जब सरकार ने सीआईडी की जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर 22 परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला लिया, तो आखिर उसी जांच रिपोर्ट को अदालत में बंद लिफाफे में पेश करने की जरूरत क्यों पड़ी? झारखंड विधानसभा नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सरकार पर सवाल उठाए हैं.
दरअसल, झारखंड में जेपीएससी-जेएसएससी की भर्ती परीक्षाओं को लेकर विवाद एक बार फिर गहरा गया है. 22 प्रतियोगी परीक्षाओं को रद्द करने के सरकार के फैसले पर हाईकोर्ट की रोक के बीच मंगलवार, 15 सितंबर को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने सीआईडी की जांच की प्रगति रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के सामने रखने की बात कही. सरकार ने जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा था, लेकिन हाईकोर्ट ने 48 घंटे में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया. मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर को होगी.
बंद लिफाफे में ही क्यों?
झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सरकार के इस कदम पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने पूछा कि जब सरकार ने सीआईडी की जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर 22 परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला लिया, तो उसी जांच रिपोर्ट को अदालत में बंद लिफाफे में पेश करने की जरूरत क्यों पड़ी?
मरांडी ने सवाल किया कि रिपोर्ट चार हफ्ते बाद सीलबंद लिफाफे में पेश करने की बात क्यों कही गई और क्या सरकार को पारदर्शिता से डर लग रहा है. उन्होंने कहा कि सवाल सिर्फ परीक्षाएं रद्द करने का नहीं है. सवाल यह भी है कि इन परीक्षाओं में गड़बड़ी कैसे हुई, इसके लिए जिम्मेदार कौन है और उन लाखों अभ्यर्थियों का क्या होगा, जिन्होंने इन परीक्षाओं के लिए वर्षों तैयारी की है.
बाबूलाल मरांडी ने अपने बयान में जेएसएससी-सीजीएल मामले का भी जिक्र किया. उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में परीक्षा से पहले नेपाल, बिहार और बंगाल में 135 प्रश्नों के लीक होने की जानकारी सामने आई थी, लेकिन सीआईडी ने इसे सिर्फ ठगी का मामला बताकर हाईकोर्ट को गुमराह किया.
मरांडी ने सवाल उठाया कि क्या 22 परीक्षाओं के मामले में भी ऐसी ही स्थिति दोहराई जा रही है. उन्होंने कहा कि बंद लिफाफे में जवाब दिया जा सकता है, लेकिन लाखों युवाओं के सवालों को बंद लिफाफे में नहीं रखा जा सकता. उन्होंने इस मामले में सीबीआई जांच की मांग दोहराई.
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