“मैं जन्म से क्रांतिकारी नहीं थी, बल्कि विचारों की परिपक्वता के साथ क्रांतिकारी बनी. एक व्यक्ति जितना सोचता, समझता, पढ़ता और लिखता है, उसके विचार बदलते हैं और मजबूत होते जाते हैं. शुरुआत भावनात्मक होती है, लेकिन आगे चलकर विचार उसे वास्तविक क्रांतिकारी बनाते हैं.”
दुर्गावती देवी ने यह बात 16 फरवरी 1972 को लखनऊ में दिए एक मौखिक इतिहास साक्षात्कार में कही थी. एस.एल. मनचंदा ने यह बातचीत नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के ओरल हिस्ट्री प्रोजेक्ट के लिए रिकॉर्ड की थी. करीब छह दशक पहले जिस महिला ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया था, वह इस बातचीत में अपने उस सफर को याद कर रही थीं.
दुर्गावती देवी को क्रांतिकारी आंदोलन में दुर्गा भाभी के नाम से जाना गया. उनका जन्म 7 अक्टूबर 1907 को हुआ था. इतिहास में उनका नाम सबसे ज्यादा उस घटना के लिए दर्ज है, जब साल 1928 में सॉन्डर्स की हत्या के बाद पुलिस भगत सिंह को तलाश रही थी. सॉन्डर्स ब्रिटिश पुलिस अधिकारी थे, जिसकी 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह, राजगुरु और उनके साथियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. क्रांतिकारियों ने दरअसल लाला लाजपत राय की मौत का का बदला लेने के लिए पुलिस अधिकारी जेम्स स्कॉट को निशाना बनाया था, लेकिन पहचान की गलती के कारण सॉन्डर्स मारे गाए. इसके बाद दुर्गा देवी ने अपनी पहचान और सामाजिक स्थिति का जोखिम उठाकर उन्हें लाहौर से बाहर निकलने में मदद की.
लेकिन यह उनकी कहानी का सिर्फ एक हिस्सा था. वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के क्रांतिकारी नेटवर्क से जुड़ी थीं और बाद में खुद भी ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई में शामिल हुईं.
सॉन्डर्स की हत्या के बाद भगत सिंह को लाहौर से निकाला
दुर्गावती देवी का विवाह कम उम्र में भगवती चरण वोहरा से हुआ था. भगवती चरण वोहरा आगे चलकर HSRA के प्रमुख क्रांतिकारियों और विचारकों में शामिल हुए. लाहौर में रहते हुए दुर्गा देवी का संपर्क भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और दूसरे क्रांतिकारियों से हुआ.
दिन 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में पुलिस अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स की हत्या के बाद ब्रिटिश पुलिस ने क्रांतिकारियों की तलाश तेज कर दी. भगत सिंह के लिए लाहौर से निकलना जरूरी था. उन्होंने अपना हुलिया बदल लिया. बाल कटवाए, दाढ़ी-मूंछ साफ की और पश्चिमी कपड़े पहन लिए.
इसके बाद भगत सिंह को एक सामान्य परिवार के सदस्य के रूप में बाहर निकालने की योजना बनी. दुर्गा देवी ने उनकी पत्नी होने का भेष अपनाया. उनका छोटा बेटा भी साथ था और राजगुरु नौकर के रूप में उनके साथ चले.
वे रेलवे स्टेशन पहुंचे और ट्रेन से लाहौर से बाहर निकल गए. यह यात्रा लखनऊ तक हुई, जहां से आगे वे कलकत्ता की ओर गए. इस पूरी योजना में दुर्गा देवी की मौजूदगी महत्वपूर्ण थी, क्योंकि एक महिला और बच्चे के साथ यात्रा कर रहे युवक पर पुलिस को तुरंत भगत सिंह होने का शक नहीं हुआ.
यह घटना उन्हें ‘दुर्गा भाभी’ के रूप में प्रसिद्ध करने वाली सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल हो गई. हालांकि उनका योगदान केवल भगत सिंह को सुरक्षित बाहर निकालने तक सीमित नहीं था.
वह क्रांतिकारियों को आश्रय देने, संदेश और संसाधन पहुंचाने तथा संगठन के लिए धन जुटाने जैसे कामों में भी शामिल थीं. भारत सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने क्रांतिकारियों की मदद के लिए अपने आभूषण तक बेच दिए थे.
पति की मौत के बाद खुद उठाया क्रांतिकारी रास्ता
दुर्गा भाभी के पति भगवती चरण वोहरा भगत सिंह और उनके साथियों को जेल से छुड़ाने की योजनाओं से जुड़े थे. दिन 28 मई 1930 को रावी नदी के किनारे बम का परीक्षण करते समय उनकी मौत हो गई.
पति की मौत के बाद दुर्गा देवी ने क्रांतिकारी गतिविधियों से दूरी नहीं बनाई. बल्कि 1972 के अपने मौखिक इतिहास में उन्होंने बताया कि इसके बाद उन्होंने चंद्रशेखर आजाद से अपने हिस्से का पूरा क्रांतिकारी काम करने की मांग की थी. इसी दौर में उनका जीवन और अधिक जोखिम भरा हो गया. वह भूमिगत रहीं और ब्रिटिश पुलिस से बचते हुए क्रांतिकारी नेटवर्क में सक्रिय रहीं.
साल 1930 में मुंबई के लैमिंगटन रोड पर हुई गोलीबारी की एक घटना में भी दुर्गा देवी की भूमिका का उल्लेख इतिहासकार कामा मैक्लीन के शोध में मिलता है. इस कार्रवाई में एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी और उसकी पत्नी घायल हुए थे. इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि वह केवल क्रांतिकारियों की मदद करने वाली महिला नहीं थीं, बल्कि खुद भी सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल थीं.
दिन 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दिए जाने के बाद भी क्रांतिकारी गतिविधियों पर ब्रिटिश कार्रवाई जारी रही. दुर्गा देवी भी पुलिस की निगरानी और गिरफ्तारी के खतरे में रहीं. बाद के वर्षों में उनका जीवन बदल गया. क्रांतिकारी गतिविधियों से अलग होने के बाद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काम किया और लखनऊ में बच्चों के लिए स्कूल शुरू किया. दुर्गावती देवी का निधन 15 अक्टूबर 1999 को हुआ.

