16 सितंबर 1973. रांची का HEC कम्युनिटी हॉल. मंच पर था अदालत और उसके पीछे एक ऐसा रंगमंचीय सफर, जिसने आगे चलकर रांची की सांस्कृतिक दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई. इस दिन ‘हस्ताक्षर’ के बैनर तले पहली बार नाटक मंचित हुआ था. इस कहानी के केंद्र में थे अशोक कुमार साहू, जिन्हें बाद में रंगमंच ने अशोक पागल के नाम से पहचान दी. आज अशोक पागल हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका करीब पांच दशक पुराना रंगमंचीय सफर उनकी कही बातों और दर्ज यादों में अब भी मौजूद है.
अशोक पागल ने अपने एक पुराने इंटरव्यू में दैनिक भास्कर को बताया था कि 16 सितंबर 1973 उनके जीवन के ऐतिहासिक दिनों में से एक था. इसी दिन HEC कम्युनिटी हॉल में हस्ताक्षर के बैनर तले पहली बार अदालत का मंचन हुआ था.
झारखंड सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के रिकॉर्ड में भी 16 सितंबर 1973 को ‘हस्ताक्षर’ की पहली प्रस्तुति दर्ज है. विभाग के मुताबिक, इससे पहले रांची में रंगमंच की गतिविधियों का एक लंबा सिलसिला चल रहा था और 1969 में ‘नौकरी की तलाश’ जैसे नाटक की सफलता ने शहर में नाटक और रंगमंच को लेकर नई चेतना पैदा की थी. लेकिन ‘हस्ताक्षर’ की कहानी किसी तारीख से नहीं, एक बेचैनी से शुरू हुई थी.
साल में एक नाटक, फिर पूरे साल इंतजार
आज से करीब छह दशक पहले का रांची आज के रांची से काफी अलग था. अशोक पागल की यादों के मुताबिक, उस दौर में दुर्गापूजा के दौरान नाटक मंचित किए जाते थे. वह भी दोस्तों के साथ इनमें हिस्सा लेने लगे. यहीं से उनका नाटक के प्रति लगाव बढ़ा.
अखबार के मुताबिक, अशोक पागल बताते थे कि लगातार तीन-चार साल दुर्गापूजा में नाटक करने के बाद अगली प्रस्तुति के लिए एक साल का इंतजार उन्हें बहुत भारी लगने लगा. नाटक करने की इच्छा अब सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं रह गई थी.
यही बेचैनी हस्ताक्षर के जन्म की वजह बनी. दोस्तों के साथ मिलकर नाटक संस्था बनाई गई. इसके बाद दिन-रात नाटक लिखने और रिहर्सल में गुजरने लगे.
झारखंड सरकार के कला-संस्कृति विभाग के अनुसार, हस्ताक्षर का गठन 1972 के अंत में हुआ था और इसकी पहली प्रस्तुति 16 सितंबर 1973 को कोर्ट नाम से दर्ज है. वहीं अशोक पागल के पुराने इंटरव्यू में नाटक का नाम अदालत बताया गया है.
स्कूल में शर्मीले, कॉलेज में बदल गई दुनिया
अशोक पागल ने बताया था कि स्कूल के दिनों में वह बेहद शर्मीले थे. किसी से बात कर पाना उनके लिए पहाड़ तोड़ने जैसा था. लेकिन कॉलेज में कदम रखते ही जैसे उनके भीतर का डर गायब हो गया. पढ़ाई से ज्यादा मन को-करिकुलर एक्टिविटीज में लगने लगा. दोस्तों की वजह से नाटक में रुचि पैदा हुई और दुर्गापूजा के मंच ने उन्हें रंगमंच से जोड़ दिया.
धीरे-धीरे उन्होंने तय कर लिया कि अब नाटक ही करना है. यहां से उनकी जिंदगी का रास्ता बदल गया. ‘पागल’ नाम मजाक में मिला, पहचान बन गया कॉलेज के दिनों में अशोक चंचल और मस्तीखोर थे. दोस्तों ने उन्हें ‘पागल’ कहना शुरू कर दिया. उन्होंने इस नाम को बुरा नहीं माना. बल्कि इसे अपनी पहचान बना लिया.
अशोक पागल ने दैनिक भास्कर को बताया था कि दोस्तों का उन्हें ‘पागल’ कहना उन्हें अच्छा लगता था. आगे चलकर अशोक कुमार साहू से ज्यादा लोग उन्हें अशोक पागल के नाम से जानने लगे.
मंच के पीछे भी परिवार था
अशोक पागल की पारिवारिक पृष्ठभूमि में नाटक नहीं था. इसके बावजूद परिवार ने उनके रंगमंचीय सफर का साथ दिया. वह अपने पुराने इंटरव्यू में बताते थे कि घर पर नाटक की तैयारी के दौरान लोगों का जमावड़ा लगा रहता था. एक तरफ रिहर्सल होती थी, दूसरी तरफ उनकी मां यमुना देवी कलाकारों के लिए चाय-नाश्ता तैयार करती थीं.
पत्नी उषा ने भी उनके रंगमंचीय सपने को अपने सपने की तरह जिया. इस तरह ‘हस्ताक्षर’ सिर्फ मंच पर खड़े कलाकारों की कहानी नहीं थी. उसके पीछे घर, परिवार और दोस्तों की वह दुनिया भी थी, जिसने इस रंगमंच को जगह दी.
रांची से निकलकर दूसरे शहरों तक पहुंचा रंगमंच
अशोक पागल का रंगमंच रांची तक सीमित नहीं रहा. उनके मुताबिक, पटना, कोलकाता, जमशेदपुर, इलाहाबाद, उदयपुर, जयपुर और तालचर जैसे शहरों में भी नाटक मंचित किए गए. इन यात्राओं में जयपुर की एक घटना उन्हें खास तौर पर याद थी. एक बार नाटक के लिए जयपुर पहुंचे तो सामान चोरी हो गया. पूरी टीम परेशान थी. लेकिन वहां के लोगों ने मदद की. एक मित्र ने रहने की जगह और कुछ पैसे भी दिए. इसके बाद नाटक समय पर मंचित हो सका.
अशोक पागल के लिए यह घटना इसलिए यादगार रही क्योंकि कलाकार के लिए मंच के साथ-साथ दर्शकों का सम्मान भी बहुत मायने रखता था.
जब कहानी नहीं, सिर्फ एक विचार मंच पर आया
अशोक पागल के रंगमंच की एक खास पहचान प्रयोग भी थी. उनका नाटक ‘महत्वाकांक्षा’ इसका दिलचस्प उदाहरण है. एक कार्यक्रम में अलग-अलग नाट्य संस्थाओं को प्रस्तुति का मौका मिला था. मंच था मेकॉन कम्युनिटी हॉल. जहां दूसरी संस्थाएं चर्चित नाटक तैयार कर रही थीं, अशोक ने कुछ अलग करने का फैसला किया.
उन्होंने कहानी और पात्रों के बजाय एक विचार को मंच पर उतारने का फैसला किया. नाटक के दिन तक कहानी तैयार नहीं हुई थी. वह थड़पखना से मेकॉन तक पैदल चल पड़े. रास्ते में अपने विचार के मुताबिक चीजें खरीदते गए. एक दुकान से गमछा और किराने की दुकान से सरसों का तेल.
मंच पर चार लोग खड़े होते हैं. अचानक धमाका होता है और चारों अलग-अलग दिशाओं में गिर जाते हैं. इसके बाद जमीन, धर्म, संस्कृति और अधिकार के लिए संघर्ष जैसे सवाल मंच पर आते हैं. करीब आठ मिनट के इस प्रयोग ने दर्शकों को बांधे रखा और अंत में हॉल तालियों से गूंज उठा.
‘आज मैं ही मर गई’ और आजादी के बाद का सवाल
अशोक पागल के लिए ‘आज मैं ही मर गई’ भी खास नाटक था. उनके मुताबिक, इसका पहला मंचन 1975 में हुआ था. बाद में इलाहाबाद, जमशेदपुर और डाल्टनगंज समेत कई शहरों में इसका मंचन हुआ और इसे कई पुरस्कार मिले.
इस नाटक का सवाल था- भारत की आजादी का वास्तविक लाभ आम लोग क्यों नहीं उठा पा रहे हैं? यानी रंगमंच उनके लिए सिर्फ मनोरंजन नहीं था. वह समाज के सवालों को मंच पर लाने का माध्यम भी था.
दो दर्जन से ज्यादा नाटक, लेकिन विरासत सिर्फ किताबों में नहीं
अशोक पागल ने दो दर्जन से ज्यादा नाटकों की किताबें लिखीं. कविताएं लिखीं और नाटक की स्क्रिप्ट तैयार की. दैनिक भास्कर के इंटरव्यू में उन्होंने अपनी एक उपलब्धि को अलग तरह से याद किया था- उनके परिवार में भी लेखन की परंपरा शुरू हुई.
उनकी भतीजी नव्या कविताएं लिखती थीं. जब उन्होंने अपनी अंग्रेजी कविताओं का संग्रह अशोक पागल को दिखाया तो उन्हें लगा कि उनकी वर्षों की मेहनत का असर अगली पीढ़ी तक पहुंच गया है.
22 जुलाई 2022 को थम गई आवाज, कहानी रह गई
अशोक पागल का निधन 22 जुलाई 2022 को हुआ था. जोहार लाइव ने उनके निधन की खबर में उन्हें अभिनेता, निर्देशक और नाटककार बताते हुए लिखा कि उन्होंने 1971 में ‘हस्ताक्षर’ नाट्य संस्था की शुरुआत की थी और इसे रांची में आधुनिक रंगमंच की शुरुआत से जोड़ा जाता है.

