छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी हमले के मामले में 13 साल बाद शनिवार 5 सितंबर को एनआईए अदालत का फैसला आया. फैसले में एनआईए की विशेष अदालत ने 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर हुए माओवादी हमले के मामले में 10 आरोपियों को दोषी करार दिया. मामले में एक अन्य आरोपी की मुकदमे के दौरान मौत हो चुकी है. अदालत 16 सितंबर को अब दोषियों की सजा पर फैसला सुनाएगी.
झीरम घाटी छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के दरभा क्षेत्र में स्थित है. यह जगदलपुर और सुकमा के बीच आने वाला पहाड़ी और घने जंगलों वाला इलाका है. बस्तर का यह क्षेत्र लंबे समय से माओवादी गतिविधियों से प्रभावित रहा है. साल 2013 की 25 मई को इसी इलाके से गुजर रहे कांग्रेस नेताओं के काफिले को माओवादियों ने निशाना बनाया था.
13 साल पीछे चलते हैं और कहानी पूरी समझते हैं
नवंबर 2013 में छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने वाले थे. इसको लेकर पूरे प्रदेश में गहमा-गहमी थी. चुनावी अभियान शुरू हो चुके थे, इसी को लेकर 25 मई 2013 को विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा निकली थी. सुकमा में कार्यक्रम के बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला जगदलपुर लौट रहा था. दरभा इलाके की झीरम घाटी में माओवादियों ने काफिले को घेरकर हमला कर दिया.
एनआईए के रिकॉर्ड के मुताबिक, हमला शाम करीब 4.15 बजे हुआ. माओवादियों ने गोलीबारी और विस्फोट के जरिए काफिले को निशाना बनाया. हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और कांग्रेस नेता उदय मुदलियार समेत कई लोग मारे गए.
एनआईए के आधिकारिक रिकॉर्ड में 27 लोगों की मौत और 38 लोगों के घायल होने का उल्लेख है. बाद के कई सार्वजनिक विवरणों में मृतकों की संख्या अलग बताई गई है.
महेंद्र कर्मा माओवादियों के निशाने पर प्रमुख रूप से थे. क्योंकि वह बस्तर में माओवादियों के खिलाफ चलाए गए सलवा जुडूम अभियान के प्रमुख चेहरों में रहे थे.
क्या था सलवा जुडूम
सलवा जुडूम छत्तीसगढ़ के बस्तर में साल 2005 के आसपास शुरू हुआ एक माओवादी विरोधी जन अभियान था, स्थानीय गोंडी भाषा में सलवा जुडूम का अर्थ शांति अभियान या शांति का शिकार जैसा बताया जाता है. इसके प्रमुख राजनीतिक चेहरों में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा थे. उस समय छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थी. सलवा जुडूम पर मानवाधिकार उल्लंघन और राज्य द्वारा नागरिकों को सशस्त्र कर माओवादी विरोधी अभियान में इस्तेमाल करने के लगे थे. इसके अलावा गांव खाली कराने, सुरक्षाबलों और सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं पर ग्रामीणों के हत्या और हिंसा के आरोप लगे थे. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 5 जुलाई 2011 को नंदिनी सुंदर बनाम छत्तीसगढ़ सरकार मामले में सलवा जुडूम पर रोक लगाई थी.
अब फिर आते हैं झीरम घाटी हमले पर, हमले के बाद मामला दर्ज किया गया. केंद्र सरकार के आदेश के बाद 27 मई 2013 को एनआईए ने जांच अपने हाथ में ली. केस में हत्या, हत्या के प्रयास, आपराधिक साजिश, डकैती, हथियार और विस्फोटक कानून तथा UAPA की धाराएं लगाई गईं.
एनआईए ने 25 सितंबर 2014 को नौ गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ पहली चार्जशीट दाखिल की. इसके बाद 28 सितंबर 2015 को सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई. जांच में कई अन्य आरोपियों को भी नामजद किया गया, जबकि कई आरोपी फरार रहे.
मामला इसके बाद एनआईए की विशेष अदालत में चला. वर्षों तक गवाहों के बयान, दस्तावेज और अन्य साक्ष्यों की जांच होती रही. अभियोजन पक्ष ने 101 गवाहों के बयान दर्ज कराए.
13 साल तक चलता रहा मुकदमा
झीरम घाटी केस कोई सामान्य आपराधिक मुकदमा नहीं था. मामले में बड़ी संख्या में गवाह, दस्तावेज और आरोपियों से जुड़े साक्ष्यों की जांच हुई. हालिया रिपोर्टों के मुताबिक ट्रायल के दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए और करीब 294 सुनवाई हुईं.
अगस्त 2026 में मामले में अंतिम बहस पूरी हुई. इसके बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा था. पहले फैसला 31 अगस्त को आने की उम्मीद थी, लेकिन इसे टालकर 5 सितंबर कर दिया गया.
5 सितंबर 2026 को विशेष एनआईए अदालत ने मामले में 10 आरोपियों को दोषी करार दिया. दोषी ठहराए गए आरोपियों में प्रमिला मोडियम, चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना, सुमित्रा उर्फ पुनम मोडियम, मुक्का मंडवी, कोसा कवासी उर्फ कोसराम, अयाता मरकाम, मड़कम देवा, जोगा मड़कम, बंजामी अन्ना उर्फ चमरू उर्फ डेंगा और महादेव नाग शामिल हैं. एक आरोपी की मुकदमे के दौरान मौत हो चुकी है, जबकि मामले में अन्य आरोपी फरार बताए गए हैं.
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