहारा है. लेकिन महंगाई और बढ़ते मेडिकल खर्च के बीच सवाल यह है कि सरकारी सहायता उनकी जरूरतों के मुकाबले कितनी है. झारखंड में करीब 8.99 लाख बुजुर्गों को NSAP के तहत पेंशन मिल रही है. राज्य की सर्वजन पेंशन योजना के तहत पात्र बुजुर्गों को ₹1,000 प्रति महीने दिए जाते हैं.

    यह रकम सहारा जरूर देती है, लेकिन दवाइयों, भोजन और रोजमर्रा के खर्च के बीच बुजुर्गों की आर्थिक सुरक्षा की चुनौती इससे कहीं बड़ी है. देश के अलग-अलग राज्यों में पेंशन की रकम और पात्रता अलग-अलग है, लेकिन समस्या लगभग एक जैसी है—बढ़ती उम्र के साथ नियमित आय का कम होना.

    इलाज सबसे बड़ी चिंता

    बुढ़ापे में स्वास्थ्य खर्च तेजी से बढ़ता है. इसी जरूरत को देखते हुए सरकार की तरफ से NPHCE, आयुष्मान भारत और AVYAY जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं. झारखंड में NPHCE के तहत 13.17 लाख से ज्यादा बुजुर्गों को स्वास्थ्य जांच और इलाज की सुविधा मिलने की बात सामने आई है. AVYAY के तहत 17,669 वरिष्ठ नागरिकों को आश्रय और दूसरी सहायता उपलब्ध कराई गई है.

    वहीं आयुष्मान भारत के तहत 70 साल या उससे अधिक उम्र के सभी वरिष्ठ नागरिकों के लिए सालाना ₹5 लाख तक के इलाज का प्रावधान है. लेकिन योजना बनाना एक बात है और उसका लाभ बुजुर्ग तक आसानी से पहुंचना दूसरी. उम्रदराज लोगों के लिए अस्पताल तक पहुंच, दस्तावेज, डिजिटल प्रक्रिया और योजना की जानकारी खुद बड़ी चुनौती बन जाती है.

    बुजुर्गों को सिर्फ पैसे और इलाज नहीं, साथ भी चाहिए

    बुढ़ापे की चुनौती सिर्फ आर्थिक या स्वास्थ्य से जुड़ी नहीं है. अकेलापन, मानसिक तनाव, डिजिटल सेवाओं को समझने में परेशानी और सामाजिक जुड़ाव की कमी भी बड़ी समस्या बनती जा रही है. अलग कम्युनिटी केयर सेंटर बनाए जाने की मांग लंबे समय से उठती रही है. लेकिन संसद की एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार कहती है कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए कम्युनिटी सेंटर स्थापित करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है.

    यानी आने वाले समय में देश को ऐसी व्यवस्था की जरूरत होगी, जहां बुजुर्गों को सिर्फ पेंशन या इलाज ही नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक सहारा भी मिले.

    साल 2036 तक 23 करोड़ बुजुर्गों का भारत कितना तैयार है?

    देश में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. योजनाएं भी हैं, हेल्पलाइन भी है, पेंशन भी है और इलाज के लिए सरकारी कवरेज भी बढ़ रहा है. लेकिन जमीनी स्तर पर बुजुर्गों की मुश्किलें अब भी बनी हुई हैं.

    आज सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बुजुर्गों के लिए कितनी योजनाएं हैं. सवाल यह होना चाहिए कि इन योजनाओं तक पहुंचना उनके लिए कितना आसान है. क्योंकि 2036 में जब देश में करीब 23 करोड़ बुजुर्ग होंगे, तब वरिष्ठ नागरिकों की जरूरत कोई अलग मुद्दा नहीं रहेगा. यह भारत के करोड़ों परिवारों की रोजमर्रा की हकीकत होगी.

    नोट: इस रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए आंकड़े संसद में केंद्र सरकार की ओर से दिए गए जवाबों और संसदीय दस्तावेजों पर आधारित हैं.

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