मुंडारी भाषा और साहित्य को दर्ज करने से लेकर आदिवासी संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और झारखंडी अस्मिता पर लेखन तक रामदयाल मुंडा ने अपना पूरा जीवन आदिवासी समाज की आवाज को मजबूत करने में लगाया. उन्होंने मुंडारी व्याकरण और लोकगीतों पर काम किया, किताबें लिखीं और अनुवाद किए, झारखंड की भाषाओं को विश्वविद्यालय में जगह दिलाई और आदिवासी संस्कृति को सोवियत संघ, फिलीपींस, चीन और जापान तक लेकर गए. बाद में संयुक्त राष्ट्र के आदिवासी मंचों तक पहुंचे. लेकिन इस सार्वजनिक जीवन के पीछे उनकी निजी जिंदगी भी कम दिलचस्प नहीं थी. अमेरिका में पढ़ाई के दौरान प्रेम और विवाह हुआ, रिश्ता टूटा, फिर झारखंड लौटकर दूसरा परिवार बसाया. साल 23 अगस्त 1939 को तमाड़ के दिउड़ी गांव में जन्मे रामदयाल मुंडा की जिंदगी को इसलिए सिर्फ एक विद्वान, भाषाविद् या झारखंड आंदोलन के बौद्धिक चेहरे के रूप में देखना अधूरा होगा.
दिउड़ी से रांची और फिर शिकागो
रामदयाल मुंडा की शुरुआती पढ़ाई अमलेसा के लूथर मिशन स्कूल और खूंटी में हुई. इसके बाद उन्होंने रांची विश्वविद्यालय से 1963 में एंथ्रोपोलॉजी में एमए किया. आदिवासी समाज, भाषा और संस्कृति को समझने की उनकी रुचि उन्हें अमेरिका ले गई, जहां उन्होंने शिकागो विश्वविद्यालय में Norman Zide के मार्गदर्शन में ऑस्ट्रो-एशियाई भाषाओं के Indic समूह पर शोध किया और पीएचडी पूरी की. बाद में वे वहीं South Asian Studies में अध्यापन से जुड़े.
शिकागो का दौर उनके जीवन में केवल अकादमिक उपलब्धियों का दौर नहीं था. यहीं उनकी मुलाकात अमेरिकी नागरिक हेजेल एन्न लुत्ज से हुई. दोनों के बीच दोस्ती और फिर प्रेम हुआ. 1972 में दोनों ने शादी की. लेकिन बाद में यह रिश्ता टूट गया. इसके बावजूद हेजेल और रामदयाल के बीच पूरी तरह कटुता नहीं आई. आगे चलकर उनके बेटे गुंजल इकिर मुंडा ने हेजेल को बड़ी मां के रूप में स्वीकार किया और दोनों परिवारों के बीच संपर्क बना रहा.
अमेरिका में पढ़ाई के साथ शुरू हुआ लेखन
शिकागो में रहते हुए रामदयाल मुंडा ने मुंडारी भाषा और पारंपरिक गीतों पर गंभीर शोध शुरू किया. 1966 में Norman Zide के साथ उनके मुंडारी गीतों पर शोध का प्रकाशन हुआ. 1967 में उनकी दो महत्वपूर्ण कृतियां हिसिर और सेलेद सामने आईं. हिसिर आधुनिक मुंडारी गीतों से जुड़ी थी, जबकि सेलेद में मुंडारी, नागपुरी और हिंदी की कविताएं शामिल थीं.
उनका लेखन सिर्फ मौलिक रचनाओं तक सीमित नहीं था. उन्होंने संस्कृत, हिंदी और बांग्ला की कई महत्वपूर्ण रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया. इनमें Ocean of Laughter, Kalyani, Holy Man from Jamaniya, Dhruva Swamini, Titli और दिनकर की Rashmirathi का अंग्रेजी अनुवाद शामिल है. महाश्वेता देवी की Birsa Munda का उन्होंने हिंदी अनुवाद भी किया.
मुंडारी व्याकरण से लेकर गीत और कहानियों तक
साल 1970 और 1980 के दशक में उनके लेखन का दायरा लगातार बढ़ता गया. 1974 में मुंडारी गीतकार, श्री बुदु बाबू और उनकी रचनाएं, 1975 में उनकी पीएचडी थीसिस Structural Features of the Vaishnav Songs of Pargana Bangali, 1978 में कुछ नए नागपुरी गीत, 1979 में मुंडारी व्याकरण, 1980 में ईए नवा कानिको और नदी और उसके संबंधी तथा अन्य नगगीत, तथा 1981 में Language of Poetry प्रकाशित हुईं.
यानी उनकी किताबों का सफर भी उनके जीवन की तरह बदलता गया. शुरुआत में केंद्र था भाषा और लोकगीत, फिर साहित्य और संस्कृति, और आगे चलकर विषय पहुंचा आदिवासी अस्तित्व, अस्मिता और झारखंड तक.
अमेरिका से लौटे तो काम का केंद्र बना झारखंड
अमेरिका में अकादमिक जीवन बिताने के बाद जब वे झारखंड लौटे तो उनका काम केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहा. रांची विश्वविद्यालय में Tribal and Regional Languages Department को विकसित करने में उनकी अहम भूमिका रही. बाद में वे रांची विश्वविद्यालय के कुलपति बने. विश्वविद्यालय का यह विभाग झारखंड की भाषाओं और सांस्कृतिक पहचान के अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र बना.
यही दौर था जब रामदयाल मुंडा का संबंध झारखंड आंदोलन के बौद्धिक पक्ष से गहरा हुआ. आदिवासी समाज की भाषा और संस्कृति को बचाने का सवाल धीरे-धीरे राजनीतिक पहचान और अलग राज्य की मांग से जुड़ता गया.
साल 1985 में उनकी वापसी, पुनर्मिलन और अन्य नगगीत प्रकाशित हुई. 1986 में वे All Jharkhand Students Union के संविधान तैयार करने से जुड़े और आगे झारखंड आंदोलन के व्यापक समन्वय की प्रक्रिया में भी उनकी भूमिका रही.
किताबों से निकलकर दुनिया के मंच तक
रामदयाल मुंडा की खासियत यह थी कि वे आदिवासी संस्कृति पर सिर्फ लिखते नहीं थे, बल्कि उसे मंच पर लेकर भी जाते थे.
अमेरिका में छात्र और शिक्षक रहते हुए ही उन्होंने भारतीय छात्रों और दक्षिण एशियाई लोक कलाकारों का एक समूह तैयार किया था, जिसने 1960 के दशक के आखिर में अमेरिका के विभिन्न शहरों में कार्यक्रम किए. इसके बाद उनके सांस्कृतिक सफर ने अंतरराष्ट्रीय रूप ले लिया. साल 1987 में वे Festival of India के लिए भारतीय सांस्कृतिक दल के साथ सोवियत संघ गए. उस समय वे रांची विश्वविद्यालय के कुलपति थे. दो साल बाद 1989 में उन्होंने अपने दल के साथ फिलीपींस, चीन और जापान की यात्रा की.
इन यात्राओं का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम करना नहीं था. वे मुंडारी और झारखंडी आदिवासी संगीत, नृत्य और परंपरा को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने ले जा रहे थे.
झारखंड को मोटरसाइकिल से भी देखा, आदिवासी पहचान का सवाल किताबों में आया
रामदयाल मुंडा का सफर केवल विदेशों तक नहीं था. उन्होंने अपने मित्र बीपी केसरी के साथ मोटरसाइकिल से झारखंड का भ्रमण भी किया. इस यात्रा का उल्लेख बीपी केसरी के यात्रा संस्मरण मैं झारखंड में हूं में मिलता है. यानी जिस व्यक्ति ने शिकागो, सोवियत संघ, चीन और जापान की यात्रा की, उसने अपने ही झारखंड को भी सड़क पर घूमकर करीब से समझने की कोशिश की.
साल 1990 के दशक में उनका लेखन और सार्वजनिक काम आदिवासी अधिकार तथा झारखंडी अस्मिता की तरफ और स्पष्ट रूप से मुड़ा. इसी बौद्धिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव उनकी चर्चित पुस्तक आदि धर्म है. आदि धर्म में उन्होंने आदिवासी धार्मिक विश्वासों और उस सांस्कृतिक विरासत को समझने की कोशिश की, जिसे मुख्यधारा के धार्मिक ढांचे में अलग पहचान नहीं मिल पाती थी. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित संस्करण 452 पृष्ठों का है. बाद के प्रकाशनों में भी आदि धर्म को आदिवासियों की धार्मिक पहचान और उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के पुनर्निर्माण से जुड़ी महत्वपूर्ण कृति बताया गया है.
निजी जिंदगी में एक रिश्ता टूटा, दूसरा परिवार बना
झारखंड के लिए काम करने वाले इस विद्वान की निजी जिंदगी भी उतनी ही उतार-चढ़ाव वाली थी. अमेरिका में हेजेल से प्रेम और विवाह के बाद उनका रिश्ता टूट गया. भारत लौटने के बाद उन्होंने अमिता मुंडा से दूसरा विवाह किया. दोनों का बेटा गुंजल इकिर मुंडा हुआ.
दिलचस्प यह रहा कि पहली पत्नी हेजेल पूरी तरह उनके जीवन से गायब नहीं हुईं. गुंजल उनसे संपर्क में रहे और उन्हें बड़ी मां के रूप में देखते रहे. बाद के वर्षों में हेजेल झारखंड भी आती रहीं और परिवार से मिलती रहीं. इस तरह एक टूटे हुए वैवाहिक रिश्ते के बावजूद व्यक्तिगत सम्मान और आत्मीयता बची रही.
साल 2017 में फिल्मकार बीजू टोप्पो और मेघनाथ ने रामदयाल मुंडा के जीवन पर नाची से बांची — Those Who Dance Will Survive नाम से डॉक्यूमेंट्री बनाई. इस फिल्म में उनके जीवन, संगीत, परिवार और सांस्कृतिक काम को सामने लाया गया.
संयुक्त राष्ट्र तक पहुंची झारखंड की आवाज
रामदयाल मुंडा का काम आगे चलकर भारत से बाहर आदिवासी अधिकारों के अंतरराष्ट्रीय विमर्श से भी जुड़ा. वे UN Working Group on Indigenous Peoples, Geneva और UN Forum on Indigenous Issues, New York से जुड़े काम में सक्रिय रहे.
इस तरह उनकी यात्रा का दायरा लगातार फैलता गया—दिउड़ी के एक गांव से रांची, रांची से शिकागो, फिर अमेरिका के विश्वविद्यालयों से झारखंड, और झारखंड से सोवियत संघ, चीन, जापान तथा संयुक्त राष्ट्र के मंच तक.
आखिरी दौर तक संस्कृति से रिश्ता
साल 1999 में सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका काम रुका नहीं. वे आदिवासी संस्कृति और सांस्कृतिक लामबंदी से जुड़े रहे. उन्हें 2007 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2010 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे.
रामदयाल मुंडा का निधन 30 सितंबर 2011 को रांची में हुआ. लेकिन उनकी विरासत केवल पुरस्कारों या राजनीतिक पदों में नहीं है. उनकी किताबें आज भी मुंडारी भाषा, आदिवासी संस्कृति और झारखंडी अस्मिता को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं. हिसिर जैसी कृतियां लोकगीतों को दर्ज करती हैं, मुंडारी व्याकरण भाषा को अकादमिक आधार देती है और आदि धर्म आदिवासी धार्मिक पहचान के सवाल को सामने रखती है.
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