जिस शख्स का रिश्ता देश के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार से था, उसी ने संसद में अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया. जिस सरकार के मुखिया उनके ससुर जवाहरलाल नेहरू थे, उसी सरकार के फैसलों पर फिरोज गांधी ने सवाल उठाए. बड़े कारोबारी घरानों के खिलाफ आवाज उठाई, वित्तीय गड़बड़ियों को संसद तक पहुंचाया और ऐसा दबाव बनाया कि एक केंद्रीय मंत्री को इस्तीफा तक देना पड़ा.
नाम था फिरोज जहांगीर गांधी.
आज फिरोज गांधी का नाम आते ही सबसे पहले इंदिरा गांधी के पति और राजीव गांधी के पिता की पहचान सामने आती है. लेकिन उनकी कहानी सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार का हिस्सा बनने की कहानी नहीं है. यह उस सांसद की कहानी है, जिसने सत्ता के सबसे करीब रहते हुए भी सत्ता से सवाल पूछने का रास्ता चुना.
12 सितंबर 1912 को बॉम्बे के एक पारसी परिवार में जन्मे फिरोज का शुरुआती जीवन सामान्य था. उनके पिता जहांगीर गांधी समुद्री इंजीनियर थे. परिवार मूल रूप से गुजरात के भरूच से जुड़ा था, लेकिन फिरोज का बचपन आगे चलकर इलाहाबाद में बीता. यहीं से उनके जीवन ने वह मोड़ लिया, जिसने उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन और फिर भारतीय राजनीति तक पहुंचाया.
एक मुलाकात जिसने बदल दी जिंदगी
इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान फिरोज की मुलाकात नेहरू परिवार से हुई. कहानी का एक चर्चित प्रसंग उस समय का है, जब स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रदर्शन के दौरान उन्होंने कमला नेहरू की मदद की. कमला नेहरू के साथ इस जुड़ाव ने फिरोज को नेहरू परिवार के करीब ला दिया. लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण था कि इसी दौर में उनका झुकाव स्वतंत्रता आंदोलन की ओर बढ़ता गया.
उन्होंने पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में हिस्सा लिया. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया. स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा. 1930 के दशक में वह लाल बहादुर शास्त्री और दूसरे कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ आंदोलनों में शामिल रहे. यानी फिरोज गांधी का राजनीतिक सफर किसी पारिवारिक विरासत से शुरू नहीं हुआ था. इसकी शुरुआत सड़कों पर आंदोलन और जेल से हुई थी.
इंदिरा से रिश्ता और संघर्षों का दौर

फिरोज और इंदिरा गांधी की नजदीकी समय के साथ गहरी होती गई. दोनों ने मार्च 1942 में विवाह किया. उस समय देश में आजादी की लड़ाई अपने निर्णायक दौर में थी. शादी के कुछ ही महीने बाद भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ और दोनों गिरफ्तार कर लिए गए. फिरोज को नैनी जेल में रखा गया.
बाद के वर्षों में उनके परिवार में दो बेटों का जन्म हुआ. 1944 में राजीव और 1946 में संजय गांधी पैदा हुए. आज जब नेहरू-गांधी परिवार का नाम भारतीय राजनीति के इतिहास में बेहद प्रभावशाली परिवार के रूप में लिया जाता है, तो उस परिवार की कहानी में फिरोज गांधी की भूमिका को अक्सर कम करके देखा जाता है. जबकि आजादी के बाद उन्होंने अपने लिए अलग राजनीतिक रास्ता तैयार किया.

पत्रकार से सांसद तक का सफर
आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने. फिरोज ने पत्रकारिता को अपना रास्ता बनाया और ‘द नेशनल हेराल्ड’ से जुड़े. यह वही अखबार था, जिसकी स्थापना जवाहरलाल नेहरू ने की थी. लेकिन फिरोज सिर्फ अखबार चलाने तक सीमित नहीं रहे. उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और 1950 से 1952 के बीच प्रांतीय संसद के सदस्य रहे. 1952 में देश में पहली बार आम चुनाव हुए. फिरोज गांधी ने उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. यहीं से उनका वह चेहरा सामने आया, जिसकी वजह से उन्हें आज भी भारतीय संसदीय राजनीति के इतिहास में याद किया जाता है.
फिरोज गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के सांसद थे. देश में कांग्रेस की सरकार थी और प्रधानमंत्री थे उनके ससुर जवाहरलाल नेहरू. लेकिन संसद में फिरोज गांधी का रवैया परिवार या पार्टी से ज्यादा संस्थागत जवाबदेही पर केंद्रित रहा.
जनता को प्रतिनिधियों का काम जानने का अधिकार
आज संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है. लेकिन आजादी के शुरुआती वर्षों में दौर में संसद की कार्यवाही की स्वतंत्र रिपोर्टिंग की इजाजत नहीं थी. संसद कवर करने वाले पत्रकारों/संपादकों सिर पर हमेशा विशेषाधिकार हनन और मानहानि कानूनों की तलवार लटकती रहती थी. फिरोज गांधी ने इस सवाल को संसद के भीतर उठाया.1956 में उन्होंने Proceedings of Legislatures (Protection of Publication) Bill नाम से निजी सदस्य विधेयक पेश किया. बाद में इसका नाम बदलकर Proceedings of Parliament (Protection of Publication) Bill हुआ.
विधेयक लोकसभा से पारित हुआ, राज्यसभा ने भी इसे मंजूरी दी और 26 मई 1956 को यह Parliamentary Proceedings (Protection of Publication) Act, 1956 बना. राज्यसभा के आधिकारिक दस्तावेज में भी इस कानून का श्रेय विधेयक के मूल प्रस्तावक फिरोज गांधी को दिया गया है. फिरोज गांधी ने दो टूक कहा था कि संसद जनता की है. सांसद जनता के प्रतिनिधि हैं. जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके प्रतिनिधि सदन में क्या कर रहे और क्या कह रहे हैं? सचेत किया था कि लोकतंत्र में जनता को उसके प्रतिनिधियों के कामकाज से दूर नहीं रखा जा सकता.
हर आरोप सबूतों के साथ
फिरोज गांधी की संसदीय सक्रियता केवल भाषणों तक सीमित नहीं थी. वित्तीय मामलों पर उनकी गजब की पकड़ थी. 1955 में उन्होंने निजी बीमा कंपनियों के कामकाज और उनके वित्तीय व्यवहार पर गंभीर सवाल उठाए. 6 दिसंबर 1955 की लोकसभा में बहस में भारत इंश्योरेंस कंपनी सहित बीमा कारोबार से जुड़े वित्तीय लेन-देन के घपलों पर उन्होंने सवाल खड़े किए. प्रमुख उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया पर लगे आरोपों ने इस बहस को और सरगर्म किया. बीमा कंपनियों के धन के दुरुपयोग और व्यावसायिक हितों के लिए उसके इस्तेमाल के सबूतों ने सरकार को कार्रवाई के लिए बाध्य कर दिया.
इस मामले में डालमिया को दो साल की सजा हुई. इसी दौर में निजी बीमा क्षेत्र की कार्यप्रणाली और पॉलिसीधारकों के हितों पर राष्ट्रीय बहस तेज हुई. इसके तुरंत बाद 19 जनवरी 1956 को जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरण किया गया. सरकार ने पहले अध्यादेश के माध्यम से प्रबंधन अपने हाथ में लिया और बाद में Life Insurance Corporation Act, 1956 के जरिए LIC की स्थापना का रास्ता साफ हुआ. LIC 1 सितंबर 1956 को अस्तित्व में आई. उसी समय 154 भारतीय, 16 गैर-भारतीय बीमा कंपनियां और 75 प्रोविडेंट सोसाइटी भी राष्ट्रीयकृत की गईं.
मुंद्रा कांड ने पूरे देश का ध्यान खींचा
फिरोज गांधी के राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित अध्याय 1958 का हरिदास मुंद्रा मामला था. उन्होंने संसद में भारतीय जीवन बीमा निगम यानी LIC के निवेश को लेकर सवाल उठाए. मामला हरिदास मुंद्रा से जुड़ा था और इसमें सरकारी वित्तीय संस्थान के निवेश पर गंभीर सवाल खड़े हुए. फिरोज गांधी ने इस मुद्दे को संसद में जोरदार तरीके से उठाया. मामला इतना बड़ा हुआ कि सरकार को इसकी जांच के लिए कदम उठाने पड़े. जांच के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा.
यह घटना भारतीय संसदीय इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इसने यह दिखाया कि एक सांसद अपनी ही सरकार को जवाबदेह ठहरा सकता है. फिरोज गांधी ने साबित किया कि संसद में प्रभाव सिर्फ संख्या से नहीं, सवालों की ताकत से भी बनता है.
नंबूदरीपाद सरकार की बर्खास्तगी का किया विरोध
फिरोज गांधी यहीं नहीं थमे. आगे उन्होंने अपनी पत्नी इंदिरा गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर केरल की नंबूदरीपाद सरकार की बर्खास्तगी पर सवाल खड़े करके घर के भीतर से बाहर तक हलचल मचा दी थी. 1957 में ई. एम. एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में भारत की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार केरल में बनी. यह केवल केरल की राजनीति की घटना नहीं थी. पूरी दुनिया के लिए यह महत्वपूर्ण था क्योंकि पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी ने क्रांति के रास्ते के बजाय चुनाव जीतकर सत्ता हासिल की थी.
नंबूदरीपाद सरकार ने भूमि सुधार और शिक्षा संबंधी सुधार शुरू किए. खासकर एजुकेशन बिल को लेकर चर्च, कुछ ईसाई संस्थान, मुस्लिम लीग और नायर सर्विस सोसायटी सहित प्रभावशाली समूहों में भारी असंतोष पैदा हुआ. धीरे-धीरे यह आंदोलन लिब्रेशन स्ट्रगल में बदल गया. उन दिनों इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष थीं. उन्होंने नंबूदरीपाद सरकार के खिलाफ आंदोलन को राजनीतिक समर्थन दिया और जवाहरलाल नेहरू पर सरकार को बर्खास्त करने के लिए दबाव बढ़ाया. निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने में नेहरू हिचक रहे थे लेकिन आंदोलन और इंदिरा गांधी के बढ़ते दबाव के बीच 31 जुलाई 1959 को केंद्र ने नंबूदरीपाद सरकार को बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया.
इंदिरा को कह दिया फासिस्ट

आजादी के बाद राज्य की किसी सरकार की बर्खास्तगी का यह पहला मौका था. विपक्ष केंद्र पर हमलावर था. इसी मसले में फिरोज गांधी के विरोध ने नेहरू और इंदिरा को और परेशान किया. फिरोज और इंदिरा की डाइनिंग टेबल पर हुई झड़प सार्वजनिक विमर्श में आकर इतिहास का हिस्सा बन गई.
फिरोज के जीवनीकार स्वीडिश पत्रकार बर्टिल फॉक ने अपनी किताब Feroze: The Forgotten Gandhi में इसका उल्लेख किया. बर्टिल फॉक ने अपने स्रोत के रूप में वरिष्ठ पत्रकार जनार्दन ठाकुर का हवाला दिया है. ठाकुर के अनुसार एक सुबह तीन मूर्ति भवन में नाश्ते की मेज पर केरल का मुद्दा उठा. जवाहरलाल नेहरू भी वहीं थे.
फिरोज ने इंदिरा से तीखे शब्दों में कहा,
यह बिल्कुल सही नहीं है.. तुम लोगों को धमका रही हो.. दबा रही हो.. तुम फासीवादी हो..
यह सुनकर इंदिरा भड़क उठीं. प्रतिवाद किया कि तुम मुझे फासिस्ट कह रहे हो और और गुस्से में वहां से चली गईं. पंडित नेहरू यह सब देख – सुन परेशान हुए थे. यह सिर्फ पति-पत्नी का झगड़ा नहीं था. इसके पीछे लोकतंत्र और सत्ता के इस्तेमाल को लेकर दो बिल्कुल अलग राजनीतिक दृष्टिकोण आमने-नाश्ते की मेज वाला विवाद आखिरी टकराव नहीं था.
निजी जिंदगी और राजनीतिक दूरी
फिरोज और इंदिरा गांधी का रिश्ता भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित रिश्तों में रहा. दोनों के रास्ते कई बार राजनीतिक और निजी स्तर पर अलग दिखाई दिए. इंदिरा गांधी धीरे-धीरे अपने पिता जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक दुनिया में सक्रिय होती गईं. दूसरी ओर फिरोज गांधी संसद में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बना रहे थे.
यह विरोधाभास दिलचस्प था. एक तरफ देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे, उनकी बेटी इंदिरा आगे चलकर प्रधानमंत्री बनीं और दूसरी तरफ उनके दामाद फिरोज गांधी उसी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने वाले सांसद के रूप में सामने आए. यही वजह है कि फिरोज गांधी को सिर्फ ‘इंदिरा गांधी के पति’ के रूप में देखना उनके राजनीतिक योगदान को छोटा कर देता है.
सिर्फ 47 साल की उम्र में निधन
फिरोज गांधी का स्वास्थ्य बाद के वर्षों में खराब रहने लगा. 1958 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा. इसके बाद भी उन्होंने सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई. 8 सितंबर 1960 को नई दिल्ली में दूसरे दिल के दौरे के बाद उनका निधन हो गया. उनकी उम्र उस समय सिर्फ 47 वर्ष थी.
उनका अंतिम संस्कार किया गया और उनकी अस्थियों को प्रयागराज के पारसी कब्रिस्तान में दफनाया गया. इतनी कम उम्र में उनका राजनीतिक जीवन खत्म हो गया, लेकिन संसद में उठाए गए सवाल उनकी विरासत का हिस्सा बन गए.
नाम से आगे की विरासत
फिरोज गांधी के निधन के बाद रायबरेली की राजनीति और नेहरू-गांधी परिवार का रिश्ता और मजबूत होता गया. इंदिरा गांधी ने बाद में इसी सीट से चुनाव जीता. आगे चलकर सोनिया गांधी और फिर राहुल गांधी भी रायबरेली से लोकसभा पहुंचे. लेकिन रायबरेली के राजनीतिक इतिहास में फिरोज गांधी की जगह अलग है.
उन्होंने इस सीट को सिर्फ एक चुनावी क्षेत्र के तौर पर नहीं देखा. उन्होंने इसे संसद तक जनता की आवाज पहुंचाने के मंच के रूप में इस्तेमाल किया. आज जब संसद में विपक्ष, सरकार की जवाबदेही और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर बहस होती है, तब फिरोज गांधी का राजनीतिक जीवन एक सवाल छोड़ता है.


