Jamshedpur : डायन प्रथा जैसी कुरीति के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले समाजसेवी प्रेमचंद का निधन हो गया। वे जमशेदपुर के सोनारी इलाके में रहते थे। उन्होंने टाटा मुख्य अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनकी उम्र लगभग 70 साल थी। उनके जाने से सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों में गहरा शोक व्याप्त है। प्रेमचंद जी ने अपना पूरा जीवन समाज की बेहतरी और अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए बिताया। वे खासकर डायन प्रथा को खत्म करने के लिए किए गए संघर्ष के लिए जाने जाते हैं।
डायन प्रथा के खिलाफ संघर्ष और कानून
प्रेमचंद जी ने सोनारी में फ्री लीगल एड कमेटी का गठन किया और कोल्हान में उन महिलाओं की मदद शुरू की, जो डायन बिसाही के झूठे आरोप झेल रही थीं। उन्होंने इन महिलाओं के पुनर्वास और न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़ी।
उनके प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि अविभाजित बिहार सरकार ने डायन प्रथा के खिलाफ कानून लागू किया। यह देश की पहली सरकार थी, जिसने इस प्रथा पर रोक लगाने वाला कानून बनाया। इसके बाद छह अन्य राज्यों में भी डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम लागू हुआ। प्रेमचंद जी की पहल से अब 57 महिलाएं फ्लैक से जुड़ी हैं और अपने जैसी अन्य महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं। कोलाबिरा पुनर्वास सेंटर में इस दिशा में कई योजनाएं चल रही हैं।
डायन प्रथा के खिलाफ अभियान
1991 में करनडीह में एक महिला को डायन के नाम पर हत्या का शिकार बनाया गया था। उसके बचाव में आए पति और परिवार के एक अन्य सदस्य को भी मार डाला गया। इसी घटना ने प्रेमचंद जी को डायन प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अभियान का नाम रखा “अंधविश्वास उन्मूलन मिशन”। उनका मानना था कि प्रताड़ना तभी रुकेगी, जब कानूनी कार्रवाई का डर हो। इसीलिए उन्होंने सरकार पर दबाव डालने की नीति अपनाई और महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए लगातार संघर्ष किया।
समाज के लिए अमूल्य योगदान
प्रेमचंद जी अविवाहित थे और अपना पूरा जीवन समाज और अन्याय के खिलाफ लड़ाई में समर्पित कर दिया। उनकी मेहनत और संघर्ष ने न केवल डायन प्रथा की बेड़ियां तोड़ीं, बल्कि उन महिलाओं के लिए रास्ता खोला, जो लंबे समय तक अन्याय झेलती रही थीं। उनके योगदान को समाज हमेशा याद रखेगा।
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