किसी बच्चे का पहली बार अपना नाम लिखना सिर्फ कुछ अक्षरों को कागज पर उतारना नहीं होता. यह उसके आत्मविश्वास की पहली सीढ़ी होती है. किसी मां का अपने बच्चे की किताब खुद पढ़ पाना, किसी मजदूर का बैंक में बिना किसी मदद के फॉर्म भरना या किसी बुजुर्ग का अस्पताल की पर्ची समझ लेना, ये छोटी दिखने वाली बातें असल में आत्मनिर्भरता की बड़ी तस्वीर हैं. लेकिन दुनिया में आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिनके लिए पढ़ना-लिखना आसान नहीं है. यही वजह है कि साक्षरता को सिर्फ शिक्षा नहीं, बल्कि सम्मान, अधिकार और बेहतर जिंदगी से जोड़कर देखा जाता है.
हर साल 8 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है. वर्ष 2026 इस लिहाज से खास है, क्योंकि इस साल इस दिवस की 60वीं वर्षगांठ है. छह दशक पहले शुरू हुई यह पहल आज भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि दुनिया में शिक्षा का दायरा बढ़ने के बावजूद करोड़ों बच्चे, युवा और वयस्क बुनियादी साक्षरता से दूर हैं.
8 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस
अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस की शुरुआत 1966 में हुई थी. यूनेस्को ने 1966 में 8 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के तौर पर मनाने की घोषणा की थी. इसके बाद हर साल दुनिया भर में इस दिन साक्षरता के महत्व को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.
इस दिवस का उद्देश्य केवल लोगों को पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करना नहीं है. इसका बड़ा लक्ष्य ऐसी दुनिया बनाना है, जहां हर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान तक पहुंच हासिल कर सके और अपने अधिकारों एवं जिम्मेदारियों को समझते हुए समाज में सम्मान के साथ जीवन जी सके.
2026 की थीम में छिपा है बड़ा संदेश
अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस 2026 की थीम है, “Literacy for people, the planet and prosperity”, यानी “लोगों, पृथ्वी और समृद्धि के लिए साक्षरता.” इस बार की थीम साक्षरता को सिर्फ किताब पढ़ने और लिखने की क्षमता से आगे ले जाती है. इसका संबंध व्यक्ति की बेहतर जिंदगी, सामाजिक समावेशन, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और आर्थिक अवसरों से भी है.
आज जब दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है, साक्षरता का अर्थ भी बदल रहा है. मोबाइल पर आया जरूरी मैसेज पढ़ना, ऑनलाइन फॉर्म भरना, बैंकिंग करना, सरकारी योजनाओं की जानकारी हासिल करना और इंटरनेट पर सही-गलत जानकारी के बीच फर्क करना भी आधुनिक साक्षरता का हिस्सा बन चुका है.
भारत में साक्षरता दर में लगातार सुधार हुआ है. हालिया PLFS 2023-24 के अनुसार, 7 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी में देश की कुल साक्षरता दर 80.9% है. वहीं, NSO के 2018 के आंकड़ों में यह दर 77.5% थी. PLFS के मुताबिक शहरी क्षेत्रों में साक्षरता दर 88.9%, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 77.5% है. इसी तरह पुरुषों की साक्षरता दर 87.2% और महिलाओं की 74.6% है, यानी पुरुषों और महिलाओं के बीच करीब 12.6 %अंक का अंतर अब भी बना हुआ है. आंकड़े बताते हैं कि देश में साक्षरता बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण-शहरी और महिला-पुरुष के बीच मौजूद अंतर को कम करना अभी भी बड़ी चुनौती है.
झारखंड में बढ़ी साक्षरता, अंतर अब भी बरकरार
State Economic Survey के मुताबिक झारखंड में पिछले पांच वर्षों में महिलाओं की साक्षरता दर पुरुषों की तुलना में तेज गति से बढ़ी है. 2019-20 में राज्य में 81.4 %vपुरुष और 64.1 % महिलाएं साक्षर थीं, जो 2023-24 में बढ़कर क्रमशः 82.8 % और 70.6 % हो गई. इस दौरान पुरुष साक्षरता में औसतन 0.47 % सालाना की वृद्धि हुई, जबकि महिलाओं की साक्षरता दर 2.5 % की औसत वार्षिक दर से बढ़ी. वहीं, Gender Disparity Index 2019-20 के 0.79 से बढ़कर 2023-24 में 0.85 हो गया, जो राष्ट्रीय स्तर के 0.86 के करीब है. हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि महिला साक्षरता में तेजी से सुधार के बावजूद राज्य में महिला और पुरुष साक्षरता के बीच अंतर अभी भी बना हुआ है.
साक्षरता में कौन आगे, कौन पीछे?
टॉप 5
- मिजोरम – 98.2% देश में सबसे ज्यादा साक्षरता दर.
- लक्षद्वीप – 97.3% 97% से ज्यादा आबादी साक्षर.
- नागालैंड – 97.2% टॉप राज्यों में शामिल.
- केरल – 95.3% लंबे समय से शिक्षा के मामले में मजबूत प्रदर्शन.
- मेघालय – 94.2% पूर्वोत्तर का एक और राज्य टॉप सूची में.
सबसे पीछे रहने वाले राज्य
- आंध्र प्रदेश – 72.6% राज्यों में सबसे कम साक्षरता दर.
- बिहार – 74.3% राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे.
- मध्य प्रदेश – 75.2% साक्षरता के मामले में सुधार की गुंजाइश.
- राजस्थान – 75.8% खासकर ग्रामीण और महिला साक्षरता चुनौती.
- झारखंड – 76.7% राष्ट्रीय औसत 80.9% से नीचे.
73.9 करोड़ लोग आज भी बुनियादी साक्षरता से दूर
साक्षरता को लेकर दुनिया ने लंबा सफर तय किया है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है. यूनेस्को के अनुसार 2024 में दुनिया भर में कम से कम 73.9 करोड़ युवा और वयस्क ऐसे थे, जिनके पास बुनियादी साक्षरता कौशल नहीं था. यानी इतने बड़े लोगों की आबादी आज भी पढ़ने और लिखने की उस क्षमता से दूर है, जिसे आधुनिक जीवन के लिए बुनियादी माना जाता है.
चिंता सिर्फ वयस्कों तक सीमित नहीं है. दुनिया में करीब 10 में से 4 बच्चे पढ़ने में न्यूनतम दक्षता हासिल नहीं कर पा रहे हैं. वहीं 2023 में करीब 27.2 करोड़ बच्चे और किशोर स्कूल से बाहर थे. ये आंकड़े एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं. क्या सिर्फ स्कूलों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त है? जवाब है नहीं. बच्चों का स्कूल पहुंचना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और वे वास्तव में पढ़ने-समझने की क्षमता हासिल कर सकें.
भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन
भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की शुरुआत 5 मई 1988 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा एक सामाजिक अभियान के रूप में की गई थी तथा इसका प्राथमिक लक्ष्य 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग के निरक्षर व्यक्तियों को कार्यात्मक साक्षरता प्रदान कर आत्मनिर्भर बनाना था, जिसमें लाखों स्वयंसेवकों को जोड़कर इसे जन-आंदोलन का रूप दिया गया. इसने न केवल अक्षर ज्ञान और बुनियादी गणित सिखाया, बल्कि महिलाओं और वंचित वर्गों में अधिकारों व स्वास्थ्य के प्रति सजगता भी बढ़ाई. बहरहाल, यहां यह उल्लेखनीय है कि भारत में ‘राष्ट्रीय साक्षरता मिशन’ (1988) से लेकर वर्तमान ‘उल्लास – नव भारत साक्षरता कार्यक्रम’ 2022–2027 के माध्यम से 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के गैर-साक्षरों को बुनियादी साक्षरता और जीवन कौशल से जोड़ा जा रहा है. भारत के संदर्भ में दिलचस्प बात है कि 4 फरवरी 1990 को केरल का एर्नाकुलम भारत का पहला 100% पूर्ण साक्षर जिला घोषित किया गया था तथा इस अभियान का नेतृत्व तत्कालीन कलेक्टर के.आर. राजन ने किया था, जिसमें 20,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर 1.75 लाख निरक्षर वयस्कों को अक्षर ज्ञान दिया था.
साक्षरता मतलब सिर्फ अक्षर पहचानना नहीं
साक्षरता को अक्सर पढ़ने और लिखने की क्षमता तक सीमित कर दिया जाता है. लेकिन इसका दायरा इससे कहीं बड़ा है. एक साक्षर व्यक्ति किसी सरकारी योजना का फॉर्म खुद पढ़ सकता है. बैंक में अपने पैसे का हिसाब समझ सकता है. स्वास्थ्य संबंधी जरूरी निर्देश पढ़ सकता है. नौकरी के अवसर तलाश सकता है और अपने अधिकारों को समझ सकता है.
यानी साक्षरता व्यक्ति को किसी दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय अपने फैसले खुद लेने की क्षमता देती है. इसीलिए साक्षरता को दूसरे मानवाधिकारों तक पहुंचने का रास्ता भी माना जाता है. शिक्षा व्यक्ति में आत्मविश्वास पैदा करती है और उसे समाज में अपनी आवाज उठाने की ताकत देती है.
जब एक महिला पढ़ती है तो पूरा परिवार बदलता है
साक्षरता की सबसे बड़ी ताकत तब दिखाई देती है, जब शिक्षा महिलाओं और लड़कियों तक पहुंचती है. एक शिक्षित महिला अपने स्वास्थ्य, बच्चों की शिक्षा, पोषण और परिवार के भविष्य को लेकर बेहतर फैसले ले सकती है. वह सरकारी योजनाओं और रोजगार के अवसरों को समझ सकती है और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सकती है.
इसीलिए दुनिया में साक्षरता अभियान के केंद्र में लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाता है. पुराने वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक करीब 77.5 करोड़ युवा साक्षरता की कमी से प्रभावित थे और इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की थी. यह असमानता बताती है कि साक्षरता की लड़ाई सिर्फ स्कूल खोलने की नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को दूर करने की भी है.
60वीं वर्षगांठ पर मेक्सिको में वैश्विक समारोह
अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की 60वीं वर्षगांठ के मौके पर यूनेस्को की ओर से खास कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. 8 और 9 सितंबर 2026 को मेक्सिको में वैश्विक साक्षरता समारोह आयोजित होगा. इसका आयोजन यूनेस्को, मेक्सिको सरकार के सहयोग से करेगा. इस दौरान दुनिया के बेहतरीन साक्षरता कार्यक्रमों को सम्मानित करने के लिए यूनेस्को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता पुरस्कार भी दिए जाएंगे. इस आयोजन का मकसद पिछले छह दशकों में साक्षरता के क्षेत्र में हुई प्रगति का आकलन करना और भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा करना है.
छह दशक बाद भी अधूरी है कहानी
1966 से लेकर 2026 तक अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस की यात्रा छह दशक पूरी कर चुकी है. इस दौरान दुनिया ने शिक्षा के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल कीं. लेकिन करोड़ों लोगों का अब भी साक्षरता से दूर होना बताता है कि मंजिल अभी बाकी है. साक्षरता किसी व्यक्ति को सिर्फ शब्द पढ़ना नहीं सिखाती. यह उसे अपनी जिंदगी पढ़ना सिखाती है.
साक्षरता केवल हस्ताक्षर करने का ही नाम नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा, आत्मनिर्णय और सामाजिक चेतना की कुंजी है. वास्तव में, शिक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक बुनियादी मानवाधिकार है, जो व्यक्ति को अपने अधिकारों, स्वास्थ्य और आजीविका के प्रति सजग बनाता है. आज के तकनीकी युग में साक्षरता का दायरा बुनियादी अक्षर ज्ञान से आगे बढ़कर डिजिटल, वित्तीय और कार्यात्मक दक्षता तक फैल चुका है. जब तक समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति-विशेषकर महिलाओं और वंचित वर्गों तक ज्ञान और सूचना की सहज पहुँच नहीं बनती, तब तक एक समानता, आत्मनिर्भर और सशक्त राष्ट्र की कल्पना अधूरी ही रहेगी।

