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    Home»आदिवासी»बातचीत: दादा-दादी की कहानियों से निकली ‘आंगेन’ ने रचा इतिहास, पहली बार नेशनल अवॉर्ड तक पहुंचा संथाली सिनेमा
    आदिवासी

    बातचीत: दादा-दादी की कहानियों से निकली ‘आंगेन’ ने रचा इतिहास, पहली बार नेशनल अवॉर्ड तक पहुंचा संथाली सिनेमा

    Joharlive NetworkBy Joharlive NetworkJuly 19, 2026Updated:July 19, 2026No Comments5 Mins Read122
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    72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में संथाली सिनेमा ने ऐसा इतिहास रचा है, जिसका इंतजार वर्षों से था. जमशेदपुर के युवा निर्देशक रवि राज मुर्मू की 12 मिनट 10 सेकेंड की संथाली शॉर्ट फिल्म ‘आंगेन’ (अदृश्य) को गैर-फीचर फिल्म कैटेगरी में बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है. यह पहला मौका है, जब किसी संथाली फिल्म को इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया है.

    किसान परिवार से निकलकर पुणे के एफटीआईआई (FTII) तक का सफर तय करने वाले रवि राज मुर्मू ने अपनी पहली स्वतंत्र फिल्म से ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली है. ‘आंगेन’ सिर्फ एक शॉर्ट फिल्म नहीं, बल्कि संथाली लोककथाओं, आदिवासी संस्कृति और लोकविश्वास को बड़े पर्दे पर उतारने की कोशिश है. फिल्म की कहानी एक चरवाहे लड़के सुकू की है, जिससे एक देवी प्रेम करने लगती है और उसे अपने साथ देवलोक ले जाती है. वर्षों बाद जब सुकू को अपने गांव और घर की याद आती है, तो वह वापस लौटता है, लेकिन उसका गांव कहीं नहीं मिलता. वह देवताओं और इंसानों की दुनिया के बीच भटकता रह जाता है. प्रेम, लोकविश्वास, समय और विस्थापन की यह कहानी संथाली समाज की मौखिक परंपराओं से निकली है.

    राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद जोहार लाइव से बातचीत में रवि राज मुर्मू ने फिल्म की प्रेरणा, अपने संघर्ष, संथाली सिनेमा के भविष्य और आने वाली फिल्मों पर खुलकर बात की. पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश—

    सवाल : ‘आंगेन’ नाम कैसे आया?

    रवि राज मुर्मू: बचपन से एक पुरानी संथाली लोककथा सुनते आए हैं. उस कहानी में जो अदृश्य या आध्यात्मिक शक्ति होती है, उसे ‘अंगेन’ कहा जाता है. उसी लोकविश्वास से फिल्म का नाम लिया गया है.

    सवाल : गांव से FTII और फिर राष्ट्रीय पुरस्कार तक का सफर कैसा रहा?

    रवि राज मुर्मू: सफर बहुत दिलचस्प रहा. गांव में जातरा (लोकनाट्य) की मंडलियां होती थीं. उन्हें देखते-देखते बड़ा हुआ. घर में टीवी नहीं था, इसलिए दादा-दादी रोज कहानियां सुनाते थे. वहीं से कहानी सुनने और सुनाने की आदत बनी.

    बाद में गांव में वीसीपी आया तो फिल्में देखने का मौका मिला. तब यह नहीं पता था कि फिल्म बनाना भी एक पेशा हो सकता है. परिवार चाहता था कि मैं इंजीनियर बनूं. इसी बीच 12वीं में फेल हो गया. उसी एक साल ने जिंदगी बदल दी. सोचने का मौका मिला कि वास्तव में करना क्या है.

    मुझे रेडियो सुनने का बहुत शौक था, इसलिए आरजे बनने के लिए इंटरव्यू भी दिया. आवाज की तारीफ हुई, लेकिन उच्चारण सुधारने के लिए 48 हजार रुपये की ट्रेनिंग बताई गई, जो मेरे लिए संभव नहीं थी.

    इसी दौरान शादी-ब्याह की वीडियोग्राफी करने लगा. कैमरे से रिश्ता वहीं से मजबूत हुआ. बाद में करीम सिटी कॉलेज से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई शुरू की. वहीं फिल्म निर्माण के बारे में गंभीरता से समझ आया. फिल्म की तैयारी की और पहली ही कोशिश में FTII में चयन हो गया. टाटा स्टील फाउंडेशन ने मेरी पढ़ाई में आर्थिक सहयोग किया। FTII के बाद मुंबई में अमेजन और नेटफ्लिक्स के साथ काम किया. फिर लगा कि अब अपनी कहानी खुद कहनी चाहिए और वहीं से ‘आंगेन’ की शुरुआत हुई.

    सवाल : क्या ‘आंगेन’ आपकी पहली फिल्म है?

    रवि राज मुर्मू: स्वतंत्र निर्देशक के तौर पर यह मेरी पहली फिल्म है. हालांकि FTII और पढ़ाई के दौरान कई प्रोजेक्ट फिल्में बनाई थीं, लेकिन उन्हें व्यावसायिक फिल्म की श्रेणी में नहीं रखा जाता.

    सवाल : फिल्म बनाते समय सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?

    रवि राज मुर्मू: मैं फिल्म को कभी चुनौती की तरह नहीं देखता. मेरे लिए फिल्म बनाना एक आनंद की प्रक्रिया है. मेरा मानना है कि 100 करोड़ और 10 हजार रुपये में बनी फिल्म में बजट का फर्क जरूर होगा, लेकिन सबसे जरूरी चीज नीयत और कहानी होती है.

    यह फिल्म बहुत बड़े प्लान के साथ नहीं बनी थी. मैं उन दिनों बच्चों को पढ़ाता भी था और शाम को उन्हें फिल्म प्रैक्टिस के लिए लेकर जाता था. उसी दौरान यह फिल्म बनती चली गई. असल में यह एक तरह की पिच फिल्म थी, लेकिन बनते-बनते पूरी फिल्म बन गई.

    सवाल : फिल्म क्या संदेश देती है?

    रवि राज मुर्मू: इस फिल्म की कई परतें हैं. मेरी पहली कोशिश थी कि बचपन में जो लोककथाएं सुनीं, उन्हें पर्दे पर उतार सकूं. दादा-दादी की कहानियां सिर्फ मनोरंजन नहीं होतीं, उनमें समाज, राजनीति और जीवन के गहरे अर्थ छिपे होते हैं. मैंने उसी भावना को फिल्म में दिखाने की कोशिश की है.

    सवाल : राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा के समय सबसे पहला ख्याल क्या आया?

    रवि राज मुर्मू: हर फिल्ममेकर का सपना होता है कि उसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिले. मेरे लिए यह सिर्फ पुरस्कार नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है. अब लोग मुझ पर भरोसा करेंगे कि यह लड़का अच्छी फिल्म बना सकता है. उम्मीद है कि आगे निवेशक भी आसानी से मिलेंगे.

    सबसे बड़ी खुशी इस बात की है कि यह राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली पहली संथाली फिल्म है। यह सिर्फ मेरी नहीं, पूरे संथाली सिनेमा की उपलब्धि है। यह शुरुआत है, मंजिल अभी बहुत दूर है।

    सवाल : आगे किन परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं?

    रवि राज मुर्मू: फिलहाल एक फीचर फिल्म पर काम चल रहा है। उसका दूसरा शेड्यूल प्री-प्रोडक्शन में है। इसके अलावा संथाली समाज के एक ऐसे लोकनायक की कहानी पर भी काम कर रहा हूं, जिसे आदिवासी समाज का ‘रॉबिनहुड’ कहा जा सकता है। महाजनी व्यवस्था के दौर में वह अमीरों से लूटकर गरीबों की मदद करता था। उसी किरदार के इर्द-गिर्द कहानी विकसित की जा रही है।

    सवाल : झारखंड और संथाली भाषा के युवाओं के लिए आपका संदेश?

    रवि राज मुर्मू: अगर आपके मन में फिल्म बनाने का सपना है, तो ज्यादा मत सोचिए, बस शुरुआत कर दीजिए। सोचते-सोचते बहुत समय निकल जाता है। गलतियां होंगी, लेकिन उन्हीं से सीखेंगे। फिल्म बनाने के लिए सिर्फ पैसा नहीं, सबसे ज्यादा हिम्मत की जरूरत होती है। करोड़ों की फिल्मों में भी गलतियां होती हैं। इसलिए पहले फिल्म बनाइए, अच्छी या बुरी है, इसका फैसला बाद में हो जाएगा।

    Also Read : 72th National Film Award : ‘आर्टिकल 370’ बनी सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म, कार्तिक आर्यन और ममूटी को बेस्ट एक्टर

    अंगेन रवि राज मुर्मू संथाली फिल्म
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