रांची: दुनिया भर के आदिवासी और स्वदेशी समुदायों के अधिकारों से जुड़ी ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय घोषणा United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples (UNDRIP) को अपनाए जाने के आज 19 वर्ष पूरे हो गए. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 13 सितंबर 2007 को इस घोषणा को मंजूरी दी थी. इसमें आदिवासी और स्वदेशी समुदायों के आत्मनिर्णय, संस्कृति, भाषा, भूमि, प्राकृतिक संसाधन, शिक्षा, राजनीतिक भागीदारी और पारंपरिक संस्थाओं से जुड़े अधिकारों को मान्यता दी गई है. घोषणा में कुल 46 अनुच्छेद हैं.
143 देशों ने किया था समर्थन, भारत भी पक्ष में
13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में UNDRIP को 143 देशों के समर्थन से अपनाया गया था. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और अमेरिका ने उस समय इसके खिलाफ मतदान किया था, जबकि 11 देश मतदान से दूर रहे. भारत ने घोषणा के पक्ष में मतदान किया था. बाद में इन चारों देशों ने भी UNDRIP का समर्थन कर दिया. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, घोषणा को तैयार करने की प्रक्रिया करीब 25 वर्षों तक चली थी.
UNDRIP कोई अंतरराष्ट्रीय संधि नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र महासभा की घोषणा है. इसलिए इसे किसी देश में घरेलू कानून की तरह सीधे लागू होने वाला कानून नहीं माना जाता. हालांकि, यह Indigenous Peoples के अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण न्यूनतम मानक तय करती है.
आत्मनिर्णय से लेकर भाषा और संस्कृति के अधिकार तक
UNDRIP का Article 3 Indigenous Peoples के self-determination यानी आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देता है. इसके तहत उन्हें अपनी राजनीतिक स्थिति निर्धारित करने और अपने आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास को आगे बढ़ाने का अधिकार है. हालांकि इसका अर्थ किसी देश से अलग होकर नया राष्ट्र बनाने का स्वतः अधिकार नहीं है. Article 46 किसी देश की राजनीतिक एकता और क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित करने वाली व्याख्या से रोकता है.
घोषणा में अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं, इतिहास और पारंपरिक ज्ञान को बनाए रखने तथा विकसित करने के अधिकार को भी मान्यता दी गई है. Article 13 अपनी भाषाओं को पुनर्जीवित करने, इस्तेमाल करने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की बात करता है, जबकि Article 14 अपनी शिक्षा प्रणाली और संस्थाओं को स्थापित करने के अधिकार से जुड़ा है. भारत में कुडुख, मुंडारी, हो और संताली जैसी आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के सवाल को इस व्यापक अंतरराष्ट्रीय अधिकार-फ्रेमवर्क के संदर्भ में देखा जा सकता है.
जमीन, जंगल और संसाधनों पर अधिकार सबसे अहम मुद्दा
UNDRIP का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आदिवासी समुदायों की भूमि, क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकार हैं. घोषणा उनके पारंपरिक क्षेत्रों के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक संबंध को मान्यता देती है. विस्थापन के मामले में Article 10 जबरन हटाए जाने से सुरक्षा की बात करता है.
वहीं Free, Prior and Informed Consent (FPIC) का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है. इसका अर्थ है कि आदिवासी समुदायों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण फैसलों और विकास परियोजनाओं के संबंध में उन्हें पहले से पर्याप्त जानकारी दी जाए और स्वतंत्र एवं सूचित सहमति की प्रक्रिया अपनाई जाए. Article 32 विकास परियोजनाओं के संदर्भ में भूमि, क्षेत्र और संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर consultation और consent की बात करता है. हालांकि इसे हर परियोजना पर समुदाय के पूर्ण कानूनी veto के रूप में समझना सही नहीं होगा.
भारत और झारखंड में क्या है इसका महत्व
भारत में UNDRIP को संविधान, PESA और Forest Rights Act जैसे घरेलू कानूनी ढांचे के साथ पढ़ना जरूरी है. भारतीय कानूनों में “Indigenous Peoples” और “Scheduled Tribes” एक समान कानूनी श्रेणियां नहीं हैं. संविधान की Fifth और Sixth Schedule, अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका, वन अधिकार और आदिवासी भूमि से जुड़े प्रावधान इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं.
झारखंड में UNDRIP की प्रासंगिकता जल, जंगल और जमीन, खनन, विस्थापन, ग्रामसभा, वन अधिकार, पारंपरिक संस्थाओं, भाषा और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों में दिखाई देती है. आदिवासी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं तथा पवित्र स्थलों के संरक्षण को भी सांस्कृतिक अधिकारों के व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है.
13 सितंबर 2026 को UNDRIP के 19 वर्ष पूरे होने के साथ अब बड़ा सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त आदिवासी अधिकारों और जमीन पर उनकी वास्तविक स्थिति के बीच कितनी दूरी है. अगले वर्ष इस घोषणा को अपनाए जाने के 20 वर्ष पूरे होंगे, ऐसे में भारत समेत दुनिया भर में यह आकलन महत्वपूर्ण होगा कि इन 20 वर्षों में आदिवासी समुदायों के अधिकारों की स्थिति में कितना वास्तविक बदलाव आया.
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