जोहार लाइव ब्यूरो
भ्रष्टाचार निवारण के तहत एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में, रांची की विशेष अदालत ने आरोपी मोहन पांडे (तत्कालीन अंचल निरीक्षक, सदर पश्चिमी अंचल, रांची) के मामले में एक बड़ा आदेश पारित किया है.अदालत ने स्पष्ट किया है कि कानून में ‘डीम्ड सेंक्शन’ (स्वतः स्वीकृत मान लिया जाना) जैसी कोई अवधारणा नहीं है. इसके साथ ही, अदालत ने अभियोजन पक्ष के उस आग्रह को खारिज कर दिया जिसमें चार महीने की अवधि बीत जाने के बाद अभियोजन स्वीकृति में हुई देरी को स्वतः स्वीकृत मान लेने की प्रार्थना की गई थी.
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला एसीबी ( 08(A)/2021 से जुड़ा हुआ है.घटना के विवरण के अनुसार, 30 नवंबर 2021 को अनुसंधान अधिकारी ने पहली चार्जशीट संख्या 09/2021 (दिनांक 29.11.2021) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(a)/7A के तहत राकेश कुमार के खिलाफ दाखिल की थी. राकेश कुमार उस समय सदर पश्चिमी अंचल के तत्कालीन अंचल निरीक्षक मोहन पांडे के रीडर के रूप में कार्यरत थे.
चार्जशीट में यह बात सामने आई थी कि दोनों आरोपियों (राकेश कुमार और मोहन पांडे) के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं और दोनों की अभियोजन स्वीकृति के लिए पहले ही अनुरोध भेजा जा चुका है. हालांकि, अनुसंधान अधिकारी ने मोहन पांडे के संबंध में यह कहते हुए जांच लंबित रखी थी कि उनका बचाव पक्ष का बयान दर्ज किया जाना बाकी है.
इसके बाद, सह-आरोपी राकेश कुमार के खिलाफ एसएसपी, रांची द्वारा 1 जून 2024 को अभियोजन स्वीकृति प्रदान की गई.इसके आधार पर 21 अगस्त 2024 को अदालत ने राकेश कुमार के खिलाफ संज्ञान लिया. हालांकि, इसके विपरीत, अनुसंधान अधिकारी ने 3 जुलाई 2024 को अंतिम रिपोर्ट (Final Report) संख्या 11/2024 दाखिल कर दी, जिसमें आरोपी मोहन पांडे के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य न होने की बात कही गई.
अदालत की कड़ी टिप्पणी और केस डायरी का अवलोकन
जब मामला अदालत के समक्ष आया, तो न्यायालय ने केस डायरी की वेरीफिकेशन रिपोर्ट, पैरा-11, 14, 17 और ट्रैप मेमो के साथ-साथ धारा 161 Cr.P.C. के तहत गवाहों के बयानों का बारीकी से अध्ययन किया.
अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि दस्तावेजों और बयानों से स्पष्ट होता है कि इंस्पेक्टर मोहन पांडे द्वारा 20,000 रुपये की मांग की गई थी और ट्रैप के दौरान वे मौके से फरार हो गए थे. अदालत ने अपने पिछले आदेश (दिनांक 21.08.2024) में स्पष्ट किया था कि रिकॉर्ड और केस डायरी के अवलोकन से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित 2018) की धारा 7(a) के तहत इंस्पेक्टर मोहन पांडे के खिलाफ भी पर्याप्त सामग्री (अपराध से जुड़े साक्ष्य) मौजूद है. इसके बाद अदालत ने मोहन पांडे के मुकदमे के रिकॉर्ड को अलग (split up record) कर दिया था.
‘डीम्ड सेंक्शन’ के तर्क को अदालत ने क्यों नकारा?
मामले की सुनवाई के दौरान विद्वान स्पेशल पीपी ने दलील दी कि संशोधित प्रावधानों के मुताबिक चार महीने की अवधि बीत चुकी है, इसलिए तय समय सीमा (तीन महीने प्लस एक महीना) के आधार पर अभियोजन स्वीकृति में हुई देरी को ‘डीम्ड सेंक्शन’ (स्वतः स्वीकृत) मान लिया जाना चाहिए.
अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया. माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले विजय राजमोहन बनाम सीबीआई (2022 SCC OnLine SC 1377) के पैरा 32, 38 और 39 का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में स्वतः स्वीकृति (deemed sanction) का कोई प्रावधान नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि:
अनिवार्य अवधि का पालन न होने मात्र से आपराधिक कार्यवाही को स्वतः रद्द (quash) नहीं किया जा सकता, क्योंकि भ्रष्टाचार के मामलों में जनता के हितों और कानून के शासन (Rule of Law) की रक्षा करना बेहद जरूरी है.
अभियोजन स्वीकृति देने के लिए निर्धारित 3 महीने और कानूनी परामर्श के लिए बढ़ाए गए 1 महीने की अवधि अनिवार्य (mandatory) है.
इस मियाद का पालन न होने पर आपराधिक मामला खत्म नहीं होगा, बल्कि इसके लिए जिम्मेदार सक्षम प्राधिकारी (competent authority) जवाबदेह होंगे और उनके खिलाफ प्रशासनिक व न्यायिक समीक्षा की जाएगी.
अदालत का अगला निर्देश
अदालत ने कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि मोहन पांडे के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति के बिना आगे की कार्रवाई संभव नहीं है और ‘डीम्ड सेंक्शन’ का सिद्धांत लागू नहीं होता.
न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस अधीक्षक (S.P.), एसीबी मुख्यालय को दोबारा पत्र जारी करने का आदेश दिया है. इस पत्र के माध्यम से निर्देश दिया गया है कि वे मोहन पांडे के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति आदेश या स्वीकृति से इंकार करने का आदेश जल्द से जल्द अदालत में प्रस्तुत करें.साथ ही, इस पत्र की एक प्रति सक्षम प्राधिकारी यानी आईजी. (दक्षिण छोटा नागपुर रेंज, रांची) को भी आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने का निर्देश दिया गया है. मामले की अगली सुनवाई के लिए 09 दिसंबर 2026 को होगी.
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