एक ऐसा इंसान, जिसने कभी प्रधानमंत्री बनने का सपना नहीं देखा. जिसकी जिंदगी राजनीति की रैलियों और भाषणों से ज्यादा विमान के कॉकपिट में गुजरती थी. जिसे उड़ान पसंद थी और सियासत से दूरी. लेकिन जिंदगी ने राजीव गांधी को बार-बार ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया, जहां निजी दुख और देश की जिम्मेदारी एक साथ सामने खड़ी थी. पहले छोटे भाई संजय गांधी की अचानक मौत हुई. फिर मां इंदिरा गांधी की हत्या ने उनकी पूरी दुनिया बदल दी. जिस बेटे ने शायद अपनी जिंदगी एक आम पायलट की तरह बिताने की सोची थी, उसे महज 40 साल की उम्र में देश का प्रधानमंत्री बनना पड़ा.

प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही उनके सामने सिर्फ सत्ता चलाने की चुनौती नहीं थी. उनके सामने एक बदलते भारत का सपना भी था. वह उस दौर में कंप्यूटर और टेलीकॉम की बात कर रहे थे, जब देश का एक बड़ा हिस्सा इन तकनीकों को लेकर आशंकित था. उनका सपना था कि भारत आने वाली 21वीं सदी के लिए तैयार हो.
एक राजनीतिक परिवार में जन्म, लेकिन राजनीति से दूरी
राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को हुआ था. वह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी के बड़े बेटे थे. उनके नाना जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री थे. यानी राजीव गांधी का बचपन ऐसे परिवार में बीता, जहां राजनीति रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी. इसके बावजूद उन्होंने राजनीति को अपना करियर नहीं बनाया. उनकी दिलचस्पी विज्ञान, तकनीक और विमान उड़ाने में थी.


उन्होंने पढ़ाई के बाद कमर्शियल पायलट के रूप में काम किया. इंडियन एयरलाइंस के पायलट के तौर पर उन्होंने अपने करियर का बड़ा हिस्सा बिताया. उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि कॉकपिट में बैठने वाला यह युवा आगे चलकर भारत का प्रधानमंत्री बनेगा.
संजय गांधी की मौत ने बदल दी जिंदगी
1980 में राजीव गांधी के छोटे भाई संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत हो गई. इस घटना ने गांधी परिवार की राजनीति को बदल दिया. इंदिरा गांधी को राजनीतिक सहयोग की जरूरत थी. परिवार और पार्टी की परिस्थितियों के बीच राजीव गांधी ने 1981 में राजनीति में प्रवेश किया. उन्होंने अमेठी से लोकसभा का उपचुनाव लड़ा और जीत हासिल की. इसके बाद वह कांग्रेस संगठन में सक्रिय होते गए. शुरुआत में राजनीति से दूरी रखने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे देश की राजनीति के केंद्र में पहुंच रहा था.

राजीव गांधी की प्रशासनिक क्षमता की चर्चा 1982 के एशियाई खेलों के दौरान भी हुई. दिल्ली में एशियाई खेलों के आयोजन की तैयारियां बड़े स्तर पर चल रही थीं. राजीव गांधी ने तैयारियों की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनकी कार्यशैली में आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रबंधन और तेजी से काम पूरा करने पर जोर दिखाई देता था. यही सोच आगे चलकर उनके राजनीतिक विजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी.

31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों ने हत्या कर दी. देश एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक सदमे से गुजर रहा था. इसी समय राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद संभाला. उस वक्त उनकी उम्र सिर्फ 40 साल थी. वह भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्रियों में शामिल हुए. इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला. राजीव गांधी के पास अब देश को अपनी सोच के मुताबिक बदलने का बड़ा अवसर था. लेकिन उनके सामने चुनौतियां भी कम नहीं थीं.
कंप्यूटर और टेलीकॉम को बनाया बदलाव का हथियार
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल की सबसे खास पहचान उनकी तकनीक को लेकर सोच रही. भारत में कंप्यूटर का इस्तेमाल उनसे पहले भी शुरू हो चुका था. लेकिन राजीव गांधी ने कंप्यूटरीकरण और दूरसंचार को देश के विकास से जोड़ने पर जोर दिया.
1984 में सी-डॉट यानी Centre for Development of Telematics की स्थापना हुई. इसका उद्देश्य भारत के लिए स्वदेशी टेलीकॉम तकनीक विकसित करना था. सैम पित्रोदा के साथ राजीव गांधी ने देश में दूरसंचार के विस्तार को बढ़ावा दिया. उनके दौर में यह विचार मजबूत हुआ कि आधुनिक संचार व्यवस्था भारत के विकास को गति दे सकती है. वह भारत को 21वीं सदी में ले जाने की बात करते थे. उनके लिए कंप्यूटर सिर्फ मशीन नहीं था. यह शिक्षा, प्रशासन, संचार और आर्थिक विकास को बदलने का माध्यम था.
युवाओं को वोट का अधिकार और पंचायती राज की दिशा
राजीव गांधी सरकार के दौर में कई ऐसे फैसले हुए, जिनका असर भारतीय लोकतंत्र पर लंबे समय तक रहा. मतदान की उम्र 21 साल से घटाकर 18 साल करने का फैसला इसी दौर में हुआ. इसके बाद बड़ी संख्या में युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सीधे भाग लेने का अधिकार मिला. स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने और पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भी राजीव गांधी सरकार ने महत्वपूर्ण पहल की. इन फैसलों के पीछे उनकी सोच थी कि लोकतंत्र सिर्फ संसद और विधानसभा तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इसकी पहुंच गांव और स्थानीय स्तर तक होनी चाहिए.
राजीव गांधी का कार्यकाल सिर्फ विकास और तकनीकी बदलावों की कहानी नहीं है. पंजाब, असम और श्रीलंका जैसे मुद्दों ने उनकी सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी कीं. असम समझौता और पंजाब समझौता उनके कार्यकाल के महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम रहे. श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने का फैसला भी उनके कार्यकाल के सबसे विवादित फैसलों में शामिल रहा. इसी दौरान बोफोर्स सौदा भी सामने आया.
बोफोर्स : जिसने बदल दी राजीव गांधी सरकार की राजनीतिक तस्वीर
राजीव गांधी की सरकार को सबसे बड़ा राजनीतिक झटका बोफोर्स सौदे से लगा. स्वीडन की कंपनी बोफोर्स से तोपों की खरीद में करीब 64 करोड़ रुपये की कथित दलाली के आरोप सामने आए. विपक्ष ने इसे सरकार के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाया. यही विवाद धीरे-धीरे राजीव गांधी सरकार की छवि पर भारी पड़ा और 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा. राजीव गांधी विपक्ष के नेता बने.
बोफोर्स विवाद के बीच ही राजीव गांधी सरकार को शाहबानो प्रकरण को लेकर भी आलोचना झेलनी पड़ी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार ने संसद में कानून बनाकर उस फैसले के प्रभाव को बदल दिया. इस कदम ने देश में धर्म, कानून और राजनीति को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी.
राजीव गांधी के कार्यकाल पर 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर भी सवाल उठे. दंगों के बाद उनके एक बयान, “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती तो हिलती ही है.”, की काफी आलोचना हुई. इस बयान को दंगों के संदर्भ में असंवेदनशील माना गया.

19 अक्टूबर 1990 को हैदराबाद के चारमीनार से उन्होंने सद्भावना यात्रा शुरू की. उनका उद्देश्य लोगों के बीच जाकर राजनीतिक और सामाजिक संवाद को मजबूत करना था. 1991 में देश एक बार फिर लोकसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा था. राजीव गांधी कांग्रेस के लिए प्रचार कर रहे थे. उन्हें नहीं पता था कि यह उनका आखिरी चुनाव अभियान होगा.
21 मई 1991, श्रीपेरंबदूर की वह रात
चारों तरफ चुनावी माहौल था. लोग अपने नेता का इंतजार कर रहे थे. रात करीब 10 बजे राजीव गांधी वहां पहुंचे. कार से उतरे और मंच की तरफ बढ़ने लगे. रास्ते में लोग उनसे मिलने के लिए आगे आ रहे थे. कोई माला पहना रहा था, कोई हाथ जोड़कर स्वागत कर रहा था. राजीव भी रुक-रुककर लोगों से मिल रहे थे. इसी दौरान एक महिला उनके करीब पहुंची. वह महिला झुकी उनके पैर छूने के लिए, और अगले ही पल एक जोरदार धमाका हुआ. इस आत्मघाती बम विस्फोट में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई. बाद में जांच में इस हमले के पीछे लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम यानी एलटीटीई की भूमिका सामने आई. भारत ने एक पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस ने अपना सबसे बड़ा युवा नेता खो दिया. राजीव गांधी की उम्र उस वक्त सिर्फ 46 साल थी.
राजीव गांधी की विरासत : तकनीक, युवा और आधुनिक भारत का सपना
राजीव गांधी को लेकर देश में आज भी अलग-अलग राय है. उनके समर्थक उन्हें आधुनिक और तकनीक आधारित भारत की नींव रखने वाले नेता के तौर पर देखते हैं. आलोचक उनके कार्यकाल के कई राजनीतिक फैसलों और विवादों को सामने रखते हैं. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने ऐसे समय में कंप्यूटर और टेलीकॉम को लेकर बात की, जब देश में तकनीक को लेकर आशंकाएं भी मौजूद थीं.
उन्होंने युवाओं को मतदान का अधिकार देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया. स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिश की. दूरसंचार और कंप्यूटरीकरण को विकास से जोड़ने पर जोर दिया. राजीव गांधी का राजनीतिक जीवन बहुत लंबा नहीं रहा. लेकिन उसमें भारतीय राजनीति के कई बड़े मोड़ समाए हुए हैं.
एक पायलट जो राजनीति में नहीं आना चाहता था. एक बेटा जिसने भाई और मां को खोने के बाद देश की जिम्मेदारी संभाली. एक प्रधानमंत्री जिसने भारत को 21वीं सदी के लिए तैयार करने का सपना देखा. एक नेता जो सत्ता से बाहर होने के बाद भी जनता के बीच लौटता रहा. और फिर 21 मई 1991 की वह रात. जिसने महज 46 साल की उम्र में इस सफर को हमेशा के लिए रोक दिया.
20 अगस्त को हर साल राजीव गांधी की जयंती के मौके पर उन्हें याद किया जाता है. उनके समर्थक इस दिन को सद्भावना दिवस के रूप में मनाते हैं. राजीव गांधी की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ एक प्रधानमंत्री की कहानी नहीं है. यह उस भारत की कहानी है जो 1980 के दशक में धीरे-धीरे कंप्यूटर, संचार और नई तकनीक की दुनिया की ओर बढ़ रहा था. और एक युवा प्रधानमंत्री उस बदलते भारत के लिए 21वीं सदी का सपना देख रहा था.
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