पटना: बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की दोबारा मंत्री नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है. खास बात यह है कि विवाद के बीच दीपक प्रकाश अब विधान परिषद के सदस्य बन चुके हैं. 5 अगस्त 2026 को राज्यपाल ने उन्हें MLC मनोनीत किया था और उन्होंने शपथ भी ले ली. इसके बावजूद उनकी दूसरी बार मंत्री नियुक्ति की संवैधानिक वैधता पर सवाल कायम है. सुप्रीम कोर्ट में आज इस मामले पर सुनवाई होनी है.
दीपक प्रकाश पहली बार 22 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री बने थे. उस समय वह न विधायक थे और न विधान परिषद के सदस्य. संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत किसी गैर-विधायक को मंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन छह महीने के भीतर उसे राज्य की विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी है. ऐसा नहीं होने पर छह महीने की अवधि पूरी होते ही मंत्री पद छोड़ना पड़ता है.
हालांकि, 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के साथ पूरी मंत्रिपरिषद समाप्त हो गई. इसके बाद 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनी और दीपक प्रकाश को फिर से पंचायती राज मंत्री बनाया गया. उस समय भी वह विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे. यही उनकी दूसरी नियुक्ति विवाद के केंद्र में है.
याचिकाकर्ता का क्या कहना है?
सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दीपक प्रकाश की दोबारा नियुक्ति को चुनौती दी है. याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 164(4) के तहत गैर-विधायक को मंत्री बनने की छह महीने की छूट को सरकार बदलने के बाद दोबारा शुरू नहीं किया जा सकता.
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के 2001 के S.R. Chaudhuri बनाम पंजाब सरकार के फैसले का भी हवाला दिया है. इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि संविधान में दी गई छह महीने की अवधि को बार-बार मंत्री बनाकर दरकिनार नहीं किया जा सकता.
दीपक प्रकाश का क्या तर्क है?
दीपक प्रकाश का कहना है कि उनकी पहली सरकार ही समाप्त हो गई थी. यानी पहली मंत्रिपरिषद के खत्म होने के बाद नई सरकार और नई मंत्रिपरिषद में उनकी नियुक्ति हुई. उनका तर्क है कि इसे पहली नियुक्ति की निरंतरता नहीं माना जा सकता.
अब एक और महत्वपूर्ण तथ्य उनके पक्ष में है. 5 अगस्त को उन्हें विधान परिषद का सदस्य मनोनीत कर दिया गया. 14 सितंबर को दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में भी दीपक प्रकाश ने कहा है कि अब वह MLC हैं और उनकी नियुक्ति में संविधान का उल्लंघन नहीं हुआ है. उन्होंने याचिका खारिज करने की मांग की है.
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