पश्चिमी सिंहभूम के गुवा की लाल मिट्टी 8 सितंबर 1980 को गोलियों से लाल हो गई थी. अलग झारखंड की मांग, जल-जंगल-जमीन पर अधिकार और आदिवासियों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध में जुटे आंदोलनकारियों पर पुलिस फायरिंग ने झारखंड आंदोलन के इतिहास में एक ऐसा अध्याय जोड़ दिया, जिसकी गूंज अलग राज्य बनने तक सुनाई देती रही. गुवा गोलीकांड को इसलिए सिर्फ पुलिस फायरिंग की घटना नहीं माना जाता, बल्कि इसे झारखंड आंदोलन के निर्णायक मोड़ों में गिना जाता है.
साल 1980 में कोल्हान और सारंडा क्षेत्र में जंगल और जमीन को लेकर आदिवासी समाज और प्रशासन के बीच तनाव बढ़ा हुआ था. वन कानूनों से जुड़े मामलों में बड़ी संख्या में आदिवासियों की गिरफ्तारी हुई थी. आंदोलनकारियों की प्रमुख मांग गिरफ्तार किए गए 156 आदिवासियों की रिहाई थी.
गुवा में लौह अयस्क खनन भी स्थानीय असंतोष का बड़ा कारण था. खदानों से निकलने वाले लाल पानी से खेत और जलस्रोत प्रभावित होने की शिकायत थी. स्थानीय लोग खदानों में रोजगार और अपने पारंपरिक अधिकारों की मांग कर रहे थे. इन स्थानीय सवालों के साथ अलग झारखंड राज्य की मांग भी लगातार मजबूत हो रही थी.
8 सितंबर को गुवा में जुटे थे हजारों लोग
8 सितंबर को गुवा में आंदोलनकारियों की बड़ी सभा प्रस्तावित थी. प्रशासन ने धारा 144 लागू कर रखी थी और पुलिस तथा बिहार मिलिट्री पुलिस की तैनाती की गई थी.
सभा के दौरान तनाव बढ़ा और आंदोलनकारियों तथा पुलिस के बीच टकराव हो गया. उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस संघर्ष में पुलिसकर्मी भी मारे गए. इसके बाद पुलिस की ओर से गोलीबारी हुई, जिसमें कई आदिवासी आंदोलनकारी मारे गए. लेकिन गुवा गोलीकांड का सबसे गंभीर और विवादित अध्याय इसके बाद सामने आया.
अस्पताल में घायल आंदोलनकारियों पर भी चली गोलियां
फायरिंग में घायल आंदोलनकारियों को गुवा अस्पताल ले जाया गया था. बाद की जांच और प्रत्यक्षदर्शी विवरणों में आरोप लगाया गया कि बिहार मिलिट्री पुलिस के जवान अस्पताल पहुंचे और वहां मौजूद घायल आंदोलनकारियों पर भी गोली चलाई.
गुवा शहीद स्मारक पर दर्ज नामों में ईश्वर सरदार, रामो लागुरी, चांदो लागुरी, रेंगो सुरीन, बागी देवगम, जीतू सुरीन, चैतन्य चांपिया, चूड़ी हांसदा, जुरा पूर्ति और गोंडा होनहागा शामिल हैं. कुछ स्थानीय स्रोत चांबे राधे का नाम भी जोड़ते हैं, जिसके कारण मृतकों की संख्या के अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं. यही वजह है कि गुवा गोलीकांड आज भी झारखंड में राज्य दमन और आदिवासी प्रतिरोध के प्रतीक के तौर पर याद किया जाता है.
गुवा के बाद झारखंड आंदोलन को मिली नई धार
गुवा से पहले भी अलग झारखंड की मांग पुरानी थी. जयपाल सिंह मुंडा के दौर से अलग झारखंड का राजनीतिक आंदोलन चल रहा था और बाद में विभिन्न संगठनों ने इसे आगे बढ़ाया. लेकिन गुवा गोलीकांड ने आंदोलन को एक नया भावनात्मक और राजनीतिक आधार दिया.
गुवा के शहीद आंदोलन के लिए सिर्फ मृतक नहीं रहे. वे जल-जंगल-जमीन और अलग झारखंड की लड़ाई के प्रतीक बन गए. कोल्हान में आंदोलन को मजबूती मिली और गुवा गोलीकांड की याद बाद के झारखंड आंदोलन में लगातार इस्तेमाल होती रही.
आंदोलन का मूल सवाल यही था कि जिस इलाके में आदिवासी पीढ़ियों से रहते आए हैं, वहां जंगल, जमीन और खनिज संपदा पर पहला अधिकार किसका होगा. गुवा में यह सवाल गोलियों के बीच और ज्यादा तीखा हो गया.
46 साल बाद भी गुवा क्यों महत्वपूर्ण है?
झारखंड 15 नवंबर 2000 को एक अलग राज्य बना. आंदोलनकारियों का वर्षों पुराना सपना पूरा हुआ, लेकिन गुवा गोलीकांड की बुनियादी जमीन से जुड़े कई सवाल आज भी बहस में हैं.
झारखंड बनने के 26 साल बाद 8 सितंबर फिर उसी सवाल को सामने लाता है—क्या अलग राज्य बनने से गुवा के शहीदों के वे सवाल भी हल हो गए, जिनके लिए उन्होंने जान गंवाई थी? गुवा की लाल मिट्टी आज भी झारखंड आंदोलन की उस कीमत की गवाही देती है, जिसे अलग राज्य के निर्माण की कहानी से अलग करके नहीं देखा जा सकता.

