सुप्रीम कोर्ट आज श्रम कानून से जुड़े बेहद अहम मामले में फैसला सुनाने जा रहा है. नौ जजों की संविधान पीठ यह तय करेगी कि Industry यानी उद्योग की वह व्यापक परिभाषा सही है या नहीं, जो सुप्रीम कोर्ट ने 1978 में दी थी. इसका सीधा असर अस्पतालों, विश्वविद्यालयों, चैरिटेबल संस्थाओं और सरकारी Welfare Activities से जुड़े कर्मचारियों के श्रम अधिकारों पर पड़ सकता है.
1978 में क्या फैसला आया था?
मामला Bangalore Water Supply & Sewerage Board vs A. Rajappa से जुड़ा है. 21 फरवरी 1978 को 7 जजों की संविधान पीठ ने Industrial Disputes Act, 1947 की Section 2(j) में ‘Industry’ की व्यापक व्याख्या की थी. फैसले में जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर की राय के तहत Triple Test सामने आया.
इसके मुताबिक किसी गतिविधि को Industry मानने के लिए मुख्य तौर पर देखा जाएगा कि वहां संगठित और नियमित गतिविधि हो, employer और employee मिलकर काम कर रहे हों और लोगों की जरूरतें पूरी करने के लिए goods या services उपलब्ध कराई जा रही हों. इसमें मुनाफा कमाना जरूरी शर्त नहीं माना गया.
इसका असर कहां पड़ा?
इस व्यापक व्याख्या के कारण Industry का दायरा पारंपरिक फैक्ट्रियों और कारोबारी संस्थानों से आगे बढ़ गया. अस्पताल, विश्वविद्यालय, चैरिटेबल संस्थाएं और कुछ सरकारी विभागों की वेलफेयर एक्टिविटीज भी इसके दायरे में आ सकती थीं. यानी इन संस्थानों के कर्मचारियों के औद्योगिक विवाद (Industrial Disputes) से जुड़े मामलों को श्रम कानून (Labour Law) के तहत सुरक्षा और Industrial Tribunal जैसी व्यवस्था का लाभ मिल सकता था.
अब विवाद क्यों?
बाद के वर्षों में इस व्यापक परिभाषा को लेकर सवाल उठे. साल 2005 में 5 जजों की संविधान पीठ ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा और 2017 में 7 जजों की पीठ ने इसके व्यापक असर को देखते हुए 9 जजों की संविधान पीठ के सामने मामला रखने का रास्ता साफ किया.
मामला अब स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम जय बीर सिंह से जुड़े संदर्भ के जरिए 9 जजों की पीठ के सामने पहुंचा है.
नौ जजों की पीठ के सामने क्या सवाल हैं?
सुप्रीम कोर्ट के द्वारा 16 फरवरी 2026 को दिए गए आदेश में मुख्य तौर पर चार मुद्दे तय किए थे.
पहला, क्या 1978 में दिया गया Triple Test आज भी सही कानून है?
दूसरा, 1982 का Industrial Disputes Amendment और Industrial Relations Code, 2020, जो 21 नवंबर 2025 से प्रभावी है, क्या ‘Industry’ की पुरानी व्याख्या पर कोई कानूनी असर डालते हैं?
तीसरा, क्या सरकार के Social Welfare Schemes और सरकारी विभागों की दूसरी गतिविधियों को Industrial Activity माना जा सकता है?
चौथा, सरकार के कौन-कौन से काम ‘Sovereign Functions’ माने जाएंगे और क्या वे Labour Law के दायरे से बाहर होंगे?
केंद्र बनाम श्रम संगठन
सुनवाई के दौरान केन्द्र ने 1978 की व्याख्या के अंधाधुंध इस्तेमाल पर आपत्ति जताई. सरकार का कहना था कि अगर हर Welfare Activity को Triple Test के आधार पर Industry मान लिया जाए तो Forest, Irrigation और Research जैसे सरकारी विभागों तक इसका दायरा पहुंच सकता है.
वहीं Labour Unions ने 1978 के फैसले का बचाव किया. उनका कहना था कि करीब पांच दशक से इस फैसले ने कर्मचारियों को एक स्थिर कानूनी ढांचा दिया है और इसे कमजोर करने से कर्मचारियों के पास विवादों के समाधान के विकल्प कम हो सकते हैं.
आज फैसला क्यों अहम है?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय कर सकता है कि ‘Industry’ की परिभाषा पहले जैसी व्यापक रहेगी, उसे सीमित किया जाएगा या 1978 के Triple Test में बदलाव होगा.
इसका असर सिर्फ फैक्ट्री मजदूरों तक सीमित नहीं रहेगा. अस्पतालों, विश्वविद्यालयों, चैरिटेबल संस्थाओं और सरकारी Welfare Activities में काम करने वाले कर्मचारियों के Industrial Dispute Rights पर भी इसका असर पड़ सकता है. नौ जजों की संविधान पीठ की अध्यक्षता CJI सूर्यकांत कर रहे हैं. पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, पी.एस. नरसिम्हा, दीपांकर दत्ता, उज्जल भुइयां, सतीश चंद्र शर्मा, जॉयमाल्या बागची, आलोक अराधे और विपुल एम. पंचोली शामिल हैं. पीठ ने 19 मार्च 2026 को तीन दिन की विस्तृत सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित किया था.
अब नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट 48 साल पुराने ‘Industry’ टेस्ट को बरकरार रखता है, उसमें बदलाव करता है या उसकी व्यापक व्याख्या को पलट देता है.
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