रांची. झारखंड हाईकोर्ट ने 31 साल पुराने रिश्वत के एक मामले में 75 साल के पूर्व रेलवे कर्मचारी की दोषसिद्धि बरकरार रखी है. मामला महज 100 की रिश्वत का है, लेकिन इसकी कानूनी लड़ाई तीन दशक से ज्यादा समय तक चली. अदालत ने दोषी की उम्र, मामले के लंबे समय तक लंबित रहने और रेलवे की नौकरी से बर्खास्त किए जाने समेत दूसरी परिस्थितियों को देखते हुए उसकी जेल की सजा कम कर दी.
मोटरसाइकिल भेजने के लिए मांगे थे 100 रुपये
मामला अप्रैल 1995 का है. उस समय काली शंकर धोबी हटिया रेलवे स्टेशन पर पार्सल क्लर्क के तौर पर काम करते थे. निर्मल कुमार बेंगानी अपनी मोटरसाइकिल हटिया से समस्तीपुर भेजना चाहते थे.
अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, मोटरसाइकिल भेजने की तय फीस 203 थी. आरोप है कि काली शंकर ने इसके अलावा 100 की मांग की. शिकायतकर्ता का आरोप था कि यह रकम दिए बिना मोटरसाइकिल की बुकिंग नहीं की जा रही थी. इसके बाद उन्होंने सीबीआई में शिकायत कर दी.
100 के नोट पर पाउडर लगाकर पहुंची थी सीबीआई
शिकायत की जांच के बाद सीबीआई ने ट्रैप की तैयारी की. शिकायतकर्ता को 100 का नोट दिया गया और उस पर phenolphthalein पाउडर लगाया गया. नोट का नंबर भी पहले से दर्ज कर लिया गया था.
शिकायतकर्ता को निर्देश दिया गया कि वह रकम तभी दे, जब आरोपी उसकी मांग करे. इसके बाद सीबीआई की टीम की मौजूदगी में वह पार्सल ऑफिस पहुंचा.
सरकारी वकील के मुताबिक, काली शंकर ने 100 मांगे. रकम मिलने के बाद उन्होंने नोट को टेबल के ड्रॉअर में रख दिया. तय इशारा मिलते ही सीबीआई की टीम ने कार्रवाई की और ड्रॉअर से वही नोट बरामद कर लिया. आरोपी के हाथों का केमिकल टेस्ट भी कराया गया, जिसका परिणाम अभियोजन के पक्ष में आया.
बचाव पक्ष ने कहा- रिश्वत नहीं, अतिरिक्त शुल्क था
मामले की सुनवाई के दौरान काली शंकर की ओर से कहा गया कि 100 को रिश्वत नहीं माना जा सकता. उनका तर्क था कि यह रकम अतिरिक्त शुल्क के तौर पर ली गई थी. बचाव पक्ष ने गवाहों के बयानों में अंतर और सीबीआई की कार्रवाई से जुड़े कई पहलुओं पर भी सवाल उठाए.
लेकिन हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि मोटरसाइकिल की तय बुकिंग फीस 203 थी. इसके अलावा 100 लेने का कोई वैध आधार रिकॉर्ड में सामने नहीं आया.
कोर्ट ने माना कि सरकारी पक्ष ने यह साबित किया है कि रकम की मांग की गई थी और उसे स्वीकार भी किया गया था. ऐसे में सिर्फ उसे ‘अतिरिक्त शुल्क’ कह देने से वह वैध शुल्क नहीं बन जाता.
इस मामले में CBI की विशेष अदालत ने 28 मई 2004 को काली शंकर धोबी को भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत दोषी ठहराया था. उन्हें एक मामले में एक साल और दूसरे मामले में डेढ़ साल की कठोर कैद की सजा सुनाई गई थी. दोनों सजाएं एक साथ चलनी थीं. साथ ही कुल 10,000 का जुर्माना भी लगाया गया था. काली शंकर ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. उनकी अपील वर्ष 2004 से लंबित थी.
22 साल बाद हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला
करीब 22 साल बाद हाईकोर्ट ने 10 सितंबर 2026 को इस अपील पर फैसला सुनाया. अदालत ने ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि में कोई बदलाव नहीं किया. हालांकि सजा की अवधि कम कर दी गई. एक साल की सजा को घटाकर छह महीने और डेढ़ साल की सजा को घटाकर एक साल कर दिया गया. दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी. जुर्माने की रकम में कोई बदलाव नहीं किया गया.
सजा कम करते हुए हाईकोर्ट ने काली शंकर की उम्र को खास तौर पर ध्यान में रखा. वह अब 75 साल से अधिक उम्र के हैं. अदालत ने मामले के 31 साल पुराने होने और अपील के लंबे समय तक लंबित रहने को भी देखा. इसके अलावा काली शंकर को रेलवे की नौकरी से बर्खास्त किया जा चुका है. अदालत के सामने उनकी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का भी जिक्र हुआ. इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने जेल की सजा कम कर दी, लेकिन रिश्वत के मामले में उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा.
हाईकोर्ट ने काली शंकर का जमानत बांड रद्द कर दिया है. उन्हें फैसले की तारीख से दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया गया है. ऐसा नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट को उनके खिलाफ जरूरी कानूनी कार्रवाई करने को कहा गया है.
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