मुंबई, 8 सितंबर। बॉम्बे हाई कोर्ट ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बड़ा झटका दिया है. कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “चोरों का सरदार” और “कमांडर-इन-थीफ” कहने से जुड़े आपराधिक मानहानि केस को रद्द करने की मांग की थी. जस्टिस नितिन बोरकर की सिंगल बेंच ने मंगलवार, 8 सितंबर को यह आदेश सुनाया और मैजिस्ट्रेट कोर्ट के समन आदेश में कोई गड़बड़ी नहीं मानी. इसका मतलब है कि राहुल गांधी के खिलाफ चल रहा यह मुकदमा अब आगे बढ़ेगा.
बयान कब और कहां दिया गया?
यह बयान 20 सितंबर 2018 को दिया गया था. राहुल गांधी उस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष थे और राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले प्रचार पर निकले थे. वह डूंगरपुर जिले के आदिवासी-बहुल इलाके सागवाड़ा पहुंचे और भीखा भाई कॉलेज ग्राउंड में एक बड़ी रैली को संबोधित किया, जहां साथ में सचिन पायलट और अशोक गहलोत भी मौजूद थे. इसी रैली में उन्होंने राफेल डील और मोदी सरकार की चुप्पी पर हमला बोलते हुए मोदी को “चोरों का सरदार” और “कमांडर-इन-थीफ” कहा. यह पूरा बयान उनके “चौकीदार चोर है” कैंपेन का हिस्सा था, जो उन्होंने 2018-19 में राफेल डील में कथित अनियमितता को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ चलाया था.
केस कैसे फाइल हुआ?
इस बयान के खिलाफ बीजेपी कार्यकर्ता महेश हुकुमचंद शृषिरीमल ने मुंबई के गिरगांव मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट कोर्ट में मानहानि की शिकायत दर्ज कराई. शृषिरीमल खुद को बीजेपी महाराष्ट्र प्रदेश कमेटी का सदस्य बताते हैं. मैजिस्ट्रेट कोर्ट ने शिकायत और सबूतों पर विचार करने के बाद 28 अगस्त 2019 को राहुल गांधी के नाम समन जारी किया. राहुल गांधी ने अपनी याचिका में दावा किया कि उन्हें इस बुलावे के बारे में जुलाई 2021 में पता चला, जिसके बाद उन्होंने इसे रद्द करने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया.
कोर्ट में मामला कैसे आगे बढ़ा?
नवंबर 2021 में हाई कोर्ट ने मैजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि इस मामले की सुनवाई टाली जाए, यानी राहुल गांधी को कोर्ट में पेश होने से अंतरिम राहत मिल गई. इसके बाद यह राहत कई बार बढ़ाई गई, 5 दिसंबर 2022 को हाई कोर्ट ने इस राहत को 25 जनवरी 2023 तक के लिए बढ़ाया था. मामला सालों तक हाई कोर्ट में लंबित रहा. फरवरी 2026 में जस्टिस एन.आर. बोरकर की बेंच ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था और कहा था कि पहले से मिली अंतरिम राहत जारी रहेगी. आखिरकार 8 सितंबर 2026 को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया.
कोर्ट में क्या दलीलें दी गई
राहुल गांधी का पक्ष था कि उन्होंने अपने बयान में बीजेपी का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया था, इसलिए बिना किसी “पहचान योग्य और तय समूह” को निशाना बनाए मानहानि का मुकदमा नहीं बनता. महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल डॉ. मिलिंद साठे ने शृषिरीमल की तरफ से दलील दी कि कानून किसी भी “पीड़ित व्यक्ति” को मुकदमा शुरू करने की इजाजत देता है, बशर्ते वह साबित कर सके कि टिप्पणी किसी तय समूह पर की गई थी. कोर्ट ने राहुल गांधी की दलील खारिज करते हुए कहा कि बीजेपी एक रजिस्टर्ड राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी है, इसलिए वह स्पष्ट रूप से एक पहचान योग्य संस्था है. जस्टिस बोरकर ने कहा कि प्रधानमंत्री, जो बीजेपी के सदस्य हैं, को “कमांडर-इन-थीफ” कहना सिर्फ पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक सीमित टिप्पणी नहीं मानी जा सकती. यह टिप्पणी पार्टी के सामान्य कार्यकर्ताओं पर भी असर डालती है या नहीं, यह पहलू ट्रायल के दौरान तय होगा.
आगे क्या होगा?
हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करने के साथ ही राहुल गांधी को छह हफ्ते की मोहलत दी है, ताकि वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकें. इस दौरान उन्हें मैजिस्ट्रेट कोर्ट में व्यक्तिगत तौर पर पेश होने से छूट रहेगी.
यह पूरा विवाद उस “चौकीदार चोर है” कैंपेन से जुड़ा है, जिसे लेकर 2019 में सुप्रीम कोर्ट में भी अवमानना का मामला चल चुका है, जब बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने अपने बयान को गलत तरीके से सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जोड़ा. उस मामले में राहुल गांधी को कोर्ट में माफी मांगनी पड़ी थी.

