अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर किसानों का विरोध अब सड़क पर उतर आया है. पंजाब और हरियाणा समेत कई राज्यों के किसान इस डील के खिलाफ दिल्ली की ओर कूच कर रहे हैं. किसानों को डर है कि अगर अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारत में बाजार खोल दिया गया तो सस्ते विदेशी सामान का सीधा असर उनकी फसलों और कमाई पर पड़ सकता है. इसी को लेकर किसान संगठन सरकार पर दबाव बनाने में जुटे हैं.
चलिए, समझते हैं पूरा मामला क्या है?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार बढ़ाने को लेकर बातचीत चल रही है. इसमें दोनों देश एक-दूसरे के बाजार में अपने सामान की पहुंच आसान करने और कुछ उत्पादों पर आयात शुल्क कम करने की बात कर रहे हैं. लेकिन जब बात खेती-किसानी की आती है तो मामला थोड़ा पेचीदा हो जाता है. वजह साफ है-भारत में बड़ी आबादी की रोजी-रोटी खेती और उससे जुड़े कामों पर टिकी है.
सीधी भाषा में कहें तो अमेरिका चाहता है कि उसके कुछ कृषि और खाद्य उत्पाद भारत में आसानी से बिक सकें. बदले में भारत को भी अपने सामान के लिए अमेरिकी बाजार में बेहतर मौका मिल सकता है. इसी को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है.
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, कुछ अमेरिकी उत्पादों को भारत में सीमित बाजार पहुंच देने या उनके आयात पर शुल्क में रियायत देने की बात हुई है. इनमें पशु-चारे से जुड़े DDGS और Red Sorghum, कुछ फल, Tree Nuts और Soybean Oil जैसे उत्पाद शामिल हैं.
लेकिन सरकार ने यह भी कहा है कि चावल, गेहूं, डेयरी, पोल्ट्री, मक्का, बाजरा, सोयामील, मूंगफली, शहद और तंबाकू जैसे कई संवेदनशील कृषि उत्पादों को रियायतों से बाहर रखा गया है.
कितने किसानों और परिवारों पर पड़ सकता है असर?
आंकड़ों को देखें तो यह मामला छोटा नहीं है. भारत सरकार की Agriculture Census 2015-16 के मुताबिक देश में करीब 14.6 करोड़ कृषि जोत हैं. इनमें 86 फीसदी से ज्यादा जोत छोटी और सीमांत श्रेणी की हैं, यानी 2 हेक्टेयर से कम जमीन वाली.
इसका मतलब यह है कि अगर किसी कृषि उत्पाद के सस्ते आयात से घरेलू बाजार में कीमत गिरती है तो सबसे ज्यादा चिंता छोटे किसानों को हो सकती है. छोटे किसान आमतौर पर कम जमीन पर खेती करते हैं और उनके पास बाजार में लंबे समय तक कम कीमत पर फसल बेचकर टिके रहने की गुंजाइश भी सीमित होती है.
किसानों को डर है कि अगर अमेरिका से आने वाले कुछ कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में सस्ते पड़ते हैं तो घरेलू उत्पादों की कीमत पर दबाव बन सकता है. ऐसे में किसान को अपनी फसल का सही दाम मिलने में दिक्कत हो सकती है. हालांकि, अभी यह कहना मुश्किल है कि किसानों को कितना आर्थिक नुकसान होगा. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि समझौते में किन उत्पादों को कितनी छूट मिलती है और भारत में उनका आयात कितना बढ़ता है.
पशुपालन और डेयरी को लेकर भी चिंता
किसानों की चिंता सिर्फ फसलों तक सीमित नहीं है. डेयरी और पशुपालन भी इस बहस का बड़ा हिस्सा है. केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, देश में डेयरी क्षेत्र 8 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण परिवारों की आजीविका से जुड़ा है.
किसान संगठनों को डर है कि अगर अमेरिकी डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार ज्यादा खुला तो छोटे दूध उत्पादकों और पशुपालकों पर दबाव बढ़ सकता है. उनका तर्क है कि अमेरिका में बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है, जबकि भारत में बड़ी संख्या में छोटे किसान और ग्रामीण परिवार दूध उत्पादन से जुड़े हैं.
पशु-चारे को लेकर भी ऐसी ही चिंता है. अगर अमेरिका से सस्ता पशु-चारा या उससे जुड़े उत्पाद बड़ी मात्रा में भारत आने लगे तो मक्का, ज्वार और ऐसी दूसरी फसलों की मांग और कीमत पर असर पड़ने की आशंका है. हालांकि, इसका वास्तविक असर आयात की मात्रा, शुल्क और सरकार की ओर से तय कोटा जैसी शर्तों पर निर्भर करेगा.
सरकार क्या कह रही है?
सरकार का कहना है कि ऐसा नहीं है कि भारत ने अपनी पूरी कृषि व्यवस्था अमेरिका के लिए खोल दी है. सरकार के मुताबिक, कई संवेदनशील कृषि उत्पादों को रियायतों से बाहर रखा गया है. जहां रियायत देने की बात है, वहां भी कई उत्पादों के लिए मात्रा की सीमा यानी कोटा और दूसरी शर्तें रखी जा सकती हैं.
किसानों की चिंता सीधी है कहीं ऐसा न हो कि विदेशी सामान सस्ता आए और उसका नुकसान भारतीय किसान को उठाना पड़े. वहीं सरकार का कहना है कि अमेरिका के साथ बातचीत में किसानों के हितों और देश के संवेदनशील कृषि क्षेत्र का पूरा ध्यान रखा जा रहा है.
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