जनगणना 2027 के प्रपत्र में धर्म के कॉलम में ‘आदिवासी धर्म’ के लिए अलग विकल्प शामिल करने की मांग उठी है. आदिवासी जन परिषद के एक प्रतिनिधिमंडल ने शुक्रवार को राज्यसभा सांसद संजय सिंह को ज्ञापन सौंपकर इस मुद्दे को संसद में उठाने का आग्रह किया.
प्रतिनिधिमंडल ने सांसद से कहा कि देश के आदिवासी समुदायों की धार्मिक पहचान, पारंपरिक आस्था और सांस्कृतिक विशिष्टता को जनगणना में दर्ज करने के लिए धर्म के कॉलम में ‘आदिवासी धर्म’ का अलग विकल्प होना चाहिए. परिषद का कहना है कि इससे आदिवासी समाज को अपनी धार्मिक पहचान जनगणना में दर्ज कराने का अवसर मिलेगा.
अलग धार्मिक पहचान दर्ज करने की मांग
आदिवासी जन परिषद के अनुसार, आदिवासी समाज की अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपराएं, पूजा-पद्धतियां और सांस्कृतिक मान्यताएं हैं. प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि आदिवासी समुदायों की आस्था और परंपराओं को केवल किसी अन्य धार्मिक श्रेणी के तहत दर्ज करने के बजाय जनगणना में उनके लिए अलग विकल्प उपलब्ध कराया जाना चाहिए.
परिषद ने कहा कि जनगणना में धार्मिक पहचान का स्पष्ट विकल्प उपलब्ध होने से आदिवासी समाज से संबंधित वास्तविक आंकड़े सामने आने में मदद मिल सकती है. प्रतिनिधिमंडल ने सांसद से इस मांग को संसद में उठाने और केंद्र सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करने का आग्रह किया.
परंपरा, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा बताया
परिषद ने कहा कि ‘आदिवासी धर्म’ की पहचान और जनगणना में उसके लिए अलग विकल्प की मांग सिर्फ धार्मिक पहचान का विषय नहीं है. यह आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति और अस्तित्व से भी जुड़ा सवाल है.
प्रतिनिधिमंडल ने उम्मीद जताई कि सांसद संजय सिंह इस मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए संसद में आदिवासी समाज की मांग को उठाएंगे. साथ ही केंद्र सरकार के समक्ष जनगणना 2027 के प्रपत्र में ‘आदिवासी धर्म’ के लिए अलग विकल्प उपलब्ध कराने की मांग रखेंगे. ज्ञापन सौंपने वाले प्रतिनिधिमंडल में आदिवासी जन परिषद के केंद्रीय अध्यक्ष प्रेम शाही मुंडा, केंद्रीय सचिव विष्णु मुंडा और आदिवासी बचाओ संघर्ष समिति के आशुतोष चेरो शामिल थे.
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