Hazaribagh : झारखंड के हजारीबाग जिले में सरकारी स्कूलों की हालत इन दिनों चिंता बढ़ाने वाली है। जिले के 1457 प्रारंभिक स्कूलों को अब तक स्कूल डेवलपमेंट फंड नहीं मिला है। ऐसे में 1 अप्रैल से शुरू होने वाले नए सत्र से पहले ही स्कूलों में परेशानी खड़ी हो गई है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि बिना फंड के स्कूल एडमिशन और अटेंडेंस रजिस्टर तक नहीं खरीद पा रहे हैं।
रजिस्टर नहीं, तो एडमिशन कैसे होगा?
नए सत्र में बच्चों का एडमिशन दर्ज करने के लिए एडमिशन रजिस्टर और रोज की हाजिरी के लिए अटेंडेंस रजिस्टर जरूरी होता है। लेकिन इस बार फंड नहीं मिलने से ये बेसिक चीजें भी स्कूलों में उपलब्ध नहीं हैं। कई स्कूलों में चॉक, डस्टर जैसी जरूरी चीजें भी नहीं हैं। शिक्षक किसी तरह जुगाड़ करके पढ़ाई चलाने की कोशिश कर रहे हैं।
एक लाख छात्रों की पढ़ाई पर असर
फंड की कमी का सीधा असर जिले के करीब एक लाख बच्चों पर पड़ रहा है। बिना जरूरी संसाधनों के पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। शिक्षकों का साफ कहना है कि अगर जल्द पैसा नहीं मिला, तो नया सत्र अव्यवस्था के बीच शुरू होगा।
हर साल मार्च में मिल जाता था फंड
आमतौर पर झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद की ओर से समग्र शिक्षा अभियान के तहत मार्च की शुरुआत में ही स्कूल डेवलपमेंट फंड जारी कर दिया जाता है। लेकिन इस बार मार्च खत्म होने को है और अभी तक फंड नहीं आया। यही वजह है कि स्कूल प्रबंधन और शिक्षक दोनों परेशान हैं।
सफाई और पानी की व्यवस्था भी प्रभावित
फंड का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा स्कूलों की साफ-सफाई और मेंटेनेंस पर खर्च किया जाता है। लेकिन पैसा नहीं मिलने से स्कूलों में सफाई व्यवस्था भी चरमरा गई है। शौचालयों की नियमित सफाई नहीं हो पा रही और पेयजल व्यवस्था भी प्रभावित है, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य को खतरा बढ़ रहा है।
कैसे मिलता है फंड
स्कूल डेवलपमेंट फंड छात्रों की संख्या के आधार पर दिया जाता है। जिन स्कूलों में 100 तक छात्र होते हैं, उन्हें 25 हजार रुपये मिलते हैं। 101 से 200 छात्रों वाले स्कूलों को 50 हजार रुपये और 201 से 300 छात्रों वाले स्कूलों को 75 हजार रुपये दिए जाते हैं। यह पूरी राशि स्कूल की विद्यालय प्रबंधन समिति (एसएमसी) के खाते में भेजी जाती है, जिसे समिति के अध्यक्ष और शिक्षक मिलकर जरूरत के अनुसार खर्च करते हैं।
विभाग की चुप्पी से बढ़े सवाल
फंड जारी नहीं होने को लेकर शिक्षा विभाग की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। स्कूलों की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं, लेकिन समाधान नजर नहीं आ रहा। शिक्षकों का कहना है कि इसका सीधा नुकसान बच्चों को उठाना पड़ रहा है।
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