नई दिल्ली में स्थित मावलंकर हॉल में आदिवासी अधिकारों को लेकर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ, जिसमें देश के 16 राज्यों से 1,000 से ज्यादा आदिवासी प्रतिनिधि शामिल हुए. सम्मेलन में 6 सितंबर को वन अधिकार, रोजगार, शिक्षा और आदिवासी पहचान से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई. इसके अगले दिन 7 सितंबर को प्रतिनिधियों ने दिल्ली में मार्च निकाला और जल-जंगल-जमीन के अधिकार को लेकर आवाज बुलंद की.
सम्मेलन का आयोजन आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच की ओर से किया गया था. इसमें हसदेव अरण्य, केन-बेतवा, नगरहोल और पोलावरम जैसे इलाकों में विस्थापन और जमीन के मुद्दों पर चल रहे आंदोलनों से जुड़े प्रतिनिधि भी पहुंचे थे.
जस्टिस मदन लोकुर बोले- कानून हैं, लेकिन जमीन पर सही से लागू नहीं हो रहे
सम्मेलन का उद्घाटन सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन लोकुर ने किया. उन्होंने आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े 5वीं अनुसूची, 6वीं अनुसूची, वनाधिकार कानून और पेसा एक्ट के कमजोर क्रियान्वयन पर चिंता जताई.
उन्होंने कहा कि ग्राम सभाओं को दरकिनार किया जा रहा है और वनाधिकार Act लागू हुए करीब दो दशक बाद भी आदिवासियों के खिलाफ छोटे-छोटे मामले दर्ज किए जा रहे हैं. उन्होंने रोजगार के घटते अवसरों का भी मुद्दा उठाया.
सम्मेलन में पेश किए गए एक प्रस्ताव में दावा किया गया कि 5वीं अनुसूची और पेसा केवल 10 राज्यों के notified Scheduled Areas में लागू होते हैं. सम्मेलन में पेश किए गए अनुमान के मुताबिक देश की करीब 59 फीसदी अनुसूचित जनजाति आबादी आर्टिकल 244 के तहत मिलने वाली इन विशेष सुरक्षा के दायरे से बाहर है.
पेसा को लेकर भी सम्मेलन में सवाल उठे. वक्ताओं का कहना था कि कई राज्यों ने इसके नियम बनाने में काफी समय लगाया. स्टोरी के मुताबिक झारखंड ने पेसा के नियम जनवरी में बनाए, जबकि कई जगह ग्राम सभा की अनिवार्य भूमिका को सिर्फ औपचारिकता तक सीमित किए जाने का आरोप लगाया गया.
ग्राम सभा के फैसलों को नजरअंदाज करने का आरोप
सम्मेलन में महाराष्ट्र के कार्यकर्ता अमोल वाघमारे ने आरोप लगाया कि कई जगह जिला पंचायत और राज्य सरकारें PESA के प्रावधानों के बावजूद ग्राम सभाओं के फैसलों को दरकिनार कर देती हैं. आदिवासी संगठनों का कहना है कि जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में ग्राम सभा की वास्तविक सहमति जरूरी है, लेकिन कई मामलों में इसकी प्रक्रिया को कमजोर किया जा रहा है.
सम्मेलन में वनाधिकार कानून को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए. पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक 2026 तक करीब 47 फीसदी दावे मंजूर किए गए, जबकि लगभग एक-तिहाई दावे खारिज किए गए. इसमें करीब 48 हजार सामुदायिक दावे भी शामिल बताए गए.
सम्मेलन में आरोप लगाया गया कि कई जगह आदिवासी समुदायों से ऐसे दस्तावेज और सैटेलाइट मैप मांगे जाते हैं, जिनकी कानून में अनिवार्यता नहीं है. इसके अलावा दावे खारिज करने के पीछे लिखित कारण नहीं देने और पात्रता से कम जमीन का अधिकार देने की बात भी कही गई.
खनन और बड़े प्रोजेक्ट्स से विस्थापन का मुद्दा
सम्मेलन में आदिवासी विस्थापन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा. हसदेव अरण्य में पेड़ों की कटाई, तेलंगाना में संरक्षण रिजर्व के कारण गांवों के संभावित विस्थापन और झारखंड के संथाल परगना में ग्राम सभा की बैठकों के कथित फर्जी रिकॉर्ड तैयार करने जैसे आरोप प्रतिनिधियों ने लगाए.
सम्मेलन में पेश जानकारी के मुताबिक 1951 से 1990 के बीच विकास परियोजनाओं के कारण 85.4 लाख आदिवासी विस्थापित हुए थे. साथ ही दावा किया गया कि इन विस्थापितों की संख्या का कोई ताजा केंद्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.
खनन प्रभावित इलाकों के लिए बनाए गए डिस्ट्रिक्ट मिनरल फॉउंडेशन यानी DMF का मुद्दा भी उठा. सम्मेलन में दावा किया गया कि DMF में 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हो चुके हैं, लेकिन इसके पैसे के इस्तेमाल में ग्राम सभाओं की कोई प्रभावी भूमिका नहीं है.
रोजगार में आरक्षित पद खाली, स्कूल बंद
सम्मेलन में रोजगार को लेकर भी आंकड़े पेश किए गए. दावा किया गया कि केंद्र सरकार के नौ मंत्रालयों में ही 2023 में एसटी के लिए आरक्षित 12 हजार से ज्यादा पद खाली थे. वक्ताओं ने कहा कि 2014 में केंद्र सरकार के कर्मचारियों में एसटी की हिस्सेदारी 8.55 फीसदी थी, जो 2022 तक घटकर 7.33 फीसदी रह गई. सम्मेलन में सभी आरक्षित खाली पदों को भरने और रोजगार से जुड़े पूरे आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की गई.
शिक्षा को लेकर सम्मेलन में कहा गया कि 2018-19 के बाद देशभर में 79 हजार से ज्यादा स्कूल बंद हुए, जिनमें ज्यादातर सरकारी स्कूल थे.
आदिवासी कल्याण विभागों की ओर से चलाए जाने वाले स्कूलों की संख्या में भी कमी का दावा किया गया. सम्मेलन में यह भी कहा गया कि 700 से ज्यादा प्रस्तावित एकलव्य स्कूलों में से 511 ही संचालित हो रहे हैं. महाराष्ट्र के आदिवासी छात्रावासों में खराब व्यवस्था और छात्रों की मौत का मुद्दा भी उठाया गया.
आदिवासी भाषा और पहचान पर भी चिंता
सम्मेलन का आखिरी सत्र आदिवासी पहचान, संस्कृति और विश्वास को लेकर था. इसमें कहा गया कि देश की सैकड़ों आदिवासी भाषाओं में केवल संताली और बोड़ो आठवीं अनुसूची में शामिल हैं. वक्ताओं ने गोंडी, भील और कोक बोरोक जैसी भाषाओं को पर्याप्त सरकारी मान्यता और संरक्षण नहीं मिलने का आरोप लगाया.
एकलव्य स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य करने और आदिवासी इतिहास एवं संस्कृति की जगह दूसरी सांस्कृतिक सामग्री को बढ़ावा देने पर भी प्रतिनिधियों ने आपत्ति जताई.
सम्मेलन के अंत में चार प्रस्ताव पारित किए गए. इनमें वनाधिकार कानून के खारिज दावों की समयबद्ध समीक्षा, पेसा को प्रभावी तरीके से लागू करने, ग्राम सभाओं की भूमिका मजबूत करने, रोजगार और आरक्षण से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक करने और खाली आरक्षित पदों को भरने की मांग शामिल रही. इसके साथ ही आदिवासियों को जनगणना में अपनी धार्मिक पहचान दर्ज करने के लिए अलग कॉलम देने की मांग भी की गई.
सम्मेलन के समापन पर CPI(M) नेता और आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच की नेता ब्रिंदा करात ने मौजूदा सरकार पर आदिवासी अधिकारों और जमीन-जंगल से जुड़े हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि आदिवासियों के विस्थापन के साथ सिर्फ जमीन नहीं जाती, बल्कि उनकी सामुदायिक पहचान, संस्कृति और विश्वास भी प्रभावित होते हैं. उन्होंने पिछले 10 वर्षों में निजी कंपनियों को बड़ी मात्रा में वन भूमि दिए जाने का दावा भी किया. सम्मेलन के बाद आयोजकों ने कहा कि इन मांगों और सम्मेलन में सामने आए मुद्दों को संबंधित अधिकारियों के सामने रखा जाएगा.
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