इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में ‘गुंडा एक्ट’ के इस्तेमाल के तरीके पर कड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि उसके सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनसे लगता है कि राज्य सरकार इस कानून का इस्तेमाल लोगों पर दबाव बनाने और उन्हें परेशान करने के लिए कर रही है.
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने गोंडा निवासी ज़ाहिद अली के खिलाफ जारी किए गए दो आदेशों को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की. इन आदेशों के तहत ज़ाहिद अली को ‘उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ गुंडाज़ एक्ट, 1970’ के तहत ‘गुंडा’ घोषित किया गया था. साथ ही उसे छह महीने के लिए गोंडा जिले की सीमा से बाहर रहने का निर्देश दिया गया था.
बेहद सावधानी से हो कानून का इस्तेमाल
हाईकोर्ट ने कहा कि गुंडा एक्ट का उद्देश्य ऐसे लोगों पर नियंत्रण करना है, जिनकी गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही हो. यह कानून एक प्रभावी हथियार जरूर है, लेकिन इसका इस्तेमाल केवल स्पष्ट और गंभीर मामलों में ही बेहद सावधानी के साथ किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि इस कानून को किसी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ दमन के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. किसी व्यक्ति को गंभीर अपराध में दोषी ठहराए बिना उसे इस कानून के जरिए सजा देने की कोशिश नहीं होनी चाहिए.
कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके सामने कई ऐसे मामले लगातार पहुंच रहे हैं, जो बताते हैं कि राज्य सरकार गुंडा एक्ट को दमन के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की अपनी नीति से पीछे नहीं हट रही है. अदालत के मुताबिक, ज़ाहिद अली का मामला कानून के गलत इस्तेमाल का एक बड़ा उदाहरण है.
दो पुराने मामलों के आधार पर हुई कार्रवाई
मामला ज़ाहिद अली से जुड़ा है, जिन्होंने गोंडा के जिला मजिस्ट्रेट के 11 मई 2026 के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. इस आदेश में उन्हें गुंडा एक्ट की धारा 3(1) के तहत ‘गुंडा’ घोषित करते हुए छह महीने के लिए गोंडा जिले से बाहर रहने का आदेश दिया गया था.
इसके अलावा उन्होंने देवीपाटन मंडल के कमिश्नर की ओर से 12 अगस्त 2026 को पारित आदेश को भी चुनौती दी. कमिश्नर ने गुंडा एक्ट की धारा 6 के तहत ज़ाहिद अली की अपील खारिज कर दी थी.
जिला मजिस्ट्रेट का आदेश ज़ाहिद अली के खिलाफ दर्ज दो आपराधिक मामलों और एक ‘बीट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट’ के आधार पर जारी किया गया था. इनमें से एक मामला 2010 का था, जबकि दूसरा 2020 में दर्ज हुआ था.
हालांकि, 2010 के मामले में गोंडा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 26 अगस्त 2017 को ज़ाहिद अली को बरी कर दिया था.
हाईकोर्ट ने दोनों आदेश किए रद्द
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि ज़ाहिद अली को गुंडा घोषित करने और उन्हें छह महीने के लिए जिले से बाहर भेजने का जिला मजिस्ट्रेट का आदेश कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरता.
अदालत ने कमिश्नर की ओर से अपील खारिज करने के आदेश को भी सही नहीं माना. हाईकोर्ट ने दोनों आदेशों को रद्द कर दिया और ज़ाहिद अली की रिट याचिका स्वीकार कर ली.
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