मुस्कान चौधरी
क्या बैंक और आम आदमी में कोई रिश्ता है. क्या इन दोनों को रिश्तों के नजरिये से देखा भी जा सकता है? एक बार कोशिश कर के देखते हैं न. दोनों में से एक भी अगल चलायमान है, यह रिश्ता उस अंत तक निभता है. मतलब, बैंक और उसके खाताधारक, अंतिम सांस तक एक दूसरे के लिए बने और बंधे होते हैं. आज की तारीख यानी 19 जुलाई को भारतीय बैंकों के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव नहीं, महत्वपूर्ण मोड़ समझिये. कुछ उलझा हुआ सा लगा? ठीक है, इसे साधारण तरीके से समझते हैं…
क्यों लिया गया राष्ट्रीयकरण का फैसला?
1960 के दशक में देश अनाज संकट, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था. हरित क्रांति की शुरुआत हो रही थी, लेकिन किसानों तक पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं पहुंच रही थी. ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक शाखाएं बेहद कम थीं और बड़ी आबादी बैंकिंग सेवाओं से बाहर थी.
इंदिरा गांधी का मानना था कि यदि बैंकों का नियंत्रण सरकार के हाथ में होगा तो कृषि, लघु उद्योग, कुटीर उद्योग और गरीब वर्ग तक आसानी से ऋण पहुंचाया जा सकेगा. इसी सोच के तहत सरकार ने अध्यादेश जारी कर 50 करोड़ रुपये या उससे अधिक जमा वाले 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया.
राष्ट्रीयकरण के फैसले के बाद ऑल इंडिया रेडियो पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में इंदिरा गांधी ने कहा था,
“बैंकों के नेशनलाइज़ेशन का मकसद कुछ लोगों का कंट्रोल हटाना, खेती और छोटे उद्योगों को सही लोन देना और बैंक मैनेजमेंट को प्रोफेशनल बनाना है।”
यह बयान बताता है कि सरकार बैंकिंग व्यवस्था को केवल मुनाफा कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का उपकरण बनाना चाहती थी.
किन 14 बैंकों का हुआ था राष्ट्रीयकरण?
- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
- बैंक ऑफ इंडिया
- पंजाब नेशनल बैंक
- बैंक ऑफ बड़ौदा
- यूनाइटेड कमर्शियल बैंक (वर्तमान UCO Bank)
- केनरा बैंक
- यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया
- देना बैंक
- यूनियन बैंक ऑफ इंडिया
- इलाहाबाद बैंक
- सिंडिकेट बैंक
- इंडियन ओवरसीज बैंक
- इंडियन बैंक
- बैंक ऑफ महाराष्ट्र
फैसले के बाद क्या बदला?
राष्ट्रीयकरण के बाद सरकार ने तेजी से ग्रामीण और अर्द्धशहरी क्षेत्रों में बैंक शाखाओं का विस्तार शुरू किया. पहले जहां बैंक केवल बड़े शहरों तक सीमित थे, वहीं अगले कुछ वर्षों में हजारों नई शाखाएं गांवों तक पहुंचीं. प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending) की शुरुआत हुई, जिसके तहत किसानों, छोटे व्यापारियों, स्वरोजगार करने वालों और लघु उद्योगों को प्राथमिकता के आधार पर कर्ज दिया जाने लगा. इससे कृषि क्षेत्र को संस्थागत वित्त मिलने लगा और साहूकारों पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हुई.
बैंकिंग व्यवस्था में आम लोगों की भागीदारी भी बढ़ी. बचत खाते खुलने लगे, सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे बैंक खातों में पहुंचने लगा और वित्तीय समावेशन की मजबूत नींव पड़ी.
महिलाओं और गरीब परिवारों को कैसे मिला फायदा?
राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकिंग सेवाएं गांवों तक पहुंचने लगीं. महिलाओं के नाम पर खाते खुलने लगे, स्वयं सहायता समूहों को ऋण मिलने लगा और गरीब परिवारों को छोटे कारोबार शुरू करने के लिए बैंक से मदद मिलने लगी. यही मॉडल आगे चलकर जनधन योजना, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) और डिजिटल भुगतान जैसी योजनाओं की मजबूत नींव बना.
आम आदमी का भरोसा किस पर, सरकारी या निजी बैंक?
राष्ट्रीयकरण के बाद लंबे समय तक आम लोगों का सबसे ज्यादा भरोसा सरकारी बैंकों पर रहा. गांवों में शाखाओं का विस्तार, किसानों को ऋण और सरकारी योजनाओं का पैसा इन्हीं बैंकों के जरिए पहुंचने से लोगों का विश्वास मजबूत हुआ. हालांकि उदारीकरण के बाद निजी बैंकों ने बेहतर तकनीक और तेज सेवाओं के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई. आज सरकारी बैंक भरोसे और व्यापक पहुंच के लिए जाने जाते हैं, जबकि निजी बैंक बेहतर ग्राहक सेवा और डिजिटल बैंकिंग के लिए पसंद किए जाते हैं.
क्या फैसले की आलोचना भी हुई?
राष्ट्रीयकरण के समर्थकों का कहना है कि इस कदम ने बैंकिंग सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाया और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी. वहीं आलोचकों का तर्क है कि सरकारी नियंत्रण बढ़ने से बैंकों में राजनीतिक हस्तक्षेप, कार्यकुशलता में कमी और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) की समस्या बढ़ी. समय के साथ कई सार्वजनिक बैंक बढ़ते खराब ऋण के कारण दबाव में भी आए.
50 साल बाद बदली तस्वीर, अब बैंकों का विलय
राष्ट्रीयकरण के पांच दशक बाद सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के कई बैंकों का विलय किया. सरकार का तर्क था कि बड़े और मजबूत बैंक बनने से उनकी पूंजी क्षमता बढ़ेगी और वे वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे. हालांकि कर्मचारी संगठनों ने आशंका जताई कि इससे शाखाओं के पुनर्गठन, कर्मचारियों के स्थानांतरण और कामकाज की व्यवस्था पर असर पड़ सकता है.
आज भारत की बैंकिंग व्यवस्था 1969 की तुलना में पूरी तरह बदल चुकी है. डिजिटल बैंकिंग, यूपीआई, जनधन योजना और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी व्यवस्थाओं ने बैंक को हर नागरिक के जीवन का अहम हिस्सा बना दिया है. ऐसे में 19 जुलाई 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण भारतीय अर्थव्यवस्था के उन फैसलों में गिना जाता है, जिसने देश की वित्तीय दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
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